Opinion

सूरत में मजदूरों का हिंसक रूप में सामने आना दूरगामी संकट का संकेत है

Faisal Anurag

भूख और पैसे के अभाव ने सूरत में मजदूरों को इस लाकडाउन में भी सड़क पर उतरने और विरोध प्रदर्शन करने के लिए बाध्य कर दिया. इस दौरान कुछ आगजनी की घटना भी हुई. पुलिस ने बल प्रयोग कर भीड़ को काबू में किया. 21 लोगों को हिरासत में ले लिया गया है. देर रात की इस घटना ने एक गंभीर चिंता पैदा कर दी है.  अपने घर परिवार से दूर मजदूरों को रोजगार तो खोना ही पड़ा है, कई को उन आवासों से भी बेदखल कर दिया गया है जिसमें वे काम के दौरान रह रहे थे.

सूरत की घटना का संकेत भयावह है. और इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. उस दौर में जब लोकडाउन की अवधि का लंबा होने के संकेत मिल रहे हैं. भारत में मरीजों की संख्या हर दिन बढ़ती जा रही है. अमरीका में तो अब एक दिन में होने वाली मौतें हर दिन एक नयी संख्या दर्ज कर रही हैं. इस बीच चीन की खबर भी सुकून नहीं दे रही है.

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पिछले 24 घंटों में चीन में जिस तरह मरीजों की संख्या में अचानक उछाल आया है वह 100 दिन पहले के वुहान के भय को बढ़ा देता है. इस बीमारी से बचने का एकमात्र तरीका तो फीजिकल डिस्टेंसिंग ही है. लेकिन भारत में उन लोगों की परेशानियों की चर्चा तेज है जो देश के विभिन्न जगहों पर फंसे हुए हैं. उनकी संख्या भी बहुत है.

सरकारों ने तो राहत के कई पैकजों की घोषाणाएं कर रखी हैं. लेकिन उनके अमल में लाए जाने पर कई क्षेत्रों में सवाल उठ रहे हैं. सूरत का संदेश तो यही है कि लोगों के भीतर भरोसा पैदा किए जाने की जरूरत है. और उन्हें आशंकाओं और अनिश्तिताओं से बाहर निकालने के सघन कार्य की जरूरत है. अभी भी ग्रामीण इलाकों की खबरें नहीं आ रही हैं.

वहां लोगों की जिंदगियों पर इस तालाबंदी का क्या असर है इस पर भी गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है. मूल सवाल तो भरोसा और अनिश्चितता से बने मनोविज्ञान से निपटने का ही है. मीडिया की बहसों में जिस तरह सांप्रदायिक बहसें की जा रही हैं उस से जो मनाविज्ञान बन रहा है वह भविष्य को ले कर चिंताएं गहरा कर रहा हैं.

रिपोर्ट के अनुसार लॉकडाउन के 17 दिन बीत जाने के बाद स्थितियां गंभीर होने लगी हैं. न तो इनके पास खाने के लिए कुछ अनाज है और न ही मकान मालिक का किराया देने के लिए पैसा. ऊपर से बताया जा रहा है कि जहां ये काम करते थे उनके मालिकों ने उनकी सैलरी भी नहीं दी. जिसके चलते हालत और गंभीर हो गए हैं. रात में प्रदर्शन करने वालों में ज़्यादातर हीरे के व्यापारियों के यहां काम करने वाले कारीगर थे.

सूरत जैसी मजदूरों की परेशानी की खबरे देश के दूसरे राज्यों से भी आ रही हैं. हालांकि वहां अभी मजदूर लाकडाउन का पालन कर रहे हैं. लेकिन फोन और सोशल मीडिया से वे अपने संदेश अपने राज्यों की सरकारों, मीडिया और संपर्क के लोगों को भेज रहे हैं.  सीपीआई के पूर्व झारखंड सचिव केडी सिंह के अनुसार उन्हें हर दिन दर्जनों फोन विभिन्न् राज्यों से आ रहे हैं.

उनकी शिकायत है कि राज्य के कई अधिकारी जिनके फोन नंबर सार्वजनिक किए गए है, फोन अटेंड नहीं कर रहे हैं. उन्होने कहा कि उनका यह बुरा अनुभव है. तेलांगना में उन्होंने पार्टी इकाई के सहयोग से झारखंड के मजदूरों से संपर्क कराया और राहत पहूंचवाया. झारखंड सरकार को इस सूचना पर तत्वरित कर्रवाई करनी चाहिए. क्योंकि रांची मीडिया में हर दिन ही इन मजदूरों की परेशानी सामने आ रही है.

मजदूरों के सवालों की भी उतनी ही बडी है, जितना लॉकडाउन को बेहतर तरीके से पालन कराना. लॉकडाउन  की कामयाबी में इन मजदूरों की भी भूमिका है. जो घर परिवार से दूर बिना किसी आसरे के रह रहे हैं. और कब तक वे रहेंगे, उन्हें पता भी नहीं है. हिंदू-मुसलमान टॉपिक से इस सवाल पर चर्चा ज्यादा जरूरी है. क्योंकि भारत की अर्थ संरचना के ये अग्रिम प्रहरी हैं.

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यह सुझाव कई क्षेत्रों से दिए जा रहे हैं कि इन मजदूरों के लिए सरकार को श्रमिक कार्य योजना और श्रमिक संरक्षण टीमों का निर्माण करना चाहिए. समानांतर सशक्त हेल्पिंग वॉलेंटियर के गठन की प्रक्रिया की जरूरत पर भी बल दिया जा रहा है. और सरकारों को केरल माडल से भी सीखने के सुझाव दिए जा रहे हैं. केरल सरकार की इस मामले में तैयारी और उसे अमल में लाने की प्रक्रिया कहीं ज्याद सशक्त् है. दिल्ली सरकार की तैयारियां भी बहुत अच्छी हैं.

लेकिन उसे ले कर कई तरह के सवाल भी पूछे गए हैं. जरूरत यह है कि देश का जो भी राज्य इस संदर्भ में बेहतर कार्य कर रहा है, उसकी प्रक्रिया को अमल में लाया जाए. जिस तरह भीलवाड़ा माडल की चर्चा अब पूरे देश में हो रही है कि वहां कोरोना की गति को रोका गया है.

उसे कई राज्य भी अमल में ला रहे हैं. भीलवाड़ा में 26 हजार स्वस्थयकर्मियों ने घर-घर जा कर एक-एक व्यक्ति की स्क्रीनिंग की और फिर जांच करवाया. भारत में जांच की प्रगति तो अब भी कम ही है. इसे लेकर विश्व स्वस्थय संगठन भी चिंतित है.

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