
Ranchi: जेवीएम की हर राजनीतिक चाल बाबूलाल और उनकी टीम को बीजेपी कार्यालय के नजदीक ले जा रही है. मंगलवार को जेवीएम के प्रधान महासचिव अभय सिंह ने मांडर के जेवीएम विधायक बंधु तिर्की को पार्टी से छह साल के लिए निष्कासित कर दिया है.
जाहिर है, ऐसा बाबूलाल मरांडी के इशारे पर ही हुआ है. साथ ही दसवीं अनुसूची के कायदों के अनुरूप पार्टी का विलय बीजेपी में आसानी से हो जाए, इसलिए ऐसा किया गया है. लेकिन ये कहना कानूनी रूप से गलत होगा कि जेवीएम के बीजेपी में जाने से जेवीएम का अस्तित्व खत्म हो जाएगा.
इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आये हैं कि पार्टी का विलय किसी दूसरी पार्टी में तो हुआ. लेकिन पुरानी पार्टी का वजूद बना रहा. ऐसा कानूनी दाव पेंचों से हो पाना संभव है.
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कैसे बचेगा कंघी
– सुप्रीम कोर्ट ने अमर सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में अपने फैसले में इस तरह के मर्जर को लेकर फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दसवीं अनुसूची के पारा 2 (1) के मुताबिक, कोई भी जनप्रतिनिधि उस पार्टी का हिस्सा सदा बना रहेगा जिस पार्टी से वो चुनकर जनप्रतिनिधि बना है.
चाहे पार्टी उसे बाहर का रास्ता दिखाये या निष्कासित कर दे. साथ ही बाहर निकाले जाने के बावजूद दसवीं अनुसूची में नियमों में वो शामिल होंगे. दसवीं अनुसूची में दो तिहाई विधान दल के सदस्य का विलय में होना जरूरी है. ऐसे में बाबूलाल मरांडी के पास कानूनी अड़चन खत्म नहीं हुए हैं.

– बिहार में भी एक ऐसा उदाहरण सामने आया था. नीतीश कुमार की अगुआई में समता पार्टी का विलय जनता दल यूनाइटेड में हो रहा था. लेकिन सांसद पीके सिन्हा पार्टी के फैसले के विरुद्ध गये.
उन्होंने विलय में नीतीश कुमार का साथ नहीं दिया. भले ही पूरी पार्टी नीतीश के साथ जदयू में चली गयी, लेकिन पीके सिन्हा समता पार्टी के ही सांसद बने रहे.
इन्हीं उदाहरणों और फैसलों के बल पर अब पार्टी के विधायक प्रदीप यादव और बंधु तिर्की पार्टी और उसके सिंबल को बचाने की कोशिश में लगे हैं. लेकिन देखने वाली बात होगी कि आखिर प्रदीप यादव और बंधु तिर्की इन सभी तकनीकों से पार्टी को बचा सकते हैं. इस बीच यह तय है कि जेवीएम का विलय बाबूलाल मरांडी बीजेपी में करके ही रहेंगे.
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