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चुनाव आयोग के संदर्भ में उठे सवाल दे रहे गंभीर हालात की चेतावनी

Faisal Anurag

चुनावों की सरगर्मी में चुनाव आयोग को लेकर विवाद गहराता जा रहा है और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पूरी तरह  संदेहास्पद हो चुकी है और प्रचार के दौरान राजनीतिक नेताओं के एक दूसरे पर निजी हमले लोकतांत्रिक मर्यादाओं की सीमा पार कर चुकी है.

चुनाव आयोग की पक्षधता का आलम यह है कि वह आदर्श आचार संहिता को लागू कराने में पूरी तरह विफल साबित हो रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने पहले कहा कि चुनाव आयोग आचार संहिता के अनुरूप शिकायतों पर कार्रवाई करेगा या कोर्ट कदम उठाए.

खानापूर्ति करते हुए आयोग ने कुछ नेताओं पर कार्रवाई करने का संकेत दिया. लेकिन बड़े नेता जिसमें प्रधानमंत्री भी शामिल हैं, को आयोग लगातार क्लीन चिट दे रहा है. चुनाव आयोग   को लेकर सोशल मीडिया में अत्यंत गंभीर टिप्पणियां की जा रही हैं और टीएन शेषन के जमाने को शिद्दत से याद किया जा रहा है.

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लोग तो यहां तक कहने लग गए हैं कि वर्तमान चुनाव आयोग आयोग के नेतृत्व में सबसे विवादास्पद हो गया है. इस तरह की धारणा किसी भी सूरत में लोकतंत्र  के लिए गंभीर चिंता का कारक है.

चुनाव आयोग को लेकर यह भी कहा जा रहा है कि वह न केवल दबाव में है, बल्कि उसकी गतिविधियों से आयोग की गरिमा प्रभावित हुई है. यह आरोप अनके पूर्व चुनाव आयुक्त भी लगा रहे हैं.

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अब तो यह भी कहा जा रहा है कि यह पहला अवसर है जब यह साफ महसूस किया जा रहा है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए आयोग ने सभी के लिए समतल धरातल प्रदान करने की अपनी प्रतिबद्धता को नहीं निभा पा रही है. भारत में जीवंत लोकतंत्र के लिए कार्यरत और चिंतित समूहों की ओर से बात कही जा रही है.

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आपातकाल के बाद हुए चुनाव के दौरान भी चुनाव आयोग पर इस तरह के आरोप नहीं लगे थे. भारत के चुनाव आयुक्तों को कई बार दुनियाभर के अनेक देशों में निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव के लिए परामर्श लिया जाता रहा है. भारत के कई चुनाव आयुक्त को वर्ल्ड कोर्ट में भी सम्मान पूर्वक पद दिया गया है.

भारत के चुनावों पर निगाह रखने वाली विश्व की कई अहम संस्थाओं के लिए भी 2019 का चुनाव कई मायनों में बहुत अलग दिख रहा है. चुनाव के बाद इन संस्थाओं की रिपोर्ट आएगी. लेकिन संकेत मिल रहे हैं कि वे भी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि सभी राजनीतिक दल एक समान धरातल पर चुनाव लड़ने का अवसर नहीं पा रहे हैं.

राजनीतिक चंदों का मामला हो या चुनाव खर्च का. चुनाव के दौरान जिस अनुपात में कालाधन जब्त किया गया है ,वह भी चुनावों के लिए एक गंभीर चेतावनी है.

चुनाव आयोग ने खर्च की जो सीमा तय कर रखी है, उसपर कोई ठोस निगरानी करने में कामयाबी नहीं मिल रही है. अनेक ऐसे प्रत्याशी हैं जिनके खर्च ही बता रहे हैं कि वे 70 लाख की निर्धारित सीमा का अतिक्रमण कर रहे हैं. चुनाव आयोग के अधिकारी इससे किस तरह गैर जानकार बने हुए हैं यह भी एक रहस्य का विषय है.

पिछले कई चुनावों से जिस तरह कॉरपोरेट घराना का नियंत्रण बढ़ा है, उससे न केवल छोटे दल बल्कि मध्यवर्ग के प्रत्याशियों के लिए भी भी प्रचार अभियान में डटे रहना मुश्किल हो गया है. यही कारण है कि इस बार के चुनाव में यह साफ देखा जा सकता है कि चुनाव प्रचार में दो बड़े दलों के बीच भी कितना अंतर है, छोटे दलों के लिए तो इस होड़ में बने रहना ही मुश्किल टास्क हो गया है.

प्रचार का तंत्र जिस तरह कंपनियां नियंत्रित कर रही हैं, उससे भी भारतीय राजनीति से वे सवाल लगातार हाशिए पर जा रहे हैं जो कि रोजमर्रा का हिस्सा हैं. पहले तीन दौर में मतदाताओं के उत्साह की कमी भी निराशा की ही कहानी कह रहे हैं. यहां तक 2014 के चुनाव में भी बेरोजगारी, किसानी और आर्थिक न्याय के अनेक पहलू पर मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने विकास का एजेंडा खड़ा किया था.

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लेकिन 2019 आते-आते भाजपा ने अपना पक्ष बदल लिया है. उसने तो अपने घोषणा पत्र जिसे वह संकल्प बता रही है, उसमें तो बेरोजगारी के सवाल का उल्लेख तक नहीं किया है. यह उस माहौल में हुआ है, जबकि सारे आंकड़े चेतावनी दे रहे हैं कि बेरोजगारी 45 सालों में सबसे भयावह दौर में हैं. भाजपा ने भावनात्मक सवालों को ही अपने प्रचार का हथियार बनाया है.

कांग्रेस सहित अन्य क्षेत्रीय दलों के मुद्दों पर तो मुख्यधारा मीडिया में न्यूनतम चर्चा है. भारत के किसी भी चुनाव में अब तक ऐसा नहीं देखा गया है कि एक ओर जहां चुनाव आयोग पक्षधर भूमिका में दिख रहा है, वहीं मीडिया एकपक्षीय झुकाव की शिकार हो गयी है. मीडिया का यह रूझान किसी भी लोकतंत्र के लिए बेहद गंभीर मामला है.

माना जाता है कि मीडिया लोकतंत्र का वह मजबूत स्तंभ है, जो सत्ता और राजनीतिक दलों के निरंकुश प्रवृति पर अंकुश लगाता है. विमर्श से इस तरह के मुद्दे कहीं दिखते ही नहीं हैं. अनेरिका की मीडिया से भारत की मीडिया की तुलना की जाए तो साफ देखा जा सकता है कि दोनों के सत्ता विषयक रूझान में कितना अंतर है.

अमेरिकी मीडिया अपने सत्ताधारियों से तीखे सवाल पूछने के लिए ट्रंप की आलोचनाओं का सबसे ज्यादा शिकार है. भारत की  मुख्यधारा मीडिया के संदर्भ में यह स्पष्ट नहीं कहा जा सकता है. चुनाव आयोग और मीडिया के संदर्भ में उठे सवाल गंभीर हालात की चेतावनी दे रहे हैं.

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