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कथित विकसित देश मानें तो, कोरोना के बढ़ते फैलाव का सामना क्यूबा के मॉडल से किया जा सकता है

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Faisal Anurag

दुनिया के 197 देश कोरोना वायरस की चपेट में आ चुके हैं. पिछले 48 घंटों में दुनिया भर में कोरोना पीड़ितों की संख्या लगभग पौने पांच लाख तक पहुंच चुकी है. और मौतों की संख्या लगातार बढ़ रही है. यूरोप और अमरीका के कई देशों में हालत गंभीर हो चुकी है. अफ्रीका में भी नोबल कोरोना वायरस तेजी से पसर रहा है.

भारत में मई महीने को ले कर जो आकलन किए गए हैं वे भयावह हैं. विकसित (हालांकि अब पता चल रहा है इस विकास में कितनी क्षमता है) देशों की स्वास्थ्य व्यवस्था की लाचारगी तो इससे पहले कभी ऐसी नहीं देखने को मिली है.

सहारा, अफ्रीकन और एशियन देशों की हालत तो पहले से ही लचर मानी जाती रही है. बावजूद इस बीमारी से निजात पाने के लिए जोरदार प्रयास किए जा रहे हैं. और स्वास्थ्यकर्मियों का संकल्प दुनिया को उम्मीदों से भर रहा है.

वैज्ञानिक सटीक वैक्सिन और दवा के लिए भी दिनरात काम कर रहे हैं. लेकिन सरकारों का संकल्प इस बीमारी की गंभीरता से निपटने की दिशा में विभिन्न देशों में अलग-अलग अलग है. एक ठोस कार्य योजना बनाने में दुनिया का राजनीतिक नेतृत्व कामयाब नहीं हो पा रहा है.

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पूंजीवाद का लालच इस अवसर का ठीक उसी तरह लाभ उठा लेना चाहता है जैसे प्लेग, अकाल और दोनों महायुद्धों के बीच उठाया गया था. दुनिया के अनेक देश अभी भी अमरीका और उसके दोस्त देशों के अमानवीय प्रतिबंधों के शिकार हैं. इसमें एक तरफ तो ईरान है, जो नोबल कोरोना वायरस से बुरी तरह प्रभावित है.

वहीं क्यूबा जैसे देश भी हैं जो अपनी स्वतंत्र पहचान और आमजन के हितों के लिए पूंजीवादी विरोधी अर्थनीति पर चल रहे हैं. बेनेजुएला में अमरीका के इशारे पर अभी भी समाजवादी सरकार के तख्तापलट का इंधन जलाया ही जा रहा है. दूसरी ओर धार्मिक आतंकियों की क्रूर हिंसा भी जारी है.

अफगानिस्तान में आइएसआइएस ने जो आतंकी हमला किया वह बता रहा है कि ऐसे तत्वों को दुनिया के संकटों को बढ़ाने में ही दिलचस्पी है. और जिसके लिए इंसानों की जान का कोई मतलब नहीं है.

जबकि देर-सबेर कोई भी देश इस वायरस से बच सकेगा, इसमें संदेह है.

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश के अनुसार एक बड़े डाक्टर ने सुबह सुबह दो पंक्तियों का संदेश भेजा है. धर्म छुट्टी पर है और विज्ञान ड्यूटी पर. इस संदेश का मर्म गहरा है.

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लेकिन धार्मिक राज का सपना देखने वालों के लिए मानवता के संकट का भी कोई मामला नहीं है. ठीक उसी प्रकार जैसा कि हर मुसीबत में जमाखोर और पूंजीपरस्त अपना बेहतरीन अवसर तलाश करने लगते हैं. और जब सत्ता ऐसे पूंजीपरस्तों के नियंत्रण में हो तो संकट कितना भी गंभीर हो सकता है, इसे आज आसानी से समझा जा सकता है.

इस पूरे संकट के कारण आर्थिेक संकट का गहराना शासकों के लिए भी अवसर बन कर उभरा है. वे आसानी से कोरोना वायरस को दोषी ठकरा कर अपने अकर्मण्य और कारपोरेटपरस्त नीतियों का बचाव कर सकते हैं. लेकिन यह संकट इतना गहरा है कि उनका बचाव अभी से ही लचर दिख रहा है.

अनुमान लगाया जा रहा है कि विकसित देशों और विकासशील देशों को गहरे आर्थिक संकट का सामना करना पड़ेगा. इसके साथ ही यह भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि जिन नीतियों पर दुनिया चलने लगी थी, उसमें भी मुकम्मल बदलाव की जरूरत है. 2008 के आर्थिक मंदी के बाद जो सवाल उठे थे, उसे तो विस्तृत कर दिया गया था. लेकिन यह मंदी उन सवालों को फिर से खड़ा कर रही है. इस प्रसंग पर किसी अन्य आलेख में चर्चा होगी.

लेकिन यहां यह चर्चा अनिवार्य है कि इन देशों के  हेल्थ सिस्टम का खोखलापन जाहिर हो गया है. इटली ओर स्पेन के बाद अमरीका के तमाम हेल्थ सिस्टम और स्कीम का खोलापन दुनिया और अन्य देशों के नागरिक भी देख रहे हैं. यहां तक कि इन देशों का व्यक्तिवाद उनके सामूहिक राजनीतिक फैसलों पर हावी है.

लेकिन भारत जैसे तमाम देशों को यह सीख गहरायी से लेने की जरूरत है कि उन्हें अमरीका की नकल के बजाय अपनी ऐसी रणनीति पर कार्य करने की जरूरत है. जो एक मानवीय त्रासदी का वैश्कि मददगार बन सके. जैसा कि क्यूबा कर रहा है.

क्यूबा ने न केवल बहरमास जा रहे उस क्रूज को अपने बंदरगाह पर आने दिया बल्कि कोरोनाग्रस्त अमरीकी नागरिकों का इलाज कर उनके देश भेजा. अपने खर्च पर. यही वह क्यूबा है जिसके खिलाफ 1953 की समाजवादी क्रांति के बाद से अमरीका कड़ा प्रतिबंध लगाए हुए है. ऐसा कैसे संभव हुआ है कि क्यूबा के डाक्टर इटली गये हैं और चीन के भी 300 डाक्टर और नर्स भी.

इसे समझने के लिए क्यूबन क्रांति के नायक फिदेल कास्त्रो की इस प्रसिद्ध उक्ति को समझने की जरूरत है, वे कहते हैं- ‘हमारा देश दूसरे लोगों पर बम नहीं गिराता. हमारे पास जैविक या परमाणु हथियार नहीं हैं.

हम दूसरे देशों की मदद के लिए डॉक्टर तैयार करते हैं.’ सिर्फ इटली ही नहीं बल्कि कई मुल्कों में क्यूबन डाक्टर तैनात हैं. प्रकाश के राय के अनुसार :पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के व्हार्टन स्कूल के एक अध्ययन के मुताबिक 2015 तक 77 देशों में 37 हज़ार क्यूबाई डॉक्टर मौजूद थे. नवंबर, 2018 में छपी ‘टाइम’ मैगज़ीन की एक रिपोर्ट का आकलन यह है कि 67 देशों में डॉक्टरों की यह संख्या कोई 50 हज़ार के आसपास है. संख्या कुछ भी हो,  इतना तो तय है कि हज़ारों डॉक्टर संसाधनों की कमी और बीमारियों के प्रकोप से जूझ रहे देशों के लिए काम कर रहे हैं.

‘टाइम’ मैगज़ीन के एक लेख में सीयरा न्यूजेंट ने लिखा है कि सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा और मुफ़्त शिक्षा ‘कास्त्रो की परियोजना’ के मूलभूत तत्व थे. उसी लेख में ‘द इकोनॉमिस्ट’ समूह से संबद्ध इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट के क्यूबा विशेषज्ञ मार्क केलर ने कहा कि ये क्षेत्र ‘क्रांति के दो बड़े निवेश’ थे, इसलिए क्यूबा की आबादी अच्छी तरह से शिक्षित है.

और वहां डॉक्टरों की भरमार है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार, दस हज़ार की आबादी में क्यूबा में 81.9 डॉक्टर हैं, वहीं अमेरिका में यह अनुपात 25.9 है. सोचिए, क्रांति के समय 1959 में वहां केवल छह हज़ार डॉक्टर थे.

क्यूबा की स्वास्थ्य सेवा की बेहतरी की वजह रोगों की रोकथाम और प्राथमिक स्वास्थ्य पर मुख्य रूप से ध्यान देना है. इस तंत्र का प्रमुख आधार देशभर में फैले सैकड़ों सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं. एक केंद्र 30 से 60 हज़ार लोगों को सेवाएं प्रदान करता है. इन केंद्रों में शोध व पढ़ाई का काम भी होता है.

दुनिया को जल्द से जल्द क्यूबन हेल्थ माडल से सीख लेनी चाहिये.

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