
Naveen Sharma
अमृता प्रीतम की आत्मकथा रसीदी टिकट कई साल पहले पढ़ी थी. उसी समय इमरोज के बारे में जाना था. वे अच्छे पेंटर हैं यह भी जाना था. अमृता के हमसफर हैं इसलिए एक साफ्टकार्नर उनके प्रति था. इसके बाद एक और किताब पढ़ी अमृता इमरोज. इसकी लेखिका हैं उमा त्रिलोक. लेखिका अमृता प्रीतम की फैन हैं. ऐसे में उम्मीद यही थी कि वे अमृता के बारे में ही ज्यादा लिखेंगी और हुआ भी ऐसा ही. इसके बावजूद अमृता के साथ-साथ इमरोज का भी जिक्र आता चला गया.
धीरे-धीरे ही सही इमरोज की शख़्सियत के बारे कई बातें पता चलीं. क्या कमाल के प्रेमी हैं इमरोज. आमिर खान की एक फिल्म याद आ रही है दिवाना मुझ सा नहीं. उसमें जिस तरह की दिवानगी से आमिर खान का किरदार माधुरी दीक्षित को चाहता है वैसी ही चाहत इमरोज की है. उन्हें इस बात की तनिक भी चिंता नहीं है कि अमृता शादीशुदा थी, उनके छोटे-छोटे बच्चे थे. अमृता साहिर लुधियानवी को बेहद चाहती थीं. सज्जाद हैदर से उनकी अच्छी दोस्ती थी. इन सारी बातों को अच्छी तरह से जानने के बाद भी वे अमृता को बेतहाशा चाहते थे, बिना किसी शर्त के.
हां एक बात और कि अमृता इमरोज से उम्र में काफी बड़ी थी पर जगजीत सिंह की लोकप्रिय ग़ज़ल होठों से छू लो तुम की एक लाइन ना उम्र की सीमा हो ना जन्म का बंधन की तरह ही इनका रिश्ता था.
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अमृता का टिपिकल पति बनने की कोशिश नहीं की

इमरोज जैसा सुलझा हुआ इन्सान मिलना बहुत दुर्लभ है. वे अमृता के टिपिकल पति बनने की कोशिश नहीं करते, वे साथ रह कर ही खुश है. वे इस रिश्ते को कोई नाम देने की जरूरत भी महसूस नहीं करते. वैसे भी हमारा समाज आज भी बगैर शादी के स्त्री पुरुष को साथ रहने (लिवइन रिलेशन) को सही नहीं मानता है. वहीं अमृता और इमरोज ने कई साल पहले ये साहस दिखाया था. उन्होंने इस बात की फिक्र नहीं की कि लोग क्या कहेंगे.
जब प्यार है तो बोलने की क्या ज़रूरत
इमरोज़ बताते हैं, ”जब प्यार है तो बोलने की क्या ज़रूरत है? फ़िल्मों में भी आप उठने-बैठने के तरीक़े से बता सकते हैं कि हीरो-हीरोइन एक दूसरे से प्यार करते हैं लेकिन वो फिर भी बार-बार कहते हैं कि वो एक-दूसरे से प्यार करते हैं और ये भी कहते हैं कि वो सच्चा प्यार करते हैं जैसे कि प्यार भी कभी झूठा होता है.
एक छत के नीचे पर अलग अलग कमरों में रहे
इमरोज बताता हैं कि परंपरा ये है कि आदमी-औरत एक ही कमरे में रहते हैं. हम पहले दिन से ही एक ही छत के नीचे अलग-अलग कमरों में रहते रहे. वो रात के समय लिखती थीं, जब ना कोई आवाज़ होती हो, ना टेलीफ़ोन की घंटी बजती हो और ना कोई आता-जाता हो.
उस समय मैं सो रहा होता था. उनको लिखते समय चाय चाहिए होती थी. वो ख़ुद तो उठकर चाय बनाने जा नहीं सकती थीं. इसलिए मैंने रात के एक बजे उठना शुरू कर दिया. मैं चाय बनाता और चुपचाप उनके आगे रख आता. वो लिखने में इतनी खोई हुई होती थीं कि मेरी तरफ़ देखती भी नहीं थीं. ये सिलसिला चालीस-पचास वर्षों तक चला.
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बंबई में गुरुदत्त के साथ काम का मौका छोड़ा
इमरोज़ बताते हैं कि गुरुदत्त ने उन्हें अपने साथ काम करने के लिए बंबई बुलाया था. मैं बहुत ख़ुश हुआ. दिल्ली में अमृता ही अकेले थीं जिनसे मैं अपनी ख़ुशी शेयर कर सकता था. मुझे ख़ुश देख कर वो ख़ुश तो हुईं लेकिन फिर उनकी आंखों में आंसू आ गए. उन्होंने थोड़ा घुमा-फिराकर जताया कि वो मुझे मिस करेंगी, लेकिन कहा कुछ नहीं. मेरे जाने में अभी तीन दिन बाक़ी थे. उन्होंने कहा कि ये तीन दिन जैसे मेरी ज़िंदगी के आख़िरी दिन हों.
तीन दिन हम दोनों जहां भी उनका जी चाहता, जाकर बैठते. फिर मैं बंबई चला गया. मेरे जाते ही अमृता को बुख़ार आ गया. तय तो मैंने यहीं कर लिया था कि मैं वहां नौकरी नहीं करूंगा. दूसरे दिन ही मैंने फ़ोन किया कि मैं वापस आ रहा हूँ.
उन्होंने पूछा सब कुछ ठीक है ना ? मैंने कहा कि सब कुछ ठीक है लेकिन मैं इस शहर में नहीं रह सकता. मैंने तब भी उन्हें नहीं बताया कि मैं उनके लिए वापस आ रहा हूं. मैंने उन्हें अपनी ट्रेन और कोच नंबर बता दिया था. जब मैं दिल्ली पहुंचा वो मेरे कोच के बाहर खड़ी थीं और मुझे देखते ही उनका बुख़ार उतर गया.
साहिर से प्यार की फिक्र नहीं
इमरोज़ अक्सर अमृता को स्कूटर पर ले जाते थे. अमृता की उंगलियाँ हमेशा कुछ न कुछ लिखती रहती थीं.. .. चाहे उनके हाथ में कलम हो या न हो. उन्होंने कई बार पीछे बैठे हुए मेरी पीठ पर साहिर का नाम लिख दिया. इससे उन्हें पता चला कि वो साहिर को कितना चाहती थीं! लेकिन इससे फ़र्क क्या पड़ता है. वो उन्हें चाहती हैं तो चाहती हैं. मैं भी उन्हें चाहता हूँ. इमरोज ने खुद कैलीग्राफी कर साहिर का नाम लिख कर घर में रखा हुआ था.
इमरोज बने अमृता के जीवन साथी
प्रेम में डूबी हर स्त्री अमृता होती है या फिर होना चाहती है. पर सबके हिस्से कोई इमरोज नहीं होता, शायद इसलिए भी कि इमरोज होना आसान नहीं. खासकर हमारी सामाजिक संरचना में एक पुरुष के लिए यह खासा मुश्किल काम है. किसी ऐसी स्त्री से प्रेम करना और उस प्रेम में बंधकर जिन्दगी गुजार देना, जिसके लिए यह पता हो कि वह आपकी नहीं है. इमरोज यह जानते थे और खूब जानते थे. उस आधे अधूरे को ही दिल से कुबूलना और पूरा मान लेना हो सकता है ठीक वही हो जिसे बोलचाल की दुनियादार भाषा में प्रेम में अंधे होना कहा जाता हो. पर प्रेम का होना भी तो यही है.
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इमरोज से सात साल बड़ीं थीं अमृता
अमृता अपने और इमरोज के बीच के उम्र के सात वर्ष के अंतराल को समझती थी.अपनी एक कविता में वे कहती भी हैं, ‘अजनबी तुम मुझे जिंदगी की शाम में क्यों मिले, मिलना था तो दोपहर में मिलते’ जब इमरोज और अमृता ने साथ साथ रहने का निर्णय लिया तो उन्होंने इमरोज से कहा था, ‘एक बार तुम पूरी दुनिया घूम आओ, फिर भी तुम मुझे अगर चुनोगे तो मुझे कोई उज्र नहीं…मैं तुम्हें यहीं इंतजार
करती मिलूंगी. इसके जवाब में इमरोज ने उस कमरे के सात चक्कर लगाए और कहा, ‘हो गया अब तो…’ इमरोज के लिए अमृता का आसपास ही पूरी दुनिया थी. अमृता जिस सपने के राजकुमार की खोज में पूरी उम्र भटकती रहीं, वह शक्ल इमरोज की थी. इस दुनिया से जाते-जाते अमृता इस बात को जान गई थीं इसीलिए उनकी अंतिम नज्म ‘मैं तुम्हें फिर मिलूंगी’ इमरोज के नाम थी, केवल इमरोज के लिए.
अमृता ने शरीर छोड़ा साथ नहीं
31 अक्तूबर 2005 को अमृता ने आख़िरी सांस ली. लेकिन इमरोज़ के लिए अमृता अब भी उनके साथ हैं. उनके बिल्कुल क़रीब. इमरोज़ कहते हैं- ”उसने जिस्म छोड़ा है साथ नहीं. वो अब भी मिलती है कभी तारों की छांव में कभी बादलों की छांव में कभी किरणों की रोशनी में कभी ख़्यालों के उजाले में हम उसी तरह मिलकर चलते हैं चुपचाप हमें चलते हुए देखकर फूल हमें बुला लेते हैं हम फूलों के घेरे में बैठकर एक-दूसरे को अपना अपना कलाम सुनाते हैं उसने जिस्म छोड़ है साथ नहीं…”.
अमृता की प्यारी कविता पढ़िए
मैं तुझे फिर मिलूंगी
मैं तुझे फिर मिलूंगी
कहां कैसे पता नहीं
शायद तेरे कल्पनाओं
की प्रेरणा बन
तेरे कैनवास पर उतरुंगी
या तेरे कैनवास पर
एक रहस्यमयी लकीर बन
ख़ामोश तुझे देखती रहूंगी
मैं तुझे फिर मिलूंगी
कहां कैसे पता नहीं
या सूरज की लौ बन कर
तेरे रंगो में घुलती रहूंगी
या रंगो की बांहों में बैठ कर
तेरे कैनवास पर बिछ जाऊंगी
पता नहीं कहां किस तरह
पर तुझे ज़रुर मिलूंगी
या फिर एक चश्मा बनी
जैसे झरने से पानी उड़ता है
मैं पानी की बूंदें
तेरे बदन पर मलूंगी
और एक शीतल अहसास बन कर
तेरे सीने से लगूंगी
मैं और तो कुछ नहीं जानती
पर इतना जानती हूँ
कि वक्त जो भी करेगा
यह जनम मेरे साथ चलेगा
यह जिस्म ख़त्म होता है
तो सब कुछ ख़त्म हो जाता है
पर यादों के धागे
कायनात के लम्हें की तरह होते हैं
मैं उन लम्हों को चुनूंगी
उन धागों को समेट लूंगी
मैं तुझे फिर मिलूंगी
कहां कैसे पता नहीं मैं तुझे फिर मिलूंगी!!
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अमृता साहिर की अधूरी प्रेम कहानी

अमृता प्रीतम साहिर लुधियानवी से बेपनाह मोहब्बत करती थीं. उनकी साहिर से पहली मुलाकात साल 1944 में हुई थी. वह एक मुशायरे में शिरकत कर रही थीं और वो साहिर से यहीं मिली. वहां से लौटने के दौरान बारिश हो रही .अपनी और साहिर की इस मुलाकात को अमृता कुछ इस कदर बयां करती है.
” मुझे नहीं मालूम के साहिर के लफ्जो की जादूगरी थी या उनकी खामोश नजर का कमाल था लेकिन कुछ तो था जिसने मुझे उनकी तरफ खींच लिया. आज जब उस रात को मुड़कर देखती हूं तो ऐसा समझ आता है कि तकदीर ने मेरे दिल में इश्क का बीज डाला जिसे बारिश खी फुहारों ने बढ़ा दिया.”
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सिगरेट की नहीं साहिर की लत थी
अपनी जीवनी ‘रसीदी टिकट’ में अमृता एक दौर का जिक्र करते हुए बताती हैं कि किस तरह साहिर लाहौर में उनके घर आया करते थे और लगातार सिगरेट पिया करते थे. अमृता को साहिर की लत थी. साहिर का चले जाना उन्हें नाकाबिल-ए-बर्दाश्त था. अमृता का प्रेम साहिर के लिए इस कदर परवान चढ़ चुका था कि उनके जाने के बाद वह साहिर के पिए हुए सिगरेट की बटों को जमा करती थीं और उन्हें एक के बाद एक अपने होठों से लगाकर साहिर को महसूस किया करती थीं. ये वो आदत थी जिसने अमृता को सिगरेट की लत लगा दी थी.
कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
साहिर के लिखे गीत, अमृता के लिए उनकी मोहब्बत बयां करते हैं. खास कर कभी कभी फिल्म का यह गीत कभी- कभी मेरे दिल में ख्याल आता है कि जैसे तुझको बनाया गया है मेरे लिए. सिर्फ अमृता ही उनकी सिगरेट नहीं संभलाती थी बल्कि साहिर भी उनकी चाय की प्याली संभाल कर रखते.एक बार की बात है साहिर से मिलने कोई कवि या मशहूर शायर आए हुए थे. उन्होंने देखा साहिर की टेबल पर एक कप रखा है जो गंदा पड़ गया है. उन्होंने साहिर से कहा कि आप ने ये क्यों रख रखा है? और इतना कहते हुए उन्होंने कप को उठा कर डस्टबीन में डालने के लिए हाथ बढाया कि तभी साहिर ने उन्हें तेज आवाज में चेताया कि ये अमृता की चाय पीया हुआ कप है इसे फेंकने की गलती न करें.
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