
पहाड़ के बड़े जनकवि हुए हैं- गिर्दा. वे ऐसे ही समय के लिए आज से बहुत पहले उन्होंने लिखा है- अपनी औक़ात महसूस कीजिये. महसूस कीजिये कि इंसान कितना छोटा है, कितना निर्बल है. प्रकृति कितनी विशाल है, कितनी बलशाली है.
ये जो भ्रम है इंसान को सब कुछ जीत लेने का, सब नियंत्रित करने का. जो दम भरता है इंसान पहाड़ काट डालने का, नदियाँ मोड़ देने का, सब कितना फूहड़ है. कितना खोखला है.
यूँ ही नहीं है कि आदिवासी आज भी नतमस्तक रहते हैं प्रकृति के आगे और गोली खा लेते हैं लेकिन पूँजीपतियों को अपने जल-जंगलों को रौंद डालने से रोकने के लिए आख़िरी साँस तक लड़ते हैं.
तब आप-हम उन्हें जाहिल और विकास-विरोधी बता रहे होते हैं. अब बताइए जाहिल कौन है? प्रकृति ने एक आहट भर दी और सबकी जान हलक को आ गई.
प्रकृति ने एक झटके में अहसास दिला दिया कि ख़ुद को सबसे बुद्धिशाली जीव बताने इंसान, मुसीबत आने पर इतना भी तय नहीं कर पा रहा कि वो घर से बाहर भागे या घर में ही बैठा रहे.
अपनी औकात महसूस कीजिये
सारा पानी चूस रहे हो,
नदी-समन्दर लूट रहे हो
गंगा-यमुना की छाती पर
कंकड़-पत्थर कूट रहे हो
उफ!! तुम्हारी ये खुदगर्जी
चलेगी कब तक ये मनमर्जी
जिस दिन डोलेगी ये धरती
सर से निकलेगी सब मस्ती
महल-चौबारे बह जायेंगे
खाली रौखड़ रह जायेंगे
बोल व्यापारी-तब क्या होगा?
बोल व्यापारी-तब क्या होगा?




