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खिलाड़ियों से खेल ! स्पोर्ट्स कोटा से 2 फीसदी जॉब देने की थी बात, 18 सालों में मिली सिर्फ 5 नौकरी

बीजेपी ने चुनावी घोषणापत्र में सरकारी नियुक्ति में दो प्रतिशत आरक्षण की कही थी बात, 4500 से अधिक मिले आवेदन

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Kumar Gaurav

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Ranchi: झारखंड बने 18 साल हो गये. इन 18 सालों में कई सरकारें आयी और गई, लेकिन राज्य के खिलाड़ियों और खेल नीति को लेकर हालात नहीं बदले. भाजपा ने 2014 चुनाव के दौरान अपने घोषणापत्र में खेल और खिलाड़ियों को बढ़ावा देने की बात कही थी. जिसमें बीजेपी ने कहा था कि राज्य के राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय स्तर पर मैडल जीतने वाले खिलाडियों को सरकारी नौकरी में समायोजित करने की नीति बनाएगी. लेकिन घोषणा के अनुरूप, ऐसी कोई भी पॉलिसी सरकार ने अबतक नहीं बनायी है.

2007 में बनी थी पॉलिसी

इससे पहले 2007 में इसको लेकर पॉलिसी भी बनी थी, जिसमें सरकारी नौकरियों में मेडल प्राप्त खिलाड़ी को 2 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही गई थी. लेकिन पॉलिसी बनने के 18 सालों के बाद भी कुल 11 खिलाडियों को नौकरी नहीं मिल पाई है. राज्य के स्थापना के 18 सालों के बाद भी सिर्फ पांच खिलाड़ियों को ही नौकरी मिल पायी है. 2007 में पॉलिसी तो बनी पर वह सिर्फ कागजों पर सीमित रह गयी. खिलाड़ियों से दो बार आवेदन भी मांगे गये. 4500 से अधिक आवेदन मिले भी, लेकिन ये सिर्फ आवेदन तक ही सीमित रह गये. उस पर कोई विचार नहीं किया गया.

अब सरकार फिर से खेल नीति बनाने पर काम कर रही है, और ये नीति कब तक बन जाएगी ये विभाग के सचिव राहुल शर्मा बता पाने में असमर्थ है. उनका कहना है कि खेल नीति को लेकर निश्चित समय सीमा नहीं बताई जा सकती. इधर राज्य के प्रतिभावान खिलाड़ी सुरक्षित भविष्य के लिए आस लगाए बैठे हैं.

खेल विभाग भी अपने विभाग में नहीं दे रहा नौकरी

खिलाड़ियों के उत्थान के लिए काम करने वाले खेल विभाग भी अपने विभाग की नियुक्तियों में खिलाड़ियों का ख्याल नहीं रखता. स्पोर्टस कोटा के तहत एक भी खिलाड़ी को अपने विभाग में नौकरी नहीं दे पाए, जबकि दूसरे विभाग से अधिकारियों को लाकर काम चलाया गया. विभाग और सीसीएल के द्वारा भी चलाए जा रहे जेएसएसपीएस में भी खिलाड़ियो को नौकरी नहीं मिल पायी है.

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18 सालों में सिर्फ पांच खिलाड़ियों को नौकरी

राज्य गठन के 18 साल के बाद भी सिर्फ पांच खिलाड़ियों को ही राज्य सरकार ने नौकरी दी है. सभी पांचों खिलाड़ियों को नौकरी सिर्फ पुलिस विभाग में मिली है. अन्य किसी भी विभाग में आज तक किसी भी खिलाड़ी को नौकरी नहीं दी गई है. राज्य सरकार द्वारा निकलने वाले सरकारी नौकरी के विज्ञापन में भी पॉलिसी के तहत दिए जाने वाले 2 प्रतिशत आरक्षण का भी जिक्र नहीं होता और न ही लाभ मिल पाता है.

पलायन कर रहे खिलाड़ी

राज्य सरकार की बेरुखी के कारण राज्य को मेडल दिलाने वाले कई खिलाड़ियों ने दूसरे राज्यों का रुख कर लिया है. वे अब दूसरे राज्यों के लिए अपना जौहर दिखा रहे हैं. दूसरे राज्य की सरकार ने इन खिलाड़ियों की सूध भी ली है. वहां पर खिलाड़ियों को सरकार ने नौकरी भी दी है. सरकारी बेरुखी के कारण राज्य का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान बढ़ाने वाले खिलाड़ियों की उम्र भी सरकारी नौकरी की उम्मीद में खत्म हो गयी है.

क्या कहते हैं अधिकारी

झारखंड ओलंपिक एसोसिएशन के सिवेंद्र दूबे कहते हैं कि अभी तक कोई पॉलिसी नहीं बनी है. हम अभी तक इंतजार ही कर रहे हैं कि कोई पॉलिसी बने. हमलोग सुनते हैं कि नौकरी हो जाएगा. सुनते-सुनते कई खिलाड़ियों की उम्र भी निकल गई. हमलोग तो प्रयास करते रहते हैं, सरकार का ही काम रुकता रहता है. स्टाईपेन भी लटका रहता है.
वही खेल विभाग के सचिव ने कहा कि स्पोर्ट्स पॉलिसी पर काम चल रहा है. लेकिन अभी तक बनी नहीं है. पिछली पॉलिसी में कुछ बदलाव होने है जो समय के साथ जरुरी है. नियुक्ति कितनी हुई इसकी जानकारी नियुक्तियां करने वाले विभाग ही बता पाएंगे. खेल नीति बनाने का काम चल रहा है.

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