Opinion

फेज दर फेज राजनीतिक दलों की बदल रही रणनीति के बावजूद मतदाओं का रूख स्पष्ट नहीं

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Faisal Anurag

आमचुनाव में हर चरण के बाद जिस तरह की राजनीतिक सामाजिक गोलबंदी हो रही है, उससे राजनीतिक दलों के भीतर बेचैनी बढती जा रही है. मतदाताओं की खामोशी ने भी राजनीतिक दलों को हर फेज के बाद रणनीति बदलने के लिए मजबूर कर दिया है. अब तीन फेज के चुनाव ही बाकी रह गये हैं.

प्रचार अभियान के बदलते मुद्दों के बीच अब यह समझना लगातार मुश्किल होता जा रहा है कि मतदाता किन सवालों को प्रमुख मान कर वोट दे रहे हैं.

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पहले तीन फेज में हुए मतदान में वोट प्रतिशत में आयी गिरावट का संदेश क्या है. इसे लेकर भी राजनीतिक दलों में मंथन तेज है.

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माना जा रहा है कि बढ़ती गर्मी के बीच हो रहे मतदान में मतदाओं का उत्साह पिछले कई चुनावों की तुलना में कम है. मतदाओं का रूझान भी स्पष्ट महसूस नहीं किया जा रहा है. पार्टियों के समर्थक जरूर अपने दावे कर रहे हैं.

लेकिन निष्पक्ष प्रेक्षकों के लिए उन दावों से इत्तेफाक रखना मुश्किल हो रहा है. 2014 में जब शाइनिग इंडिया के शोर में चुनाव हो रहा था तब केवल एक पत्रकार संकर्षण ठाकुर ने लिखा था कि चुनावों के परिणाम भाजपा की अपेक्षा अनुकूल नहीं होने जा रहे हैं.

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जब देश का सारा मीडिया एक स्वर से विपक्ष को खारिज कर चुका था, तब संकर्षण ठाकुर से सहमत होना लोगों के लिए आसान नहीं था. लेकिन उस चुनाव में जिस तरह मेहनतकश तबकों का आक्रोश चुनावों के रिजल्ट में दिखा उससे मीडिया और चुनावों की भविष्यवाणी करने वाले सर्वेक्षणों ओर एक्ज्टि पोल की साख पर भारी आधात लगा. कुछ इसी तरह बाबरी मस्जिद के गिराये जाने के बाद जब केंद्र सरकार ने पांच राज्य सरकारों को बर्खासत कर दिया था, उसके बाद हुए उत्तर प्रदेश के चुनाव में मीडिया भारतीय जनता पार्टी की बड़ी जीत के दावे कर रहा था.

तब सुरेद्र प्रताप सिंह ने टेलिग्राफ में लिखा था कि यूपी का रिजल्ट सपा बसपा के पक्ष में जायेगा. तब एसपी के नाम से मशहूर इस प्रत्रकार के विश्लेषण को राजलनीतिक और मीडिया के गलियारे में खडा कर दिया था.

लेकिन यूपी में मुलायम कांशीराम के तालमेल ने यूपी की राजनीतिक जमीन में सर्वाल्टन समूहों के उभार ने दिखा दिया कि उसमें राजनीति को बदलने का दम है.

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मंडल कमीशन लागू होने के बाद बिहार और यूपी की राजनीति हमेशा के लिए बदल गयी. 2014 में जरूर इस पर लगाम लगा है. लेकिन इन राज्यों में भाजपा की एकतरफा जीत में सबसें बड़ी भूमिका वो सोशल इंजीनिसयरिंग कर रही है जिसमें सत्ता से वंचित अन्य पिछड़ों और दलितों को अपने पक्ष में करने के लिए उनके तमाम जाति आधारित पार्टियों के साथ तालमेल किया.

इसमें गैर यादव और गैर यादव जातियों के साधने की रणनीति में भाजपा कामयाब हो गयी. लेकिन 2019 के चुनाव में इन दोनों ही राज्यों का यह तानाबना टूटा हुआ है.

यूपी में भाजपा ने निषाद पार्टी का विलय तो करा लिया है लेकिन उसके जीते हुए उम्मीदवार को गोरखपुर का सीट नहीं दे कर निषादों के भीतर नारजगी ही पैदा की है. राज्यभर की नारजगी भी साफ नजर आ रही है. इस बीच कई ऐसी बातें हुई हैं जिससे इन तबकों में भाजपा के प्रति पैदा हुई नारजगी के दूर होने का कोई संकेत अब तक नहीं मिला है. बिहार में भी तेजस्वी यादव ने उन जातियों के नेताओं के साथ गठबंधन बना कर 2014 की धारा को उलटने की दिशा में कदम बढ़ाने का प्रयास किया है. दूसरी ओर से भाजपा में इस बात को ले कर लगातार मंथन चल रहा है कि वह इन तबकों की नाराजगी को दूर करने की रणनीति किस तरह बना सकती है.

इन दोनो बड़े राज्यों, जहां लोकसभा की 120 सीटें हैं, के राजनीतिेक नतीजे बेहद महत्वपूर्ण साबित होंगे. क्योंकि इन राज्यों का असर भी चुनावों में व्यापक रहा है.

इन राज्यों को ध्यान में रख कर ही नरेंद्र मोदी ने पिछड़ा कार्ड खेला है. देखना है कि क्या इसका कोई असर होगा या नहीं. क्योंकि यूपी में तो उनके पिछडे होने को लेकर अब विपक्ष पूरी तरह हमलावर है.

और पिछड़े और दलितों के लिए किये गये पांच साल के कार्यो का वह लेखा-जोखा पेश कर रहा है. एक अन्य बड़े राज्य महाराष्ट्र, जहां लोकसभा की 48 सीट है, का चुनावी नरेटिव भी बहुत कुछ अलग दिख रहा है. इस राज्य में चुनाव से अलग रहने वाले राज ठाकरे की सभाओं की पूरे देश में चर्चा हो रही है.

ठाकरे हमलावर अंदाज में मोदी और शाह पर हमला कर रहे हैं. उनके प्रचार का तरीका गैर परंपरागत है और उसकी बहुत ज्यादा चर्चा हो रही है. भाजपा शिवसेना गठगबंधन ठाकरे के प्रचार अभियान से असहज हैं.

इस राजनीतिक हालात में मतदाताओं की नब्ज को पढने में मीडिया सहित राजनीतिक प्रेक्षकों को भी भारी दिक्कत हो रही है.

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