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तीन बातें बिल्कुल साफ हैं और इन्हें स्वीकार कर ही आगे की राह तलाशनी होगी

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Hemant Kumar Jha 

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पहली बात…बावजूद अपनी बढ़ती समृद्धि का ढिंढोरा पीटने के, हमारा देश आज भी बेहद गरीब है, बल्कि बेहद-बेहद गरीब है.

दूसरी बात…हमारा राजनीतिक वर्ग इस देश के गरीबों के प्रति बेईमान है, बल्कि बहुत-बहुत बेईमान है और यह बेईमानी न सिर्फ नीतिगत स्तरों पर झलकती है बल्कि उनके हाव-भाव और तौर-तरीकों में भी झलकती है.

और तीसरी बात…इस देश का प्रशासनिक तंत्र गरीबों के प्रति बेपरवाह है, बल्कि बेहद-बेहद बेपरवाह हैं.

इस नजरिये से सोचें तो गोरखपुर में बिना ऑक्सीजन के मरते बच्चों या मुजफ्फरपुर में सरकारी लापरवाही से मरते बच्चों के मामलों पर हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए. नीति नियंताओं ने देश को जो दिशा दी और इससे देश की जो दशा हुई उसमें यह सब तो होना ही है. दिल थाम कर रहिये, ऐसी घटनाओं के लिये तैयार रहिये.

आज बिहार में एक साथ सैकड़ों की संख्या में बच्चे अकाल मौत के शिकार हुए हैं तो हम उद्वेलित हैं, मीडिया भी संज्ञान ले रहा है, लेकिन जो हमारी चौपट ग्रामीण स्वास्थ्य प्रणाली है, सरकारी अस्पतालों की जो दुर्दशा है, उसमें इस तरह की अकाल मौतें तो रोज होती हैं. होती ही रहती हैं. कोई इनका संज्ञान नहीं लेता.

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भले ही हम इस मुगालते में रहने को प्रेरित किये जाएं कि हमारा देश विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है और इस मामले में हमने फ्रांस को भी पीछे छोड़ दिया है, लेकिन सच्चाई यह है कि हम में से अधिकतर बेहद गरीब हैं. इतने गरीब हैं कि गम्भीर रूप से बीमार पड़ने पर हम सरकारी रहमो करम पर ही निर्भर करते हैं.

और…सरकारों का ऐसा है कि उन्होंने गरीबों को भगवान भरोसे छोड़कर अपनी नीतियों को कॉरपोरेट केंद्रित कर दिया है.

नतीजा… हमारे अस्पतालों में बच्चों और बीमारों के लिये जरूरी दवाइयां, तकनीकी उपकरणों, डॉक्टरों और सहायक स्टाफ का नितांत अभाव है.

ऊपर से, राजनीतिक वर्ग की बेईमानी और प्रशासनिक तंत्र की बेपरवाही ने हालात बदतर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.

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अब जरा इस रिपोर्ट को देखें

वैश्विक स्वास्थ्य व्यय डाटाबेस, 2014 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए भारत सरकार ने 2017 में संसद में जानकारी दी कि भारत अपने नागरिकों के स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 1491 रुपये खर्च करता है.

इसी रिपोर्ट के अनुसार…अमेरिका अपने नागरिकों के स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 3 लाख रुपये, कनाडा ढाई लाख, फ्रांस ढाई लाख, जर्मनी 2 लाख 70 हजार, ब्रिटेन 2 लाख, ऑस्ट्रेलिया ढाई लाख और जापान दो लाख रुपये प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष खर्च करता है.

कहां महज़ 15 सौ रुपये, कहां दो लाख, ढाई लाख, तीन लाख रुपये. अंदाजा लगाइए कि अपने नागरिकों के स्वास्थ्य पर खर्च करने के मामले में भारत कितना पीछे है. बल्कि, सच तो यह है कि लिस्ट में कहीं है ही नहीं. यहां के अधिकतर नागरिक भगवान भरोसे हैं. जितनी आयु है, जी लिये. जितना भोग में लिखा है, कष्ट भोग कर मर गए. न सरकार को चिंता है, न समाज को.

नहीं, हम सिर्फ अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी या ब्रिटेन आदि से ही पीछे नहीं हैं. अपने नागरिकों के स्वास्थ्य पर खर्च करने के मामले में हम घाना, लाइबेरिया, नाईजीरिया जैसे देशों से भी पीछे हैं. यह न सिर्फ चिन्ताजनक है, बल्कि शर्मनाक है. न सिर्फ सरकार के लिये, बल्कि पूरे देश के लिये.

1990 के बाद नीतिगत स्तरों पर आम लोगों के स्वास्थ्य के सवालों को पीछे छोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ने लगी. आजतक/इंडिया टुडे की 14 फरवरी, 2018 की एक रिपोर्ट बताती है कि 1995 में भारत में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च जीडीपी का 4.06 प्रतिशत था, जो घटते-घटते 2017 में जीडीपी का 1.15 प्रतिशत हो गया.

आज की तारीख में सरकारी चिकित्सा प्रणाली की दुर्दशा अगर है तो यह क्यों नहीं हो? आबादी बढ़ती जा रही है, लेकिन सरकारी खर्च घटता जा रहा है. सरकारों की प्राथमिकता में आम लोगों का स्वास्थ्य है ही नहीं.

इसका पहला कारण तो यही है कि हमारी राजनीतिक संस्कृति ऐसी बनती गई, जिसमें शिक्षा और चिकित्सा जैसे जरूरी सवाल चुनाव में मुद्दे ही नहीं बनते.

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जब आप स्कूल और अस्पताल को कोई मुद्दा माने बिना ही पूरा आम चुनाव बीत जाने देंगे और सरकारों को बन जाने देंगे तो फिर यह उम्मीद करना बेमानी है कि राजनीतिक वर्ग आपके बीमार बच्चों के इलाज की चिन्ता करेगा.

वे बच्चों की सामूहिक मौत पर बस रस्मी खानापूरी करेंगे और पत्रकारों के सवालों के जवाब ऐसे देंगे, इस दारुण समय में भी उनके हावभाव ऐसे रहेंगे कि टीवी के पर्दे पर उन्हें देखकर आप क्रोधित हो जाएंगे.

लेकिन, यह नपुंसक क्रोध है, जो सिर्फ कुंठित बना सकता है, कोई रिजल्ट नहीं दे सकता. हम अभिशप्त हैं गोरखपुर और मुजफ्फरपुर जैसी घटनाओं को झेलते रहने के लिये. क्योंकि, राजनीतिक वर्ग के मन से इस देश के गरीबों का भय और डर निकल गया है. वे बिल्कुल नहीं डरते. उन्हें पता है कि चुनाव के समय जातियों के ठेकेदारों को अपने पाले में कर राजनीति को अपनी मन माफिक दिशा दी जा सकती है. राष्ट्रवाद, सम्प्रदायवाद, भाषावाद, इलाकावाद, ये वाद, वो वाद…विविधताओं और जटिलताओ से भरे इतने बड़े देश में वादों की कोई कमी है क्या…?

यही निश्चिन्तता थी जो बिहार के स्वास्थ्य मंत्री को और केंद्र वाले चौबे जी को लापरवाह ही नहीं, बदतमीज भी बनाती है. यही भावना विपक्ष को इस सामूहिक और सांस्थानिक हत्या पर भी अकर्मण्य बने रहने की प्रेरणा देती है. उन्हें डर ही नहीं है…क्योंकि इस देश के नेताओं ने गरीबों से डरना छोड़ दिया है.

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