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इन आदिवासियों ने नहीं मनाया झारखंड का स्थापना दिवस

सवाल : लोगों की जिंदगी में क्या हुआ बदलाव कौन सी और मुसीबत खत्म हुई?

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Ranjan jha
Dhanbad: साल 2000 में झारखंड राज्य का पहला स्थापना दिवस धनबाद के लिए यादगार बन गया. राज्य में सुख शांति की उम्मीदें उसी दिन काफूर हो गयी थीं, जब क्षेत्र के चर्चित उद्योगपति राजू जालान का अपहरण हुआ. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से गहरा रिश्ता रखनेवाले इस उद्योगपति और इनके परिजनों ने कभी भी गलत तत्वों के आगे घुटने नहीं टेके. इनके परिवार के उद्योग हिंदुस्तान मैलियेबुल्स एंड फार्जिंस का नाम तब झारखंड के प्रमुख उद्योगों में शुमार था. इस उद्योग को चलाने की परिवार की जिद्द ऐसी थी कि चंदे से गुजारा करनेवाले नेताओं के तमाम आंदोलन को भी सहजता से झेला. परिवार के एक सदस्य का अपराधियों ने घेरकर गला काट दिया. उन्हें बुरी तरह जख्मी कर दिया, इसके बाद भी उनकी जान बच गयी. इस घटना के दशकों बीत जाने के बाद भी यह परिवार रंगदारों, माफिया और यूनियन के नाम पर दादागीरी करनेवालों को झेलता कोयलांचल में टिका रहा. जबकि रंगदारों के प्रभुत्व वाले दौर में धनबाद से एक-एक कर उद्योगपति कोलकाता, मुंबई, मध्यप्रदेश, गुजरात के साथ अफ्रीकी देशों में शिफ्ट होते गये. नतीजा धनबाद के बड़े उद्योगों में शुमार केएमसीएल, बिनयनगर हैंजर्स, धनबाद केमिकल की तरह सारे ही उद्योग एक- एक कर बंद हो गये. उद्योगों के नाम पर बचे कुछ हार्डकोक. इनमें से अधिकतर में उत्पादन के बदले कोयले की हेराफेरी होती है. यह पुलिस का रिकार्ड बताता है.

यह बता दें कि झारखंड अलग राज्य की स्थापना होते ही धनबाद के उद्योगों की ताबूत पर अंतिम कील लग गयी, जब जालान परिवार ने अपने जान-माल की हिफाजत के लिए धनबाद से अपना बोरिया बिस्तर समेट लिया. आज इनके ही घर को ढाह कर एशियन जालान अस्पताल चल रहा है.

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अपराधियों, दादाओं की गिरफ्त में कोयलांचल

कोयलांचल में आज उद्योग के नाम पर हैं क्या? बीसीसीएल की आऊटसोर्सिंग कंपनियां. इनमें से झरिया इलाके में कई आऊटसोर्सिंग कंपनियों का संचालन कुछ दबंग और उनके लोग कर रहे हैं. हजारों टन कोयला उत्पादन कर उसे चोर बाजार में हार्डकोक भट्ठों के कागजात के मार्फत बेचा जा रहा है. इसमें सत्तारूढ़ पार्टी के नेता और अनुषंगी संगठन के लोग सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं. सत्तारूढ़ दल से संबंध रखनेवाले एक दबंग जन प्रतिनिधि ने इतनी अकूत संपत्ति अर्जित की है कि बार-बार इसकी जांच ईडी और सीबीआई से कराने की मांग हो रही है. हालांकि राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने रंगदारी और अपराध से गलत ढंग से कोयलांचल में संपत्ति अर्जित करनेवालों को धनबाद आने पर बार बार चेतावनी दी है. इसके बाद भी सत्ता के संरक्षण में गलत धंधा दिन दुगुनी, रात चौगुनी जारी है. इसके अलावा ठेकेदार, जमीन हड़पनेवाले बिल्डर, मार्केट में अपनी करोड़ों की नाजायज कमाई का निवेश करनेवाले अधिकारी और सफेदपोश फलफूल रहे हैं. इस मामले में तथाकथित दीकू से लेकर झारखंडी नेता और अफसर तक एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं. इनका झारखंड के बड़े व्यवसायियों से रिश्ता ढंका छिपा नहीं है. अभी हाल में जब भाजपा ने एक व्यवसायी को अपना राज्यसभा उम्मीदवार बनाया तो उनको जिताने की क्रांतिकारी दलों के नेताओं ने भी भरपूर कोशिश की.

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सवाल है क्यों बना झारखंड, किनके फायदे के लिए

झारखंड अलग राज्य की मांग करनेवालों ने इसे गरीब आदिवासी, हरिजनों, गरीबों के शोषण से मुक्त बनाने की बात कही थी. झारखंड अलग राज्य की लड़ाई लड़नेवाले पुरोधा कामरेड एके राय की कल्पना ऐसा झारखंड बनाने की थी, जहां मेहनतकश सुख की जिंदगी जीयेगा. शोषक, रंगदारों का नाम नहीं होगा. मगर, शोषक रंगदारों ने झारखंड की सत्ता का सारा सुख झटक लिया. गरीबों और लोगों के कल्याण की योजनाओं को दलाल चट कर रहे हैं. नतीजा है कि जिन आदिवासियों के विकास के बड़े सपने दिखाए गये. संस्कृति के प्रतीक के तौर पर इनको जुलूसों में तीर-धनुष से सुसज्जित कर लाया गया, उनसे नारा लगवाया गया- लड़ के लेंगे झारखंड़. उन्होंने एक सुनहरे सपने की उम्मीद से डुगडुगी बजाई, उनके सैकड़ों वंशज झारखंड़ स्थापना दिवस से बेखबर गुरुवार को स्टीलगेट के कोयलानगर चौराहे के इर्द-गिर्द सुबह सूरज निकलते ही झोड़ा-गैंता-कुदाल लेकर पहुंच गये थे रोज की तरह. वे हर आते-जाते को देख रहे थे. टटोल रहे थे. कौन उनको काम देगा. बिहार से अच्छी व्यवस्था की कल्पना कौन करे? सुबह आठ बजे सरायढ़ेला इलाके में गयी बिजली पौने नौ बजे आयी. कुछ दूसरे इलाके में आयी ही नहीं. मेन रोड पर सफाई हो रही थी. मुहल्लों की सड़क पर कचरा फैला था. यह अलग बात है कि विकास के नाम पर कुछ काम हुआ है. यह झारखंड नहीं बनता तो नहीं होता? झारखंड नहीं बनता तो अरबों के घोटाले में नेता जेल नहीं जाते? पैदल टपले खानेवाले नेता एसयूबी और बड़ी गाड़ियों पर नहीं घूमते? ऐसे सवाल के बीच यहां की नौकरशाही, बाबू में लोग बदलाव ढूंढ रहे हैं. हालांकि झारखंड के विकास का लगातार ढिंढोरा पीटा जा रहा है.

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