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बड़ा सवाल: निगरानी मंत्रीमंडल में किसने रोक रखा है 4 करोड़ के घपले के जिम्मेदार IAS मनोज कुमार की फाइल

Ranchi: धनबाद नगर निगम में काम एक करोड़ का और भुगतान पांच करोड़ रुपए का. इस मामले में आखिर किसके आदेश के बाद फाइल निगरानी मंत्रीमंडल में फंसी हुई है. मेयर शेखर अग्रवाल की शिकायत के बाद नगर विकास मंत्री सीपी सिंह ने विभागीय जांच करवाई. जांच में आरोप सही पाया गया. आरोप सही पाने जाने के बाद मंत्री सीपी सिंह ने पूरे मामले की जांच एसीबी से कराने के लिए फाइल मुख्यमंत्री रघुवर दास के पास भेजी. जानकारी के मुताबिक फरवरी में सीएम ने एसीबी जांच की स्वीकृति कर फाइल को निगरानी विभाग में भेज दिया.

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फरवारी के बाद छह महीने बीत गए. फाइल जस की तस निगरानी मंत्रीमंडल में पड़ी हुई है. इस विभाग के मंत्री भी मुख्यमंत्री ही हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर किसके निर्देश या आदेश के बाद फाइल को निगरानी में धूल चाटने के छोड़ दिया गया है. जब विभाग ने मामले में गड़बड़ी पायी. मंत्री ने विभाग की जांच को गंभीरता से लिया और एसीबी जांच के लिए लिखा तो कैसे कार्रवाई नहीं हो रही है ?

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सरकार ने कंपनी से पैसे वापस लेने के लिए नहीं की कार्रवाई

कंपनी पर सरकार किसी तरह की कार्रवाई करती, इससे पहले ही कंपनी हाईकोर्ट चली गयी. हाईकोर्ट ने कंपनी के पक्ष में आदेश दिया. कोर्ट के आदेश के बाद अब सरकार या विभाग कंपनी की बैंक गारंटी जब्त नहीं कर सकती है. लेकिन सरकार या विभाग की तरफ से कंपनी पर जो क्रिमीनल केस हुआ है. उसपर सरकार सुस्ती क्यों दिखा रही है ? हाईकोर्ट ने बैंक गारंटी जब्त करने के आदेश दिये हैं. ऐसे में घोटाला करने के एवज में विभाग या सरकार की तरफ से क्रिमीनल केस के तहत कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन सरकार का इस ओर ध्यान नहीं है.

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विभाग के चार करोड़ गए पानी में

धनबाद के तत्कालीन मुख्य कार्यपालक अधिकारी मनोज कुमार के विरुद्ध नगर विकास मंत्री और मुख्यमंत्री की अनुशंसा के बाद भी भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने महीनों बाद भी जांच शुरू नहीं कर सका. क्योंकि फाइल किसी बड़े शख्सियत के इशारे के बाद निगरानी में ही दबी है. मामला अभी भी मंत्रिमंडल निगरानी में जाकर फंसा है. 2007 बैच के प्रमोटी आईएएस अधिकारी मनोज कुमार अभी निदेशक समाज कल्याण के पद पर पदस्थापित हैं.

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क्या है पूरा मामला ?

मनोज कुमार पर धनबाद नगर निगम में ई-गवर्नेंस का काम करने वाली कंपनी को चार करोड़ के अधिक भुगतान का आरोप है. नगर विकास विभाग की तरफ से आरोप सही भी पाया गया है. दूसरी तरफ कंपनी आराम से निगम का चार करोड़ रुपया लेकर फरार हो गयी. सरकार कंपनी से चार करोड़ रुपए वसूलने में पूरी तरह से असमर्थता दिखा रहा है. तो क्या पब्लिक के ये चार करोड़ पानी में गए. सवाल है कि क्या झारखंड में किसी कंपनी को मनमानी करने का पूरा हक है ?

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