Opinion

ईद-मिलाद-उन-नबी पर विशेष: सहिष्णुता के प्रतीक पैगम्बर मुहम्मद

Imam Hashimi

हिजरी सन् का रबीउल अव्वल महीना, वह महीना है जिसमें हजरत मुहम्मद (सल्ल.) का जन्म हुआ था. इस महीने में दुनिया भर में मुहम्मद (सल्ल.) के संदेश को मुसलमान अपने जेहन में ताजा करने-और दूसरों को समझाने की किसी हद तक कोशिश करते हैं. आइए इस शुभ महीने में मुहम्मद (सल्ल.) के संदेश को समझने की कोशिश करें.

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मुहम्मद (सल्ल.) के व्यक्तित्व की सभी यथार्थताओं का जान लेना बड़ा कठिन काम है. पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल.) कई हैसियत से हमारे सामने आते हैं- पैगम्बर मुहम्मद, मुहम्मद जनरल, मुहम्मद शासक, मुहम्मद योद्वा, मुहम्मद व्यापारी, मुहम्मद उपदेषक मुहम्मद दार्षनिक, मुहम्मद राजनीतिज्ञ, मुहम्मद वक्ता, मुहम्मद समाज सुधारक, मुहम्मद यतीमों के पोषक, मुहम्मद गुलामों के रक्षक, मुहम्मद स्त्री वर्ग का उदार करने और उन को बन्धनों से मुक्त कराने वाले, मुहम्मद न्याय करने वाले, मुहम्मद सन्त. और सभी महत्वपूर्ण भूमिकाओं और मानव-कार्य क्षेत्रों में आप की हैसियत समान रूप से एक महान नायक की है.

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उनके आभार से मानवता कभी मुक्त नहीं हो सकती, जिन्होंने जाति, धर्म, वंश, नस्ल आदि के बंधनों से ऊपर उठ कर सभी मनुष्यों के लिए सफल शांतिमय जीवन, मोक्ष और निजात का मार्ग अपनाने का आह्वान किया. ईदों के ईद ‘‘ईद मिलादुन्नबी‘‘ के पावन अवसर पर ऐसे मुहम्मद सल्ल. को कोटि-कोटि नमन एवं उन पर दरूद व सलाम हो.
हजरत मुहम्मद (सल्ल.)की धार्मिक सहिष्णुता को रेखांकित करने के लिये दो महत्वपूर्ण दृष्टांत पर्याप्त है. दोनों ही दृष्टांत ऐतिहासिक हैं, इसलिए ज्वलंत उदाहरण भी है और दस्तावेजी प्रमाण भी पहला दृष्टांत यह कि मुहम्मद (सल्ल.) ने ‘मीसाके-मदीना‘ मदीना का दस्तूर अर्थात मदीना का संविधान तैयार करवाया था जो उस दौर का पहला दस्तूर था, जिसमें पैंतालीस दफआत धाराएं थीं, ‘मीसाके-मदीना‘ दस्तावेजी शक्ल में था,

जिसकी प्रांरभिक पन्द्रह धाराओं में धार्मिक सहिष्णुता को प्राथमिकता देकर मुसलमानों और यहूदियों तथा अन्य अकीदे को मानने वाले लोगों को अंतःकरण और विश्वास की स्वतंत्रता की बुनियाद को पुख्ता किया गया था. मुहम्मद (सल्ल.) चूंकि रहमतुललिल-आलमीन समस्त दुनिया के लिए कृपा के रूप में हैं, इसलिए भी धार्मिक सहिष्णुता के प्रतीक हैं.

दूसरा दृष्टांत है अन्सार कबीले की औरत का यहां अन्सार शब्द का अर्थ स्पष्ट करना वाजिब होगा. अन्सार का तात्पर्य है ‘जां निसार करने वाला‘ मुहम्मद(सल्ल.) जो लोग जां निसार करने‘ अर्थात् प्राण न्यौछावर करने को तैयार रहते थे, उन्हें ‘अन्सार‘ कहा जाता था. जाहिर है कि अन्सार कबीला (अन्सारी) इस्लाम धर्म का अनुयायी था. इसी अन्सार कबीले की एक औरत जब भी किसी संतान को जन्म देती थी, उस संतान की मृत्यु हो जाती थी. अतः दुखी होकर उस औरत ने ये ऐलान किया कि उसको भविष्य में जो भी संतान होगी और जीवित रहेगी तो उस संतान को यहूदी धर्म का अनुयायी बना देगी.

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संयोग ऐसा हुआ कि इस ऐलान के बाद उस औरत को कई संतानें हुई और वे सब पुत्र थे, जो लम्बे समय तक जीवित रहे. उस औरत के वे सभी बेटे मदीना में रहते थे. एक दिन उन बेटों ने कहा कि अगर उन्हें यहूदी धर्म नहीं अपनाने दिया गया तो वे मदीना छोड़कर अन्यत्र चले जाएंगे और वहां यहूदी धर्म अपना लेंगे. इस बात से नाराज होकर अन्सार कबीले के लोग उस औरत के उन बेटों को जो यहूदी धर्म अपनाना चाहते थे मुहम्मद (सल्ल.) के पास ले गए और कहा कि ‘‘अगर इन्होंने उस औरत के बेटों ने यहूदी धर्म अपनाया तो हम इन्हें जबरदस्ती मुसलमान बनाएंगे. ‘‘तब मुहम्मद सल्ल. पर कुरआने-पाक की ये आयत नाजिल अवतरित हुई ‘‘ला इकराहा फिद्दीने‘‘ अर्थात् मजहब में जब्र नहीं.

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यानी मजहब में जोर-जबरदस्ती की गुंजाइश नहीं मुहम्मद (सल्ल.) ने उक्त आयत के नाजिल होते ही फौरन अन्सार कबीले के लोगों से कहा कि ‘अल्लाह मजहब के मामले में जबरन थोपा जाना यानी जोर-जबरदस्ती पसंद नहीं करता. इसलिए अगर उस औरत के बेटे यहूदी मजहब का अकीदा विश्वास अपनाना चाहते हैं तो उन्हें वैसा ही करने दो.‘ आप (सल्ल.) के इस फर्मान के बाद अन्सार लोग चले गये और उस औरत के बेटों ने यहूदी मजहब अपना लिया तथा मदीना में ही रहे. यह दृष्टांत मुहम्मद (सल्ल.) की धार्मिक सहिष्णुता का एक नायाब उदाहरण है.

मुहम्मद साहब के विश्वबंधुत्व, दया, करूणा, सहिष्णुता और मानवता की भलाई की दिशा में काम करने वाले संदेशों को अपनाने के लिए लोगों को प्रेरित करने की जरूरत है. जरूरत इस बात की है कि मुस्लिम समाज मुहम्मद साहब के जन्मदिन पर उनके जीवन और आदर्शो को याद करे और खुद को मानवता की सेवा में समर्पित करें. मुहम्मद साहब ने इंसान को इंसान से जोड़ने, आपसी भाईचारा कायम करने, दूसरे धर्मो के प्रति सम्मान करने और एकता बनाए रखने की जो तालीम दी थी, वह किसी वर्ग विशेष के लिए नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए थी.

आज की परिस्थितियों में मुहम्मद साहब का संदेश और अधिक प्रासंगिक है. उनके बताए रास्ते पर चलकर संसार में भाईचारा और अमन-चैन का माहौल कायम किया जा सकता है. यह अवसर है जब सभी को विश्वबंधुत्व में अपना विश्वास पुनः स्थापित करना चाहिए, जिससे समाज के कल्याण और मानवता के समग्र विकास में उत्तम योगदान दिया जा सके. मुसलमानों को कोरोना रूपी ‘आपदा‘ में भी मुहम्मद साहब के जन्मदिन पर एक सकारात्मक ‘अवसर‘ मिला है.

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इस बात का सुनहरा मौका है कि इस बार ईद मिलाद-उन-नबी पर पूरे विश्व को मानवता के एकसूत्र में पिरोने का महाभियान चलाया जाए. आपने एक ऐसा महान राज्य स्थापित किया जो चैदह सदियों की लम्बी मुद्यत गुजरने के बावजूद आज भी मौजूद हैं और अगर महानता का पैमाना वह समर्पण है जो किसी नायक को उसके अनुयायियों से प्राप्त होता है, तो आज भी सारे संसार में फैली हुई करोड़ों आत्माओं को मुहम्मद का नाम जादू की तरह सम्मोहित करता है.

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