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लोकसभा चुनाव में टीवी चैनलों का मिजाज बिगड़ा, राजनीतिक दलों से नहीं मिल रहे विज्ञापन

डीएवीपी रेट से कम में मिल रहा है विज्ञापन, परेशानी बढ़ी

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Ranchi : लोकसभा चुनाव 2019 ने टीवी चैनलों का जायका खराब कर दिया है. चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों के विज्ञापनों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को अच्छा-खासा मुनाफा हो जाता था. पर अब तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में विज्ञापनों की संख्या बहुत कम ही दिख रही है.

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इस बारे में जानकार बता रहे हैं कि बड़े दलों के द्वारा खुद ही सोशल मीडिया और मास मीडिया को कंट्रोल किया जा रहा है. वहीं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आनेवाले विज्ञापनों की दर भी काफी कम मिल रही है.

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को जारी होनेवाले विज्ञापन डीएवीपी (डायरेक्टरेट ऑफ ऑडियो एंड विजुअल पब्लिसिटी) की तय दर से भी काफी कम में विज्ञापन जारी किये जा रहे हैं.

औसतन 400 रुपये प्रति सेकेंड की एक दर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए तय की गयी है. बड़े राजनीतिक दल इससे भी कम राशि यानी 375 रुपये से लेकर 398 रुपये तक के बीच विज्ञापन जारी कर रहे हैं. उम्मीदवारों का कहना है कि पार्टी की तरफ से चुनाव खर्च नहीं दिये जाने से मुश्किलें और बढ़ गयी हैं.

राजनीतिक दल के अधिकतर बड़े नेता सोशल मीडिया को प्राथमिकता दे रहे हैं. फेसबुक, ट्विटर, ह्वाट्सएप ग्रुप के जरिये चुनावी गहमागहमी ज्यादा है. लेकिन  ट्विटर में भी कहा गया है कि एक दिन में 430 से ज्यादा फॉलोअर उम्मीदवार या पार्टियां नहीं बना सकती हैं.

कमोबेश सीमित संख्या में भी ह्वाट्सएप में भी संदेश प्रेषित करने की निर्वाचन आयोग की हिदायत से परेशानी और बढ़ गयी है.

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कांग्रेस और भाजपा के ही विज्ञापन कुछ चैनलों में आ रहे हैं

चुनाव के दौरान कांग्रेस और भाजपा के ही विज्ञापन सीमित चैनलों में आ रहे हैं. इसमें कुछ गिने चुने राष्ट्रीय चैनल और क्षेत्रीय चैनल हैं. क्षेत्रीय चैनलों को दिये जा रहे विज्ञापन के जरिये उसके प्रसारण और अन्य खर्च को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.

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वहींबड़े चैनल तो इस घाटे को पाटने में सफल हो रहे हैं, लेकिन छोटे और क्षेत्रीय चैनलों को पैसों की कमी से जूझना पड़ रहा है. चुनावी समर में पल-पल की खबरों के लिए भी चैनलों को जूझना पड़ रहा है.

इसका एक कारण यह भी है कि फेसबुक, ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया में भी 30 सेकेंड से लेकर एक मिनट तक का लाइव जारी कर दिया जा रहा है.

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2014 की तुलना में इस बार काफी दिक्कतें आ रही हैं

इंडिया वॉयस के सीइओ मनोज कुमार सिंह ने इस बारे में कहा कि 2014 की तुलना में इस बार काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. विज्ञापन के सिलसिले में राजनीतिक दल चुनाव आयोग के निर्देशों के बाद भी काफी मोल-मुलाई कर रहे हैं.

उनका कहना है कि इस बार हिंदी के ही दो दर्जन से ज्यादा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चैनल चुनाव के दौरान कवरेज कर रहे हैं. अंग्रेजी और अन्य क्षेत्रीय चैनलों में भी विज्ञापन लेने की होड़ मची हुई है. इससे विज्ञापन के कारोबार पर भी व्यापक असर पड़ रहा है.

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