न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

#SC का फैसला, राजनीति को अपराध के चंगुल से मुक्त कराने की कोशिश वाला

127

Faisal Anurag

एक सप्ताह में सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों ने जबरदस्त हलचल मचा दी है. पहला फैसला राजनीति को अपराधियों के चंगुल से बाहर करने को लेकर है. दूसरा मामला सरकार को लेकर की गयी टिप्पणी है. जस्टिस अरूण मिश्र ने जिस तरह की टिप्पणी की है, वह सामान्य नहीं है. उसमें सुप्रीम कोर्ट का रोष और निराशा दोनों ही जाहिर होती है.

Aqua Spa Salon 5/02/2020

अरूण मिश्र ने दूरसंचार कंपनियों के बकाये के समयबद्ध भुगतान नहीं करने को लेकर कहा है कि देश में कानून है भी या नहीं. अदालतों को बंद कर देने जैसी बात कर जस्टिस मिश्र ने एक नयी बहस प्रारंभ कर दी है. देश में ऐसे अदालती फैसले हैं जिन पर अमल नहीं किया जाता है और ज्यादातर मामलों का संबंध सीधे सरकारों से जुड़ा है.

इसे भी पढ़ेंःशिव प्रसाद हत्याकांड: SIT गठन व इनाम की घोषणा के बाद भी पुलिस के हाथ खाली, घटना को बीते डेढ़ साल

सुप्रीम कोर्ट लंबे समय से राजनीति में अपराधियों के बढ़ते असर के खिलाफ कदम उठाने की हिदायत देता रहा है. लेकिन चुनावों में हर हाल में जीत का जो फॉर्मूला पार्टियां अपनाती हैं, उसमें संगीन अपराधों के आरोपी संसद तक पहुंच जाते है.

यहां तक कि आतंकवाद के आरोपों में शामिल लोग भी संसद सदस्य की पात्रता हासिल कर लेते हैं और सत्ता की चाहत में उसकी उम्मीदवारी को न केवल न्यायसंगत ठहराया जाता है, बल्कि उसके चुनाव जीत लेने पर उसे संसद की प्रभावी कमेटी का सदस्य भी बना दिया जाता है.

हाल ही में कुलदीप सेंगर जैसे विधायकों का मामला भी सामने आ चुका है, जहां एक लड़की को यौन हिंसा का सिर्फ शिकार ही नहीं बनाया गया बल्कि हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने वाली उस लड़की के पिता की हत्या भी करा दी गयी. अब उस कुलदीप सेंगर को सजा भी दे दी गयी है.

Gupta Jewellers 20-02 to 25-02

इस तरह के अनेक मामले देश भर में है. राजनीति में ऐसा कम ही हुआ है कि किसी दोष या अपराध के लिए किसी बड़े नेता को जेल में लंबे समय तक रहना पड़ा हो. लालू प्रसाद और ओम प्रकाश चौटाला इसके अपवाद जरूर हैं.

सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के अनुसार, किसी भी अपराध के मामले के आरोपी किसी व्यक्ति को टिकट देने पर उस व्यक्ति के बारे में विस्तार से पार्टियों को अपनी वेबसाइट पर जानकारी देनी होगी और यह भी बताना होगा कि उस व्यक्ति को पार्टी ने किन कारणों से टिकट दिया है.

कोर्ट को मालूम है कि आमतौर पर चल रहे मामलों का हवाला देकर किसी व्यक्ति को जब तक सजा न हो निर्दोष बताने की परंपरा है और इसका लाभ उठा कर हिंसक प्रवृति के लोग भी संसद और विधायिका तक पहुंच जाते हैं. शीर्ष कोर्ट के आदेश के बाद से ही हर उम्मीदवार को अपने ऊपर चल रहे मामलों का विवरण देना होता है.

इसे भी पढ़ेंःदिल्ली चुनाव में हेट स्पीच पर FIR नहीं करने के पूर्व सीईसी के सवालों का चुनाव आयोग ने दिया जवाब

इसमें किसी भी मामले को छुपा लेने से उसकी उम्मीदवारी रद्द भी हो सकती है. लेकिन इसके बाद भी ऐसे लोगों से सत्ता दावेदार पार्टियां परहेज नहीं करतीं. चुनाव सुधारों पर गंभीरता से कार्य करने वाली संस्था एडीआर ने राजनीति और अपराधीकरण पर अनेक शोध परक रिपोर्ट प्रकाशित किये हैं. चुनाव सुधारों के लिए संघर्षरत तमाम समूह राजनीति को अपराधमुक्त करने के लिए लगातार आवाज उठाते रहे हैं.

नरेंद्र मोदी ने 2014 के चुनावों में जिन बड़े वायदों को किया था, उसमें एक साल के भीतर संसद को अपराधियों से मुक्त करने का वायदा भी था. उन्होंने इसके लिए फास्ट ट्रैक सुनवाई की भी बात की थी. लेकिन 2019 के चुनावों में भी आपराधिक मामलों के आरोपियों को चुनाव मैदान में न केवल उतारा गया बल्कि उनकी जीत की गारंटी भी दी गयी.

1977 के बाद से ही आपराधिक मामलों के आरोपी बड़े पैमाने पर चुनाव मैदान में उतरते रहे हैं और जीत भी हासिल करते रहे हैं. तब ज्यादातर आरोपी निर्दलीय ही चुनाव लड़ते थे. पार्टियां लोकलाज के कारण टिकट देने का साहस नहीं जुटा पाती थी.

77 के पहले आमतौर पर राजनीतिक नेता आपराधिक पृष्ठभूमि वालों का चुनाव में इस्तेमाल करते थे, लेकिन बाद में ऐसे पृष्ठभूमि वाले लॉ मेकर बनने के लिए खुद ही सामने आ गए. भारतीय राजनीति के बाद के दौर की कहानी तो बेहद संजीदा है. सुप्रीम कोर्ट का आदेश इस संकट को ही रेखांकित करता है.

इसे भी पढ़ेंःतीन महीने में छह माह का सिलेबस पूरा करायेगी झारखंड टेक्निकल यूनिवर्सिटी

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

You might also like