
Firoz Ali
पुलवामा हमले की अब मैं बात क्या करूं,
जख्मी हैं लब के जिकर-ए-वारदात क्या करूं.
कभी बेगम, कभी पत्नी, कभी अर्धांगनी थी मैं,
था फौजू सुहाग मेरा और सांगनी थी मैं.
साजन बगैर आई है बारात क्या करूं
मुझ से बिछड़ने की उन्हें जल्दी थी किस कदर,
जी भर के उन को मैंने देखा ना एक नजर.
तनहा अब जिंदगी की शुरूआत क्या करूं
मां को संभाला, लाठी बनी बूढ़े बाप की,
मुझ को संभाले कौन के बेवा हूं आपकी.
तुम ही ना रहे तो ले के कायनात क्या करूं
सुनी कलाई देख मां मुझसे लिपट गई,
सावन था आंसुओं की और मैं सिमट गई.
तिरंगे में लिपटा आया जो सौगात क्या करूं
शहादत से तेरी देश का सम्मान बढ़ गया,
मेरी सुनी मांग का अभिमान बढ़ गया.
आंखों से फिर भी बरसे बरसात क्या करूं
(लेखक सीआरपाएफ में कार्यरत)




