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क्या आदिवासी और दलितों के हक के लिए राजनीतिक नजरियों को कारपारेट नियंत्रण से मुक्त कर सकेंगे राजनीतिक दल

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Faisal Anurag

आदिवासियों और दलितों के लिए अचानक उमड़ते लगाव से चुनाव के समय तो यह पूछा ही जाना चाहिए जिन नीतियों के कारण इन समुदायों को लगातातार मुसीबतों का सामना करना पड़ता है, उसे ले कर राजनीति दलों में कितनी बेचैनी होती है. जाहिर है कि देश भर के आदिवासी इलाकों में जल, जंगल जमीन छीनने के सारे प्रबंध सरकार की नीतियों का ही हिस्सा हैं.

देश में विकास के नाम पर सबसे ज्यादा विस्थापन आदिवासियों और दलितों का ही हुआ है. संविधान में पांचवी सूची के प्रावधान के बाद भी आदिवसी समाज की संस्कृति और विरासत संकटग्रस्त है, तो इसके जिम्मेदार सत्तारूढ समूहों का ही रहा है.

दलितों को यदि आज भी घोड़ी पर चढ कर शादी करने से रोका जा रहा है, तो यह समाज के लिए शर्म की बात है. साथ ही गुजरात की सरकार के लिए बेहद ही खतरनाक संकेत हैं.

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भारत के संविधान ने तो सब को बराबरी का अधिकार दिया. लेकिन संविधान सभा में डॉ अंबेडकर का अमिट भाषण इन घटनाओं से ज्यादा प्रासंगिक होता जा रहा था. अंबेडकर ने इस भाषण में आर्थिक ओर सामाजिक समानता पर जोर देते हुए राजनीतिक समानता के लिए जरूरी बताया था.

राजस्थान  और गुजरात की हाल की घटनाओं तथा झारखंड के लातेहार की घटना ताजा उदाहरण हैं. दलित आदिवासी के लिए सरकारी रूख पर ये घटनाएं गंभीर टिप्पणी हैं. क्या आदिवासी और दलित मुख्यधारा के नारे केवल चुनावी इस्तेमाल के लिए ही बने हुए हैं.

आदिवासी और दलित समाजों के भीतर रोष विभिन्न आंदोलनों के रूप मे व्यक्त होता रहा है. जिसे सरकारें कुचलने में ही यकीन करती हैं.

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झारखंड में पिछले पांच सालों में आदिवासियों के आंदोलनों की धमक रही है. जिन्हें दमन करने का प्रयास किया गया है. अंतिम दौर के चुनाव में मुख्यमंत्री रघुवर दास आदिवासियों को केंद्र कर ही प्रचार अभियान को तेज कर चुके हैं. जबकि प्रधानमंत्री मोदी भी झारखंड के दौरों में आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन की बात करते रहे हैं.

आदिवासी समाज को इन भाषणों की तुलना में जमीनी हकीकत का अहसास है. आदिवासी मातृभूमि अधिग्रहण कानून को बदलने के प्रयास से वाकिफ भी है. और इसके प्रतिरोध में आंदोलन भी करते रहे हैं. इसी तरह जमीन बचाने के तमाम आंदोलन परवान चढ़े हैं. झारखंड के दलितों का गुस्सा भी पिछले साल दो अप्रैल को तब उभरा था जब आरक्षण और इनके लिए बने संरक्षात्मक कानून में बदलाव का प्रयास किया गया था.

झारखंड के दलित आंदोलन और अस्मिता को लेकर अलग से कम ही बातें की जाती हैं. इसके साथ ही झारखंड का दलित राजनीतिक नेतृत्व अपनी स्वतंत्र छवि नहीं बना पाया है. और न ही वह दलित सवालों पर मुखर रहा है. लेकिन आदिवासियों के नेतृत्व के बारे में यह बात नहीं की जा सकती है.

झारखंड आंदोलन ने न केवल आदिवासियों बल्कि मूलवासियों के बीच भी राजनीतिक जागरूकता को विकसियत किया था. उन्हें स्वर देने वाली आवाज भी राजनीतिक फलक पर छवि बनाने में कारगर हुई थी. झारखंड के इस चुनाव में जब आदिवासी सवाल पर बहस की जा रही है, तब आदिवसियों के वास्तविक सरोकार को दनकिनार करने का भी प्रयास किया जा रहा है.

यह एक ऐसी खतरनाक प्रवृति है जो कारपारेट हितों की वाहक है. आदिवासी समाज में अपनी जमीन बचाने के लिए अंतिम दम तक लडने का जज्बा दिखता रहा है. सवाल उठता है कि राज्य गठन के बाद भी झारखंड की राजनीति ने कारपारेट मुक्त राजनीति को विकसित क्यों नहीं किया. इसका जवाब सबसे ज्यादा दिनों तक सरकार चलाने वाले दल को देना ही चाहिए.

आदिवासी समाज की अस्मिता का सवाल एक प्रमुख सवाल है. इस के लिए पिछले दो सौ सालों से आदिवासी निरंतर संघर्ष कर रहे हैं. झारखंड के तमाम हुलगुलानों का सारतत्व भी इसी में अंतरनिहित है.

अस्मिता और संस्कृति का सवाल बेहद गंभीर है. लेकिन चुनावों की राजनीति में इसे ही सबसे ज्यादा नुकसान भी पहुंचाया जाता है. संसाधनों पर जनहक और प्रकृति के संरक्षण की आदिवासी विरासत पर चोट पहुचाने वाली नीतियों के खिलाफ झारखंड में लंबे समय से बहस जारी है.

अनेक तरह के जनांदोलनों ने इन नीतियों के खिलाफ प्रतिरोध की गाथा लिखी है. जनांदोलनों की तकतें इसे राजनीतिक तौर पर स्वर देने का प्रयास भी करती हैं. झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसी ताकत तो इन्हीं आंदोलनों के गर्भ से राजनीतिक आकार ग्रहण किये हुए हैं.

इसके साथ ही कुछ अन्य राजनीतिक ताकतों को भी इन्हीं आंदेालनों से प्रेरणा मिलती रही है. बावजूद झारखंड में जंगल और जमीन पर जनहक का सवाल हल नहीं हो पाया है. पिछले कुछ सालों में तो जिस तरह बड़ कारपारेट घरानों ने झारखंड की राजनीति में क्रोनी कैपिटल का प्रवाह किया है, उससे सबसे ज्यादा संकट आदिवासियों की विरासत को ही है.

स्वास्थ्य या शिक्षा का कोई भी सवाल हो, झारखंड के जनगण की पहुंच से बाहर ही है. आदिवासी और झारखंडी भाषा का सवाल भी कम नही है.

संताल परगना में रधुवर दास ने यह कह कर कि झामुमो आदिवासियों की शिक्षा को बाधित कर रहा है, इस बहस को तेज कर दिया है कि राज्य बनने के बाद जब उनकी पार्टी ही सबसे ज्यादा दिनों तक सत्ता में रही है, तब शिक्षा का बेहतरीन संस्थान जो गरीबों की पहुंच में हों, क्यों नहीं विकसित हुए.

पिछले पांच सालों में तो शिक्षा का अधिकार कानून का उल्लंघन कर जिस तरह स्कूलों का मर्जर किया गया है, उसका प्रभाव भी सुदूर ग्रामांचल पर पड़ा है. लड़कियों तथा लडकों के लिए शिक्षा की सुलभता प्रभावित हुई है. स्कूल मर्जर का तो भाजपा के भी कई नेताओं ने विरोध किया है.

झारखंड में शिक्षा का सवाल व्यपाक नजरिये की मांग करता है. क्योंकि झारखंड के सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप शिक्षाशास्त्र की मांग झारखंड आंदोलन के समय से गंभीरता से उठती रही है. कारपारेटपरस्त राजनीति ओर उनके पैरोकार दल कभी भी आदिवासी और दलित इंसाफ के वाहक नहीं बन सकते हैं.

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