
Dhanbad: जहां एक तरफ सरकार सर्व शिक्षा अभियान के नाम पर करोड़ों की योजनाएं चला रही है. और सरकारी शिक्षा की बदहाली दूर करने के बड़े- बड़े वादे किये जा रहे है. इस बीच सामने आयी अंदर की जानकारी हैरान करनेवाली है. झारखंड की सामाजिक अंकेक्षण ईकाई के सर्वेक्षण का सच कुछ और ही बयां कर रहा है.
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क्या है सर्वेक्षण का सच
सरकार के शिक्षा विभाग से जिलों को भेजे पत्र के अनुसार 27/08/2018 से 30/08/2018 के बीच जीरो ड्रॉप आउट घोषित पंचायतों में सामाजिक अंकेक्षण किया गया. इसमें पाया गया कि कुल 178 पंचायतों में 1136 बच्चे ड्रॉप आउट हैं. यह सर्वेक्षण 24 जिलों के 178 पंचायतों में किया गया था. गौरतलब है कि सर्वेक्षण के दौरान कुल 18030 बच्चों का इंटरव्यू लिया गया, इनमें से 178 बच्चे अनामांकित और 1136 ड्रॉप आउट पाए गये.
ऐसे सभी बच्चे पहले से ही जीरो ड्रॉप आउट घोषित पंचायतों में पाये गये. ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है कि सरकार स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने और ड्रॉप आउट की स्थिति को सुधारने के कार्यक्रमों पर जो लाखों रुपये खर्च कर रही है, उसका मतलब क्या है? जागरुकता अभियान चलाने पर किए जा रहे खर्च पर भी स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है.
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सब पढ़े-सब बढ़े की सिर्फ बातें
सरकार सब पढ़े- सब बढ़े का नारा लगा रही है. जल्दी-जल्दी पंचायतों को व्यवस्था सुधारने की बात कही जा रही है. शिक्षा में सुधार और ड्रॉप आउट की संख्या कम करने की बात कही जा रही है. राज्य के कुल 178 पंचायतों को जीरो ड्रॉप आउट घोषित कर दिया गया है. जबकि हकीकत यह नहीं है.
पंचायतों के पास जीरो ड्रॉप आउट की घोषणा के दस्तावेज भी मौजूद नहीं
हद तो यह है कि 178 पंचायतों में से 38 पंचायतों के पास तो जीरो ड्रॉप आउट की घोषणा से जुड़े कोई दस्तावेज तक उपलब्ध नहीं हैं. ना ही कोई मुखिया के पास और न ही किसी पंचायत कार्यालय में. केवल 62 पंचायतो में ही जिला उपायुक्त से जारी घोषणा पत्र दिखाया.
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