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27 जून को आखिर घाघरा, चामडीह गांव में हुआ क्या था ? सुनिए पूरी कहानी प्रत्यक्षदर्शियों की जुबानी

‘पत्थलगड़ी सदियों पुरानी परंपरा, पुलिस हमें आखिर क्यों रोक रही है?’

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Pravin Kumar/Subhash Shekhar

Ranchi : पिछले कुछ दिनों में राजधानी रांची से सटे खूंटी जिले में घटनाक्रम तेजी से घटे और बदले. पांच लड़कियों से गैंगरेप, हाउस गार्ड के जवानों का ग्रामीणों द्वारा अपहरण और पत्थलगड़ी पर बढ़ता विवाद. इनसब में सबसे ज्यादा कोई विषय अगर चर्चा और विवादों में रहा तो वह है पत्थलगड़ी. पत्थलगड़ी को लेकर खूंटी के ग्रामीण और प्रशासन आमने-सामने है. जिले के चामडीह गांव में बिरसा मुंडा की मौत का मामला भी विवादों में है. ग्रामीण इसे जहां पुलिस की गोली से हुई मौत बता रही है. वही पुलिस पिटाई से हुई मृत्यु करार दे रही है.

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इधर 26 जून को घाघरा, चामडीह गांव में जो कुछ भी हुआ, उससे ग्रामीणों में दहशत भी है और आक्रोश भी.  इस बीच न्‍यूज विंग की टीम घाघरा में पत्‍थलगड़ी समर्थकों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के प्रत्‍यक्षदर्शियों तक पहुंची. पुलिस की खौफ के कारण प्रत्‍यक्षदर्शियों ने अपनी पहचान छिपाने की शर्त पर पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी.

न्यूज विंग से बात करते हुए प्रत्‍यक्षदर्शियों ने कहा कि 26 जून को घाघरा, मानगड़ा और मंदरूडीह तीन गांवों में पत्थलगड़ी होना था. इस कार्यक्रम में बहुत दूर-दूर से ग्रामीण जुटे थे. 26 जून की रात पुलिस घाघरा गांव पहुंची और ग्रामीणों को घेर लिया. हमने पुलिस-प्रशासन को समझौता के लिए प्रस्‍ताव दिया. लेकिन उन्‍होंने प्रस्‍ताव को नामंजूर कर दिया. इसके बाद 27 जून की सुबह करीब  8:30 बजे हम आदिवासियों पर पुलिस ने हमला कर दिया और मारपीट शुरू कर दी. हमले के दौरान पुलिस बलों की तादात एक हजार के करीब होगी और हम आदिवासी ग्रामीण 10 हजार के करीब थे. पुलिस ने हम पर आंसू गैस के गोले छोड़े और गोलियां चलाई. पुलिस ने हमले से पहले हमें किसी तरह की चेतावनी भी नहीं दी. पुलिस की यह कार्रवाई हमारे ग्राम सभा को भंग करने का प्रयास था.

उस दिन की घटना के बताते हुए ग्रामीणों ने कहा कि पुलिस ने सबसे पहले हम पर लाठीचार्ज किया. जिससे वहां भगदड मच गयी. उसके बाद पुलिस ने आंसू गैस  के गोले दागे और गोलियां चलाई. इस दौरान चामडीह के बिरसा मुंडा पर पहले लाठी-डंडे से हमला किया गया, उसके बाद उस पर गोली चलाई गई. पुलिस ने बिरसा पर पीछे से लेकिन करीब से गोली चलाई थी. जिससे वह वहीं गिर पड़ा और उसकी मौत हो गई.

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बिरसा की मौत के बाद सभी लोग वहां से जान बचाकर भाग निकले. ग्रामीणों ने कहा कि हमारे जितनी भी छोटी-बडी गाड़ियां थी, उसे भी तोड़-फोड़ दिया. आयोजन के लिए जो भी इंतजाम था, जैसे बाजा, मंच, कुर्सियां सभी कुछ तोड़ दिये गये. हमारी गाड़ियां वहीं पर पड़ी रह गईं. मामला शांत होने के बाद जब हम वहां गये तो कई मोटरसाइकिल नहीं थे. ग्रामीणों ने बताया कि इस घटना के बाद पुलिस गांवों में जबरन घुस रही है और हम जैसे युवाओं की धरपकड़ की जा रही है.

प्रत्‍यक्षदर्शी ने बताया कि 27 जून को पत्‍थलगड़ी की गई. यह पूर्वजों से चली आ रही हमारी परंपरा है. अपनी पूर्वजों की स्‍वशासन की इसी परंपरा को बचाने की हम कोशिश कर रहे हैं. यह हमारे गांव-समाज का रीति-रिवाज है. इसी स्‍वशासन को बचाने के लिए हम पत्थलगड़ी कर रहे हैं. पुलिस-प्रशासन इसका गलत व्‍याख्या कर रही है. इसकी जानकारी हमने पहले आरटीआई के द्वारा भी मांगी, लेकिन अभी तक जवाब नहीं मिला. प्रशासन का पत्थलगड़ी का गलत व्‍याख्‍या करने का कोई हक नहीं है.

ग्रामीणों का कहना है कि हम अपने गांव और अपनी जमीन पर पत्थलगड़ी करते हैं, उसमें उन्‍हें क्‍या तकलीफ है. यह हमें नहीं बताया जा रहा है. पिछले 70 सालों से हम आदिवासी रोजगार के लिए तरस रहे हैं. यहां हमारे विकास के नाम पर बरगलाया जा रहा है.

सरकार कहती है कि आदिवासियों की जमीन नहीं छीनेंगे, जंगल नहीं छीनेंगे. लेकिन सच यह है कि सीएनटी-एसपीटी कानून और संविधान में संशोधन करके हमारे जंगल-जमीन को छीना जा रहा है. यह आदिवासियों के साथ गलत हो रहा है.

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