
Shriniwas
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर; इस बार अधिक विश्वास और आक्रामकता के साथ ‘एक देश, एक चुनाव’, यानी लोकसभा और विधानसभाओं का चुनाव एक साथ कराने पर जोर दिया है. हाल में पीठासीन अधिकारियों की बैठक में उन्होंने इसकी वकालत करते हुए कहा कि ‘यह बहस का मुद्दा नहीं है, यह भारत की जरूरत है.’ जरूरत किसकी? देश की या मोदी और उनके दल की?
सुनने और सोचने में तो यह अच्छा लगता है, लेकिन लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का विचार अव्यावहारिक ही नहीं, पूरी तरह अलोकतांत्रिक भी है.
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यदि ऐसा किया गया, तो इसका मतलब यह होगा कि किसी राज्य की गठबंधन सरकार के किसी घटक के अलग हो जाने; या एक दल का बहुमत होने पर भी सत्तारूढ़ दल में टूट हो जाने से यदि सरकार अल्पमत में आ गयी, तब ‘एक साथ’ चुनाव के नाम पर या तो वहां अगले चुनाव तक अल्पमत सरकार शासन करती रहेगी; या फिर वहां केन्द्रीय शासन लगा दिया जायेगा, यानी वहां व्यवहार में केंद्र में सत्तारूढ़ दल का ही शासन होगा. क्या यह लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल होगा? और यदि केंद्र सरकार ही अल्पमत में आ जाये तो?
केंद्र में राष्ट्रपति शासन का कोई प्रावधान तो है नहीं. तो क्या वही अल्पमत सरकार अगले चुनाव तक कायम रहेगी? इस सन्दर्भ में किसी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश करते समय विपक्ष को ‘वैकल्पिक सरकार कैसे बनेगी, यह बताना होगा’, जैसा तर्क भी बेतुका ही है. मान लीजिये, विपक्षी दलों में ऐसी एकता नहीं है या न बन सके कि वे मिल कर सरकार बना सकें, तब भी क्या अल्पमत सरकार कायम रहेगी? सवाल यह भी है कि संसद में बिना बहुमत के वह सरकार काम कैसे करेगी?
कोई विधेयक कैसे पारित करायेगी? क्या यह प्रावधान कर दिया जायेगा कि बिना बहुमत के भी कोई नया कानून बन सकता है, बजट को मान्य करने के लिए भी बहुमत की जरूरत नहीं है? फिर लोकतंत्र की अहम् शर्त ‘बहुमत का शासन’ का क्या होगा?
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संविधान में इसके प्रावधान नहीं हैं, यह कोई कठिन समस्या नहीं है. संसद चाहे तो इसके लिए संविधान संशोधन किये जा सकते हैं. मगर ऐसा करना लोकतंत्र के मान्य सिद्धांतों के खिलाफ होगा. फिर भी यह कुछ लोगों की- जिनको लगता है कि उन्हें कुछ भी करने का ‘जनादेश’ मिला हुआ ही- जिद है, तब भी पूछा जाना चाहिए कि ऐसा करना जरूरी क्यों है; और क्या इससे भारतीय लोकतंत्र और मजबूत होगा? मेरा मानना है कि न तो यह जरूरी है, न ही इसका कोई लाभ होगा.
जिन राज्यों के चुनावों और आम चुनाव में कुछ महीनों का अंतर हो, उनकी विधानसभाओं को थोड़ा पहले भंग कर या कुछ का कार्यकाल कुछ आगे बढ़ा कर उनके चुनाव लोकसभा के साथ कराये जा सकते हैं. लेकिन हर हाल में केंद्र व राज्यों के चुनाव एक साथ ही हों, यह नाहक और नासमझ जिद के अलावा और कुछ नहीं है.
इसके पक्ष में दिया जा रहा यह तर्क कि इससे अलग अलग चुनाव कराने से होनेवाला खर्च बचेगा, तो एकदम बेतुका है. लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण और जरूरी कवायद-चुनाव पर होनेवाले खर्च को ही आप फिजूलखर्ची कह रहे हैं, हद है!
अब सवाल है कि क्या श्री मोदी और उनके समर्थक इन तर्कों से सर्वथा अनभिज्ञ होंगे? ऐसा संभव तो नहीं लगता. फिर क्यों वे समय समय पर यह मुद्दा उछालते हैं? इसका एक कारण यह हो सकता है कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होने का लाभ हमेशा बड़े व राष्ट्रीय दलों को मिलता है. इसलिए कि आम चुनाव में राज्यों के और स्थानीय मुद्दे गौण या कमजोर पड़ जाते हैं. पिछले चुनाव नतीजों के आंकड़े भी यही बताते हैं. इसी कारण कभी कांग्रेस इसकी वकालत करती थी. आज भाजपा कर रही है.
इसके अलावा गौरतलब है कि संसदीय प्रणाली में मतदाता सिद्धांततः प्रधानमंत्री का नहीं, अपने क्षेत्र के प्रतिनिधि का चुनाव करता है. प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री कौन होगा, यह पहले से तय और घोषित हो, जरूरी नहीं. लेकिन नेता की छवि का लाभ संबद्ध दल को मिलता ही है.
इसी कारण इन दिनों भारत में भी अमेरिका की तरह पक्ष विपक्ष के दो शीर्ष नेताओं के बीच मुकाबले का माहौल बनाने का प्रयास होता है. शायद भाजपा (और श्री मोदी) को लगता है कि विपक्ष के पास कोई दमदार चेहरा नहीं है, तो आम चुनाव के साथ ही विधानसभा के चुनाव होने से वह लाभ में रहेगी. लेकिन ऐसे संकीर्ण स्वार्थ के कारण ऐसा कोई फैसला न तो उचित है, न देशहित में, न ही संभव. कुल मिला कर इसे हवा में उछाला गया एक और जुमला ही मानना चाहिये.
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