
- पोप ने कहा- नवंबर में किसी भी दिन कर सकते हैं प्रार्थना
Ranchi : कैथोलिक विश्वासियों ने 2 नवंबर को ऑल सोल्स डे पर अपने मृत संबंधियों के लिए प्रार्थना की. यह प्रार्थना कांटाटोली स्थित आरसी कब्रिस्तान और पुरुलिया रोड स्थित संत मरिया कैथेड्रल (महागिरजाघर) में हुई. कैथेड्रल में होनेवाली प्रार्थना की अगुवाई आर्चबिशप फेलिक्स टोप्पो ने की. उन्होंने मृतकों के गुनाहों की क्षमा के लिए प्रार्थना की.
कोविड गाइडलाइन के मुताबिक कैथेड्रल और कब्रिस्तान में सीमित संख्या में ही लोगों को जाने दिया गया जहां उन्होंने अपने संबंधिय़ों की कब्रों पर फूल और अगरबत्ती चढाकर उनके लिए प्रार्थना की.
बता दें कि आमतौर पर इस पर्व के अवसर पर कब्रिस्तानों पर काफी भीड़ होती है. इस बार पोप संत फ्रांसिस ने वेटिकन सिटी से घोषणा की है कि सिर्फ दो नवंबर की जगह पूरे नवंबर महीने में विश्वासी किसी भी दिन कब्रिस्तान में जाकर अपने मृत संबंधियों के लिए प्रार्थना कर सकते हैं. पोप ने कहा है कि इससे कोविड की वजह से उत्पन्न परिस्थितियों में विश्वासियों को उचित सुरक्षा मिलेगी.
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आर्चबिशप ने कैथेड्रल में की प्रार्थना
रांची में कैथोलिक ईसाइयों के सबसे बड़े चर्च संत मरिया कैथेड्रल में प्रार्थना की अगुवाई आर्चबिशप फेलिक्स टोप्पो ने की. उन्होंने इस अवसर पर अपने संदेश में कहा कि आज के दिन हम उन असंख्य लोगों को याद करते हैं जिन्होंने प्रभु यीशु की शिक्षा का सारे मन और दिल से पालन किया. अब वे मृत्यु के बाद ईश्वर का अविरल दर्शन करते हुए परम आनंद में जीते हैं. हम ईश्वर की महिमा और संतों का आदर कर रहे हैं. यीशु ने हमें सिखाया है कि किस तरह हम इस धरती पर सच्ची पवित्रता को प्राप्त कर सकते हैं.
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जीइएल चर्च के विश्वासियों ने मिशन पर्व मनाया
दूसरी ओर, गोस्सनर एवेंजिलिकल लूथरन (जीइएल) चर्च के विश्वासियों ने गोस्सनर कंपाउंड स्थित स्मरण पत्थर के पास मिशन पर्व मनाया. यहां भी कोविड की वजह से सार्वजनिक प्रार्थना नहीं हुई. चर्च के मॉडरेटर (सर्वोच्च धार्मिक अगुआ) जोहन डांग, बिशप जोनसन लकड़ा, सचिव प्रदीप कुजूर, संयुक्त सचिव अटल खेस सहित अन्य पदाधिकारियों ने प्रार्थना कर छोटानागपुर आनेवाले पहले चार मिशनरियों को श्रद्धांजलि दी.
बता दें कि 2 नवंबर 1845 को चार जर्मन मिशनरी एमिल शत्स, थियोदोर यानके, अगस्तुस ब्रांत और फ्रेडरिक वच्च छोटानागपुर (रांची) पहुंचे थे. वे पहले मिशनरी थे जो इस क्षेत्र में आये. उनके ही प्रयासों से इस क्षेत्र में ईसाइयत की शुरूआत हुई.
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