LITERATUREMain SliderOFFBEATOpinionऐसे थे हमारे नायक जयपाल सिंह मुंडा

जयपाल सिंह मुंडा और तारा मजुमदार की लव स्टोरी

जयंती पर विशेषः ऐसे थे हमारे नायक जयपाल सिंह मुंडा-3

जयपाल सिंह मुंडा एक बहुमुखी प्रतिभावाले और झारखंड के इतिहास में एक ऐसे किरदार हैं जिनको भुलाया नहीं जा सकता. एक साधारण आदिवासी गांव से निकलकर वे इंग्लैंड तक पहुंचे. वहीं उनकी शिक्षा दीक्षा हुई. हॉकी खेलने की चाहत में प्रवेश के बाद आईसीएस छोड़ दिया. उनके ही नेतृत्व में हॉकी में भारत ने 1928 की ओलिंपक का गोल्ड हासिल किया. फिर वे झारखंड लौटे और अलग राज्य की राजनीति को एक नयी दिशा दी. तीन जनवरी को उनकी जयंती है. यहां हम उनके जीवन से जुड़े दिलचस्प पहलुओं को पेश कर रहे हैं. 

 

अश्विनी कुमार पंकज

Ranchi : बर्मा शेल ऑयल कंपनी में नौकरी कर रहे जयपाल सिंह मुंडा को कंपनी एक बार एक महीने की छुट्टी देती थी. कलकत्ता में रहते हुए दूसरे साल जब उन्हें महीने भर की छुट्टी मिली वे दार्जिलिंग जा पहुंचे. दिल्लू (दिलीप चौधरी, जनरल जेएन चौधरी) के छोटे भाई अनिल के आग्रह पर. दिल्लू के साथ दार्जिलिंग के इसी छोटे से प्रवास में उनकी मुलाकात दिल्लू की मौसेरी बहन तारा बनर्जी से हुई.

कॉलेज के दिनों में जयपाल बहुत पॉपुलर रहने के बावजूद कभी किसी लड़की-वड़की के चक्कर में नहीं रहे थे. आम लड़कों की तरह लड़कियों से दोस्ती और उनके साथ फ्लर्ट करने की इच्छा को उन्होंने कभी तरजीह नहीं दी थी. तारा से प्रेम की पहल भी उनकी नहीं थी. असल में तारा ही उन्हें प्यार करने लगी थी, जिसे बाद में स्वीकार करते हुए उन्होंने इस प्रेम को विवाह में परिणत कर दिया था. तारा से संबंध बनाने के बारे में उन्होंने बताया है, मैं कभी भी सेक्स को लेकर बहुत उत्सुक नहीं रहा. खासकर किसी हिंदू लड़की से. लेकिन तारा की बात ही कुछ और थी. वह कोई ऐसी वैसी लड़की नहीं, दार्जिलिंग की अघोषित राजकुमारी थी. बहुत ही सुंदर. घुड़सवारी और नृत्य में पारंगत. उसने अपने प्यार के शहद का ऐसा घेरा मेरे चारों और डाला कि उससे बाहर निकलना मेरे लिए असंभव हो गया. शायद दार्जिलिंग यात्रा का योग इसी वजह से बना था.

तारा बनर्जी बहुत ही समृद्ध और राजनीतिक रूप से प्रतिष्ठित परिवार की लड़की थी. उसके पिता पीके मजुमदार और मां एग्नेस मजुमदार का बड़ा सम्मान था, तब बंगाल और भारतीय समाज में. तारा के नाना व्योमेश चंद्र बनर्जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक अध्यक्ष थे.

तारा जल्द शादी करने को आतुर थी

तारा, जयपाल से जितनी जल्दी हो शादी करने के लिए आतुर थी. लेकिन कंपनी कानून के अनुसार जयपाल तब तक शादी नहीं कर सकते थे जब तक कि बेसिक आय प्रतिमाह 1280 नहीं हो जाती. लिहाजा छुट्टियां खत्म होते ही तारा का प्रेम लिए वापस कलकत्ता (अब कोलकाता) लौट आए. करीब एक सप्ताह भी नहीं बीता होगा कि पीछे पीछे तारा भी कलकत्ता आ गई. वह अलीपुरद्वार में जैक माइनऑस्टिन के यहां रूकी थी. माइनऑस्टिन जॉर्डिन स्किनर्स का सबसे बड़ा साहब था. उसका वेतन उस समय में किसी भी भारतीय अधिकारी से ज्यादा था. यहां तक कि वायसराय भी उससे कम तनख्वाह पाता था.

जयपाल सिंह कहते हैं, तारा मुझे बिलकुल अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी. मैं एक अदना सा छोकरा कैसे बड़ा साहब के खाने का निमंत्रण ठुकरा सकता था. भोजन समाप्ति के बाद बड़ा साहब ने मुझसे कहा कि मैं तारा को डांस के लिए फिरपो ले जाऊं. मैं अच्छा नाच लेता था लेकिन तारा मुझसे कहीं बेहतर नृत्यांगना थी. मैं समझ नहीं पा रहा तारा को क्या जवाब दूं. दूसरे दिन मैं पूरी रात नहीं सो सका. इसके अगले दिन सुबह-सुबह ही तारा फोन करके बोली कि वह मुझे खेलते हुए देखना चाहती है. कस्टम ग्राउंड पर यह एक प्रदर्शनी मैच था. पंकज गुप्ता और अप्कार एक आर्मेनियन दोनों अंपायर थे. मेरे खिलाफ शौकत अली प्रतिदंदी टीम का सेंटर फॉरवर्ड था. हम मैच जीत गए. ड्रेसिंग रूम में शौकत ने मुझसे कहा, जयपाल, उसे किसी भी सूरत में मत खोना. वह बहुत ही कुलीन है. इससे मेरे मन की दुविधा जाती रही. मैंने उसे प्रपोज कर दिया. उसने अपनी इस उपलब्धि और खुशी की सूचना दार्जिलिंग स्थित मां को दी. साथ ही मौसी मृणाली चौधरी दिल्लू की मां को भी. खबर आग की तरह तुरंत फैल गई. मैंने उसी दिन इंगेजमेंट रिंग खरीद लिया.

यह भारत लौटने के दूसरे वर्ष के आखिरी दिनों की ही बात है, जब उन्होंने तारा के साथ दार्जिलिंग में ईसाई रीति से विवाह किया. नये जोड़े का हनीमून बस्तर स्टेट के जगदलपुर में बीता. जगदलपुर में उनके हनीमून की खास व्यवस्था स्टेट के प्रशासक डोनाल्ड रत्नम ने की थी जिससे उनकी पहचान ऑक्सफोर्ड में रहते हुए हुई थी.

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(मरड़ गोमके जयपाल सिंह मुंडा पुस्तक से साभार)

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