
Vivek sharma
RANCHI: कहते है बच्चे भगवान का रूप होते है. लेकिन समाज में कुछ लोग ऐसे है जो अपने बच्चे को लावारिस हाल में रोड किनारे छोड़ जाते है. लेकिन वे यह नहीं जानते कि उनकी इस गलती की सजा बच्चे को मिलती है. जबतक फेंके हुए बच्चे पर किसी की नजर पड़ती है तबतक न जाने कितने बच्चे मौत की नींद में सो चुके होते है. जबकि कुछ लोग तो बच्चों को मौत के बाद अंतिम संस्कार से बचने के लिए भी जहा-तहां फेंक कर निकल जाते है. इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है झारखंड में हर साल अलग-अलग जिलों से लगभग 70 लावारिस बच्चों की जानकारी मिल रही है. जिसमें ज्यादातर बच्चों की मौत हो चुकी होती है. बताते चलें कि पिछले पांच सालों में 365 नवजात रोड किनारे फेंके हुए पाए गए.
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‘पालो ना’ संस्था कर रही है काम
देश में एकमात्र संस्था ‘पालो ना’ मोनिका आर्या के नेतृत्व में देशभर में ऐसे बच्चों के लिए काम कर रही है. वहीं बच्चों को रेस्क्यू करने के बाद उन्हें देखभाल के लिए भी सुविधाएं मुहैया करा रही है. चूंकि जो बच्चे जीवित होते है उनके अडॉप्शन में भी सहयोग करती है ताकि बच्चे का अच्छे से पालन पोषण हो सके. उन्होंने कहा कि लोगों को खुद से जागरूक होना होगा. अगर वे बच्चों को नहीं चाहते है तो उसे सुरक्षित जगह पर पहुंचा दे.
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अनदेखी से बढ़ रहे मामले
नवजात को रोड किनारे या कहीं भी फेंक देना हत्या से कम नहीं है. ऐसे मामले कभी दर्ज ही नहीं किए जाते. इसलिए बच्चों को जिंदा या मृत फेंके जाने का कोई रिकॉर्ड पुलिस या प्रशासन के पास उपलब्ध नहीं है. मृत बच्चों के मामले में प्रशासन को लगता है कि मरे हुए बच्चों में भला किसकी दिलचस्पी हो सकती है. खासकर वैसे बच्चे जिन्हें उनके अपनों ने ही छोड़ दिया हो.
पालने में डाल दे तो बचेगी जान
पालो-ना का उद्देश्य बच्चों को लावारिस हाल में छोड़ने के खिलाफ है. फिर चाहे वह जिंदा हो या मरा हुआ. ऐसे में ‘पालो ना’ समाज से अपील कर रहा है कि बच्चों को लावारिस हालत में फेंकने की बजाय अगर प्रशासन की ओर से लगाए गए पालने में डाल दे तो उन्हें नया जीवन मिल सकता है. इसके लिए सरकारी हॉस्पिटल और जिला प्रशासन के आफिस में इसकी व्यवस्था भी की गई है.
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कब-कब मिले लावारिस
साल संख्या
2015 – 29
2016 – 29
2017 – 65
2018 – 82
2019 – 88
2020 – 72
टोटल 365
जिंदा 159
मरा हुआ 203
अनआइडेंटीफाइड 3




