Opinion

80 के दशक में शुरू हुई क्षेत्रीय और जातीय अस्मिताओं की अब है निर्णायक दखल

FAISAL ANURAG

अनेक तरह की अस्मिताओं की राजनीतिक अभिव्यक्ति देश के बेहद ही छोटे दलों के माध्यम से हो रही है. पिछले दो आम चुनावों में इन दलों की महत्ता बढ़ी है. देश में राष्ट्रीय प्रभाव पवाले राजनीतिक दलों ने भी इनकी राजनीतिक अहमियत को स्वीकार कर लिया है.

देश का कोई भी ऐसा हिस्सा नहीं है जहां अस्मितावादी राजनीतिक समूहों की मौजूदगी नहीं है. देश के एक छोटे हिस्से और समूहों को स्वर देनेवाले इन समूहों को अनसुना नहीं किया जा सकता है.

2014 के चुनाव में उत्तर प्रदेश और बिहार सहित कई राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की जीत इन दलों के समीकरणों ने ही तय किया. वर्तमान आम चुनाव में इन इन अवाजों को अपने-अपने गठबंधन में लाने की होड़ दिख रही है.

इसे भी पढ़ेंः पित्रोदा के बयान से कांग्रेस का किनारा, बीजेपी-कांग्रेस में जुबानी जंग तेज

उत्तर प्रदेश के निषाद दल को भारतीय जनता पार्टी ने सपा बसपा से अलग कर अपने पक्ष में किया और उस पूरी पार्टी का विलय ही अपनी पार्टी में करा लिया.

इस तरह विलय या फिर गठबंधन उत्तर पूर्व से जम्मू और कश्मीर और कन्यकुारी तक किये गये हैं. भारतीय जनता पार्टी का एनडीए कुनबा अभी हाल तक बिखरता हुआ नजर आ रहा था लेकिन चुनाव प्रक्रिया के साथ ही यह अब 40 दलों का गठबंधन बन गया है.

इस गठबंधन में भाजपा ने ऐसे अनेक समूहों को शामिल किया है, जिससे वह विचार के स्तर पर न केवल असहमत है बल्कि विरोधी भी. दक्षिण भारत और उत्तर पूर्व में कई ऐसे दल को एनडीए का हिस्सा बनाया गया है.

बिहार में भी मुकेश साहनी की पाटी वीआईपी को जब महागठबंधन में तीन सीट मिले तो कई राजनीतिक प्रेक्षकों को आश्चर्य  भी हुआ. लेकिन बिहार में साहनी जिस समूह को स्वर देते हैं, वह बेहद प्रभावी है. 2014 में उन्होंने भाजपा को साथ भी दिया था और वैसे अनेक सीटों पर जहां बहुत कम अंतर से भाजपा जीती थी, अपनी अहमियत भी दिखायी.

इसे भी पढ़ेंः आज कांग्रेस का दामन थामेंगे शत्रुघ्न सिन्हा, पटना साहिब से लड़ सकते हैं चुनाव

क्षेत्रीय दलों ने तो 90 के दशक में ही भारतीय राजनीति को प्रभावित करना शुरू कर दिया था. 1989 के चुनाव में भी उनकी बडी भूमिका थी. इसके बाद का दौर गठबंधन सरकारों का ही रहा. 2014 में भाजपा को बहुमत जरूर मिला लेकिन उसने गठबंधन सरकार ही बनायी.

भाजपा को पता है कि क्षेत्रीय दलों के प्रभाव को किसी भी सूरत में नजरअंदाज करना उसकी राजनीतिक हाराकिरी ही साबित होगी. 2014 में भाजपा ने जाति  अस्मिताओं के महत्व को भी समझा. अब तक माना जा रहा था कि मंडल के बाद की राजनीति में भाजपा या कांग्रेस के लिए इन समूहों को पक्ष में नहीं किया जा सकता.

लेकिन इसने उस सूत्र को इजाद किया जिसमें मंडल के बाद की राजनीति के प्रभाव कम हुए. पिछले पांच सालों में मंडल आंदोलन की चेतना का विस्तार हुआ और हक, हिस्सेदारी और पहचान की उनकी आवाज ने राजनीतिक दीवारों को हिला भी दिया. आम चुनाव में यह आवाज पूरी ताकत के साथ अपनी उपस्थिति दिखा रही है.

हालांकि इन आवाजों में भी सत्ताविरोधी रूझान को कम करने का प्रयास सत्तारूढ दल की ओर से हो रहा है. देश का कोई भी ऐसा राज्य शेष नहीं है जहां असिमताओं के राजनीतिक गठबंधन नहीं किये गये हैं. अपवाद वाले राज्यों में उनके सामाजिक गठबंधन बनाने की पुरजोर कोशिश की गयी है.

भारत की राजनीति 1990 के बाद उस दौर में प्रवेश कर गयी है, जहां सामाजिक संदर्भ निर्णायक हैं. इसे समझने के लिए जरूरी है कि राजनीतिक दलों की रणनीति को जाना जाये. भारत में अनेक तरह की अस्मिताओं आवाजें उठी हैं.

इस के अपने सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संदर्भ हैं. लोकतंत्र में कुछ ही समूहों के वर्चस्व को तो 1990 के दशक में ही दरका दिया गया था. 2019 आते-आते उन ताकतों की मजबूरी हो गयी है  कि अस्मिताओं का न केवल सम्मान करें बल्कि उनकी हिस्सेदारी के साथ ही निर्णायक नेतृत्व दें.

इन समूहों ने अपनी आवाज के वैचारिक पहलू को भी तर्कसंगत बनाते हुए धार प्रदान किया है. यही कारण है कि इन समूहों की राजनीतिक हिस्सेदारी को अस्वीकार करने का साहस किसी में नहीं है. लोकतंत्र का यह एक सबाल्टन विस्तार है. अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी बढा कर इसे मुकम्मल बनाया जा सकता है.

2014 के बाद अल्पसंख्यक सवाल जरूर पीछे ले जाये गये हैं, लेकिन लोकतंत्र की चेतना इस सुनियोजित साजिश को देर-सबेर बेनकाब  करेगी. इसका प्रमुख कारण यह है कि राजनीतिक वंचना के शिकार जाति और क्षेत्रीय समूहों ने उनके साथ साझापन बढा कर राजनीति के तेवर को नई धार देने की इबारत लिख दी है.

इसे भी पढ़ेंः पित्रोदा के बयान से कांग्रेस का किनारा, बीजेपी-कांग्रेस में जुबानी जंग तेज

Related Articles

Back to top button