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टुकड़े-टुकड़े गैंग टीवी बहसों का चर्चित मुहावरा तो बना, पर गृहमंत्री और उनका मंत्रालय नहीं जानता कौन है इसके सदस्य

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Faisal  Anurag

टुकड़े-टुकड़े गैंग, भारतीय जनता पार्टी का एक ऐसा राजनीतिक एजेंडा है, जिसका उपयोग प्रधानमंत्री, गृहमंत्री सहित भाजपा के नेता अक्सर इस्तेमाल करते रहे हैं. इस मामले को इस तरह पेश किया ताजा रहा है मानो देश की समस्याओं की जड़ यही है.

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सरकार के विरोध में जब कभी कैंपसों से आवाज उठती है, आरोप के तौर पर टुकड़े-टुकड़े गैंग कहा जाने लगता है. इस के साथ अर्बन नक्सल की संज्ञा भी दी जाने लगी है. लेकिन दिलचस्प ताजा खबर यह है कि गृह मंत्रालय को इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि यह गैंग कब अस्तित्व में आया.

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और इसके सदस्य कौन-कौन हैं. यह स्वीकारोक्ति गृह मंत्रालय ने की है. साकेत गोखले के आरटीआई के जवाब में गृह मंत्रालय ने कहा है कि उसे इस बात की कोई जानकारी नहीं है.

टुकड़े-टुकड़े गैंग टीवी बहसों का चर्चित मुहावरा बन चुका है. खास कर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्याय से जब कोई आवाज छात्र उठाते हैं उन्हें टुकड़े-टुकड़े गैंग कहा जाने लगता है. 2016 में यह मुहावरा पहली बार उपयोग में आया था.

इस शब्द का इस्तेमाल जेएनयू छात्रसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष कन्हैया कुमार सहित अनेक छात्रों के संदर्भ में किया गया था. इन में कई छात्रों पर देशद्रोह का मामला भी दर्ज किया गया. जेएनयू में नकाबपोशों द्वारा लगाए गए नारे का एक टेप प्रकाश में आने के बाद यह बात कही गयी थी.

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आजकल यह मुहावरा हर उस व्यक्ति के खिलाफ इस्तेमाल होता है जो हक के लिए आवाज उठाते हैं. और सरकार के विरोध में बातें करते हैं.

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 2016 के बाद से अभी तक दिल्ली पुलिस उस कथिप टेप की प्रमाणिकता साबित नहीं कर सकी है. सरकार की ही कई एजेंसियां उस टेप  से छेड़छाड़ करने का आरोप लगा चुकी हैं. दिल्ली विधानसभा चुनाव के शुरू होते ही इस मुहावरे का फिर जोरशोर से प्रचलन होने लगा है. ट्रोल सक्रिय हो चुके हैं.

अमित शाह भी दिल्ली में एक सार्वजनिक मंच से इस मुहावरे का इस्तेमाल कर चुके हैं. दिल्ली की ही एक सभा में प्रधानमंत्री भी इस मुहावरे के इस्तेमाल से खुद को नहीं रोक सके हैं.

सवाल उठता है कि आखिर सत्ता में बैठे लोग जांच हो जाने के बाद भी आरोपों को प्रमाणित क्यों नहीं कर सके. सीएए, एनपीआर, एनआरसी के विरोध में उठ खड़े हुए आंदोलनों के क्रम में ट्रोल करने वाले इस मुहावरे के साथ सक्रिय हैं. दिल्ली के चुनाव प्रचार में भी इस मुहावरे की गूंज सुनी जा सकती है.

2016 फरवरी में अरविंद केजरीवाल ने स्टैंड विथ जेएनयू के साथ खुद को खड़ा किया था. राहुल गांधी ने भी जेएनयू जा कर छात्रों के साथ अपनी एकजुटता जतायी थी. इन दोनों नेताओं के खिलाफ भाजपा का आरोप रहा है कि वह देश के टुकड़े-टुकड़े गैंग को बढ़ावा देते हैं. दिल्ली के चुनाव में विकास के मुद्दे गौण हैं.

आम आदमी पार्टी शिक्षा, हेल्थ, बिजली व पानी के क्षेत्र में किये गये अपने पांच साल की उपलब्धियों को ले कर वोट मांग रही है. लेकिन भाजपा विकास के सवाल को चुनाव में उठाने से कतरा रही है.

भारत की चुनावी राजनीति में वोटरों को प्रभावित करने के लिए भविष्य का सपना दिखाने के बजाय ऐसे सवालों को उठाया जाता है जो संकीर्ण राष्ट्रवाद से जुड़ा होता है. आखिर राजनीतिक दलों को हेल्दी बहस में जाने के बजाय इस तरह के सवालों को उठाने की मजबूरी क्या है.

वोटरों की आर्थिक सामाजिक जरूरतों को हल करने का लक्ष्य यदि चुनाव का मुद्दा नहीं है, तो यह गंभीर चिंता की बात होनी चाहिए. संकीर्णवादी विभाजन के सवालों पर चुनाव में जीत हासिल तो किया जा सकता है, लेकिन वह लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर ही करता है.

भारत में जिस तरह के राजनीतिक हालत बने हुए हैं वह जार्ज आरवेल के मशहूर उपन्यास ‘1984’ की याद दिलाते हैं. असभ्य व अपशब्दों के बढ़ते राजनीतिक प्रचलन के दौर में आरवेल की इस किताब की अहमीयत बढ़ गयी है.

आरवेल ने जिस तरह के हालात की परिकल्पना की थी वह कमोबेश अब दिख रही है. आरवेल ने अपना यह उपन्यास 1949 में प्रकाशित हुई थी. दूसरे महायुद्ध के तुरंत बाद लिखी गयी इस किताब में तानाशाही के उस दौर को दिखाया गया है.

जो हर चीज को अपने नियंत्रण में रखना चाहता है. और आलोचना की इजाजत किसी को नहीं देता है. सत्ता की आलोचना को देश की आलोचना मान लेता है और उत्पीड़न के एक भयावह तस्वीर पेश करता है. इस पुस्तक का सार है कि तानाशाह अपनी सत्ता का विसतार करता है और वह आजादी, सवाल करने और चिंतन के खिलाफ होता है.

दुनिया के अनेक देशों में जिस तरह के राजनीतिक बदलाव का दौर देखा जा रहा है. उसमें विरोध को कुचलने के लिए ऐसे मुहावरे बनाये जाते हैं, जिससे दमन करना आसान हो जाता है. भारत के लोकतंत्र की मुख्य ताकत उसका संविधान है.

भारत के संविधान की मूल अवधारणा से छेड़छाड़ करना आसान नहीं है. इसका कारण देश की अवाम है, जो इस संविधान को हर हालत में बचाने और उसके आधार पर जीने के लिए प्रतिबद्ध है.

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