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भारत आखिर क्यों चुप है 34 अनाथ नाबालिग लड़कियों के साथ हुई हैवानियत पर ?

जो खामोश बैठा वो भी गुनहगार है !

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Tirth Nath Akash

तारीख बस तारीख ही हमें याद रहती है. कभी शहादत दिवस के रुप में मनाते हैं और कभी जन्मदिवस के रुप में, एक दिवस हिन्दुस्तान को और मनना चाहिए वो है ‘दुष्कर्म दिवस’. हां, शायद यह शब्द शिक्षित समाज के लिए अशोभनीय है लेकिन क्या करें और कहां जाए कभी निर्भया तो कभी कठुआ. अभी इन जख्मों से हम उबरे ही नहीं थे कि एक और सनसनीखेज खुलासा हुआ मुजफ्फरपुर के एक सेल्टर होम में 34 अनाथ नाबालिग लड़कियों का रेप किया जाता था. इस घटना को अंजाम देने में सेल्टर होम को चलाने वाला बहुत रसूख और राजनीति जगत का नामी चेहरा बिहार निवासी ब्रजेश ठाकुर का नाम आया है. सवाल यह नहीं है कि आरोपी कौन है? सवाल यह है कि हम निर्भया केस में, निर्भया को इंसाफ दिलाने के लिए सड़कों पर उतर जाते है. मोमबत्ती जलाते हैं, इंसाफ़ की गुहार लगाते हैं. अपना हक़ मांगते हैं ठीक ऐसा ही कठुआ रेप केस में भी देखने को मिला. कमोबेश आक्रोश और विरोध हर जगह दर्ज करवायी गया लेकिन जैसे ही मेरी नज़र 34 पीड़ित लड़कियों पर जाती है तो लगता है एक खामोशी छाई हुई है. हमारे समाज और इस देश में जहां एक तरफ वो बुद्धिजीवी लोग जो हर रेप की घटना पर अपना विरोध प्रकट करते थे. लेकिन आज वो खामोश क्यों है?

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क्या खामोशी का कारण है बच्चियों का अनाथ होना ?

इस दर्दनाक घटना पर खामोश रहने का कारण राजनैतिक गलियारा तो नहीं या फिर कोई खुद का स्वार्थ या फिर उन बच्चियों का अनाथ होना. उस खामोशी में बहुत सारी चींखें-सिसकी और आंसूओं का सैलाब शुमार है. काश, उन बच्चियों में मैं और आप निर्भया या खुद की बहन को देख पाते तो शायद उनके दर्द को समझ पाते. बस महसूस करो, लड़की बनकर उन मंजरों को जब किसी का रेप होता है यकीनन आपकी आत्मा बिलख-बिलख कर रो पड़ेगी. लेकिन जुबान खामोश रहेगी, क्योकि गलती का सारा श्रेय तो इन्हीं अनाथ लड़कियों पर थोपा जाएगा. यह मात्र काल्पनिक कहानी नहीं है. यथार्थ तो यही है कि लड़कियों को ही दोषी माना जा रहा है. क्या ऐसा नहीं लगता है कि इस केस को जातिवाद का रंग दिया जा रहा है. यदि क़ानून सभी के लिए समान है तो अभी तक क्यों नहीं कार्रवाई हुई. यदि सरकार का प्रमुख ऐजेंडों में से एक ऐजेंडा था कि नारी की सुरक्षा तो सरकार इस ऐजेंडा में पूरी तरह विफल रही है. बस सोशल मीडिया को छोड़कर किसी भी चैनल में यह मुद्दा बहस का मुद्दा नहीं बना. अब अखबार और न्यूज चैनल पूरी तरह से PMO के कब्जे में है. मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है लेकिन एक मुख्य स्तंभ भी होता है जो है जनता, और जनता सर्वोपरि है. कमोवेश जनता का जिक्र कहीं नहीं होता है.

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जो खामोश बैठा वो भी गुनहगार है !

ब्रजेश ठाकुर की पत्नी का बयान है जो पीड़ित लड़कियां हैं, वह सन्नी लियोन की फेन है. मैडम, हमारे देश में लड़कियां पीटी उषा, मदर टेरेसा, इंदिरा गांधी, कल्पना चावला को अपना आदर्श मानती हैं. आपके बयान से यह साफ झलकता है कि आप अपने पति की हिमायत कर रही हैं और यदि एक औरत होकर भी आप दूसरी औरत के दर्द को नहीं समझ सकती तो आपको इंसान होने का हक नहीं है. आप उतनी ही गुनहगार है जितने आपके पति ब्रजेश ठाकुर. आप हर घटना को जानती थी फिर भी खामोश रही इसलिए अपराधी आप भी हो और हर वह शख्स अपराधी है जो इस जघन्य अपराध के होने और जानने के बाद भी खामोश बैठा है. आज पीड़ित लड़कियां दर्द झेल रही हैं. इस बात कि क्या गारंटी है कि इस हवस की शिकार आपकी बहन या मेरी बहन नहीं होगी? क्या तब भी आप और हम इस मंजर को खामोशी से देखेंगे और इसे नियति समझकर चुपचाप बैठकर अपनी बहन को कोसेंगे और बार-बार यही कहेंगे लड़की पैदा ही नहीं होनी चाहिए. वह समय दूर नहीं, जब हमारे समाज के कुछ हवशी जानवर आपके और हमारी बहनों की इज्जत तार-तार करेंगे. उठो-जागो और अपने और दूसरों के इंसाफ के लिए एकजुट हो जाओ. शंखनाद का बिगुल फूंक दो, यकीन मानो बदलाव आएगा. चुपचाप तमाशा देखने से अगला नम्बर हमारे घर का होगा. फैसला आपको और हमें करना है कि इंसाफ के लिए लड़ना है या बुजदिल होकर चुपचाप भीड़ में खड़े होकर तमाशा देखना है. फिर बुदबुदाते हुए कहना भगवान यह घटना किसी दुश्मन के साथ भी ना हो.

ये लेखक के निजी विचार हैं.

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