Opinion

‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’ वाली सरकार की असलियत सामने आयी

Girish Malviya

‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’ कहने वाली सरकार की असलियत कल सामने आ गयी है, कल एक सवाल के जवाब में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को देश में बढ़ रहे विलफुल डिफाल्टर की जानकारी सामने रखना पड़ी…जिसमें पता चला कि मोदी सरकार 1 के कार्यकाल में देश में विलफुल डिफॉल्टर की संख्या में करीब 60 फीसदी की बढ़त हुई है. वित्त वर्ष 2014-15 के अंत में देश में विलफुल डिफॉल्टर्स की संख्या 5,349 थी, लेकिन वित्त वर्ष 2018-19 के अंत यानी गत मार्च तक यह संख्या बढ़कर 8,582 तक पहुंच गई.

यानी पैसा होने के बावजूद जान बूझकर लोन नहीं चुकाने वाले लोगों की संख्या पिछली मोदी सरकार में 60 प्रतिशत तक बढ़ गयी, क्योंकि विलफुल डिफॉल्टर ‘ऐसे व्यक्ति को ही कहते हैं, जिसके पास लोन चुकाने का संसाधन तो होता है, लेकिन वह जानबूझ कर नहीं चुकाता और कर्ज में हासिल पैसे को कहीं और इस्तेमाल करता है.’

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यह बात भी ध्यान रखिए कि यह 99 प्रतिशत मामलों में विलफुल डिफाल्टर कोई इंडिविजुअल व्यक्ति नहीं होता, यह कोई कंपनी ही होती है, देश के सारे बड़े बैंक आम आदमी को लोन देने में तगड़ी जांच करते हैं, लेकिन कंपनियों को लोन देने में गच्चा खा जाते हैं.

बड़े-बड़े कारोबारी अपने प्रोजेक्ट की लागत को बढ़ा-चढ़ाकर जरूरत से ज्यादा कर्ज बैंकों से ले लेते हैं और फिर उस पैसे को दूसरे धंधों में लगा लेते हैं. जब बैंकों को पैसा लौटाने की बारी आती है, तब वे अपने हाथ खड़े कर लेते हैं और कहते हैं कि बैंक चाहे तो उनकी गिरवी रखी संपत्ति बेचकर कर्ज की वसूली कर सकती है.

जब बैंक उस संपत्ति को बेचने के लिए जाती है, तब उसमें से अनेक संपत्तियां खरीदने के लिए कोई सामने नहीं आता, क्योंकि उनकी कीमत बहुत ज्यादा बढ़ी होती है.

उद्योगपति कई बार कर्ज लेने वाले बैंकों से सेटलमेंट कर लेते हैं और दुबारा बैंकों को चूना लगा देते हैं. जैसे किसी ने बैंक से 100 करोड़ का कर्ज लिया और वह कर्ज नहीं चुका पा रहा है, तब वह व्यक्ति फिर बैंक के पास जाता है और कहता है कि अगर मुझे और 100 करोड़ रुपए का कर्ज मिल जाए, तो मैं अपने उद्योग का कारोबार को और आगे बढ़ा सकता हूं और सारा कर्ज चुका सकता हूं.

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बैंक फिर (जान बूझकर या अनजाने में) झांसे में आ जाती है और फिर 100 करोड़ रुपए उस डिफाल्टर को दे देती है. डिफाल्टर की नीयत तो पहले से ही राशि हजम करने की होती है, सो वह पैसे लौटाता नहीं और बैंक को दुबारा चूना लगा जाता है, इसी तरह के लोग 60 प्रतिशत मोदी सरकार में और बढ़ गए हैं.

सबसे बड़ी बात तो यह है कि मोदी सरकार इन विलफुल डिफाल्टर के नाम भी सार्वजनिक नहीं होने दे रही है, जनवरी 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने आरटीआई के तहत बैंकों की वार्षिक निरीक्षण रिपोर्ट न देने पर आरबीआई को अवमानना नोटिस जारी किया है,  इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों (विलफुल डिफॉल्टर) की सूची सार्वजनिक करने को भी कहा है.

लेकिन मोदी सरकार की पूरी कोशिश है कि इन विलफुल डिफाल्टर के नाम सार्वजनिक न किये जाए, चाहे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना भी करनी पड़े.

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)

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