
Faisal Anurag
कोयला खदानों की नीलामी रोकने के लिए दर्ज झारखंड की याचिका के बाद राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है. झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार ने साहस के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कदम पर सवाल उठाया है. जिसे मोदी एक महत्वकांक्षी योजना बता रहे हैं. ट्रेड यूनियनों के मैदान में उतरने की घोषणा के साथ ही साफ हो गया है कि निजी क्षेत्रों के लिए कोयला खनन की राह आसान नहीं होने जा रही है.
मजदूर जहां संभावित बंधुआगिरी के 1971 के पहले के दु:स्वप्न की स्मूतियों को याद कर रहे हैं वही जंगल, जमीन और लोगों के अधिकार के सवाल भी उठ खड़े हुए हैं. हेमंत सोरेन ने इस जज्बे को स्वर दिया है. और झारखंडियों की उस आकांक्षा को ही अभिव्यक्ति दी है जो लंबे समय से खान और खदान पर चिंता प्रकट करती रही है. झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि खदानों की नीलामी प्रक्रिया में केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों को विश्वास में लेने की ज़रूरत थी. खनन से जंगल और आदिवासी जनसंख्या प्रभावित होगी.
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इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि इतने सालों बाद नई प्रक्रिया अपनाई गई है. और इस प्रक्रिया से प्रतीत होता है कि हम फिर उस पुरानी व्यवस्था में जाएंगे, जिससे बाहर निकले थे. उन्होंने कहा कि मौजूदा व्यवस्था से यहां रह रहे लोगों को खनन कार्य में अब भी अधिकार प्राप्त नहीं हुआ है. विस्थापन की समस्या उलझी हुई है.
दूसरी ओर नरेंद्र मोदी ने इसे एक बड़ा कदम बताया है. उन्होंने कहा है कि इससे भारत दुनिया का बड़ा निर्यातक बन जाएगा. अभी तक बेहतरीन कोयला के लिए भारत विदेशों खास कर अस्ट्रेलिया पर निर्भर है.
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तो क्या कारपारेट घरानों को खदान देने से भारत की निर्भरता खत्म हो जाएगी. यह सवाल भी इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि भारत में अब तक निजीकरण की प्रक्रिया के बावजूद दूसरे तमाम क्षेत्रों में भारत की निर्भरता विदेशों पर बनी हुई है. और मोदी सरकार भी सबसे ज्यादा जोर विदेशी निवेश पर ही देती है. सुधार की प्रक्रिया के पीछे भी यही नजरिया काम कर रहा है. ऐसे में कोयला खदानों का मामला एक गंभीर और संजीदा बहस खड़ा करता है.
क्योंकि कोल इंडिया पर भारत सरकार को जो भरोसा होना चाहिये, वह नहीं दिख रहा है. उसके अपने अलग अर्थ हैं. कोयला खदान वाले राज्यों की अपनी समस्या है. और वहां लोगों की अपनी अपेक्षाएं हैं. जिनका निजीकरण से सीधा टकराव है. भारत में कोल सेक्टर अब भी संगठित मजदूरों का सबसे बड़ा केंद्र है. जिस तरह ट्रेड यूनियनों और क्षेत्रीय दलों ने प्रतिक्रिया दी है वह आने वाले दिनों की अलग कहानी लिख सकती है.
इस मामले में झारखंड भाजपा के वरिष्ठ नेताओं और केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने तीखे स्वर में झारखंड सरकार पर हमला बोला है. लेकिन उनके आरोपों में उन सवालों के जवाब नहीं हैं जिसे हेमंत सोरेन ने उठाया है. कांग्रेस ने तो केंद्र पर झारखंड के जंगल और भू-संपदा को बड़े घरानों को सौंपने का आरोप लगया है. जबकि वाम मोर्चे ने नीलामी के खिलाफ आंदोलन के कार्यक्रम की घोषणा की है. वाम मोर्चे की चार पार्टियों के नेताओं ने संयुक्त बयान में केंद्र पर आरोप लगाया है कि उसने कारपोरेट घरानों को जंगल और जमीन की लूट की छूट दे दि है.
झारखंड कई दशकों से जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए लड़ता रहा है. और संताल हूल और बिरसा उलगुलान का भी मुख्य स्वर यही रहा है. झारखंडियों ने विस्थापन की बड़ी कीमत चुकायी है. और साथ ही उनकी सामाजिक सांस्कृति संरचना भी इस कारण प्रभावित हुई है. दूसरी तरफ 1971 के पहले का वह दौर भी झारखंड के लागों के हृदय में दर्ज है जब कंपनियों ने लोगों को गुलाम बना कर मजूदरी करवाया. और जमीन और जंगल की लूट की. केंद्र के इस फैसले के बाद इस तरह का जख्म हरा होकर चर्चा में आ गया है. हेमंत सोरेन ने भी इसे ही स्वर देने का प्रयास किया है.
भारत की राजनीति में वह दौर भी था जब मोहन कुमार मंगलम, चंद्रजीत यादव और केआर गणेश जैसे नेता थे. जिनके प्रयासो से इंदिरा गांधी ने कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण किया था. आज उस पूरे दौर को बदल दिया गया. जब 41 कोल ब्लाक की नीलामी की प्रक्रिया शुरू की गयी. आपदा में अवसर की बात कर केंद्र सरकार ने यह कदम उठाया है.
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