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मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल मोम निकाल लाते हैं ये आदिवासी

  • दीपावली पर मांग अधिक रहने पर हर साल करते हैं कारोबार

Dilip Kumar

Ranchi: पलामू जिले के मनातू प्रखंड क्षेत्र के आदिम जनजाति परहिया लोग जीविका चलाने के लिए इन दिनों मधुमक्खी के छत्ते से मोम बना रहे हैं. दीपावली पर मोमबत्ती की मांग अधिक होने के कारण हर साल मोम बनाने का कार्य करते हैं. प्रखंड के सुरगुजा इलाके का परहिया परिवार दीपावली से पहले ही इस कार्य में जुट जाता है. मोम के साथ साथ मधु का भी कारोबार इनके द्वारा किया जाता है.
समय के साथ-साथ आदिम जनजाति परहिया के लोगों ने जीवन यापन के तरीकों में बदलाव लाया है. दीपावली में मोमबती की खपत और मोम की मांग को देखते हुए परहिया लोग इन दिनों मधुमक्खी के छत्ते से मधु निकालने के साथ साथ मोम भी बना रहे हैं. एक छत्ते से दो से तीन किलो मोम बनाया जाता है. साथ ही 20 से 25 किलो मधु निकालकर बेचा जाता है.

छतों से मोम बनाने के बाद उसे 200 रूपये किलो के हिसाब से बेचा जाता है. मधु भी इतने रूपये किलो ही बिकता है. इससे परहिया लोगों को अच्छी आमदनी होती है. कोरोना संक्रमण काल में रोजगार का अभाव रहने के कारण इस कारोबार को और सक्रियता के साथ किया जा रहा है. इस कारोबार में कई परहिया जाति के लोग परिवार के साथ लगे रहते हैं.

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जोखिम भरा होता है कार्य

भवरों को उड़ाकर छत्तों को छुड़ाना जोखिम भरा कार्य होता है. बावजूद दो वक्त की रोटी के लिए परहिया लोग इस कार्य को करते हैं. हर दिन जंगलों में मधुमक्खियों के छत्तों को ढूंढा जाता है. शाम ढलने के बाद छतों से मधुमक्खियों को भगाया जाता है. उसके बाद छत्तों को निकालकर उसमें से मधु को अलग कर दिया जाता है. शेष बचे हुए हिस्से से मोम बनाया जाता है.

सुकन परहिया ने बताया कि वे लोग प्रकृति से हमेशा जुड़े रहते हैं. मधुमक्खियों के छत्तों से बनने वाले मोम से मोमबत्ती बनाकर उसका इस्तेमाल काफी फायदेमंद है. इससे वातावरण सुरक्षित रहता है. वातावरण में किसी प्रकार का प्रदूषण नहीं होगा. मोम बनाने के बाद उसे पास के दुकानदार या बाहर से आने वाले खरीददार को मुहैया कराया जाता है.

सुकन बताते हैं कि अगर सरकार का इस ओर ध्यान हो जाएगा तो मोम और मधु उत्पादन बड़े पैमाने पर हो सकेगा और रोजगार के क्षेत्र में बड़ी क्रांति आ सकती है. कई बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध हो सकेगा.

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एक वर्ष में छह माह होता है मोम का कारोबार

सुकन परहिया ने जानकारी दी कि एक वर्ष में छह माह मोम बनाने और मधु निकालने का कार्य करते हैं. दीपावली से पहले 15 दिन और फिर मार्च महीने से जुलाई-अगस्त तक मधुमक्खियों के छतों को छुड़ाने का कार्य चलता है. मार्च से जुलाई तक चलने वाले कार्य में अच्छा बेनिफिट होता है. छत्तों को छुड़ाने के बाद उस पर गर्म पानी डालकर मधु से अलग किया जाता है. फिर उसे अच्छी तरह मिलाकर मोम तैयार किया जाता है.

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