Opinion

गिरता रुपया, कौन लाचार, सरकार या रिजर्व बैंक ?

Mukesh Asimm

शनिवार को रिजर्व बैंक की अचकचाहट भरी मौद्रिक नीति एक ही बात बता रही है कि वर्तमान चौतरफा पूंजीवादी संकट – वित्तीय, औद्योगिक, व्यापारिक, मौद्रिक, ऋण, रोजगार, मांग, नकदी सभी तरह में संकट – के सामने सरकार से रिजर्व बैंक तक सब लाचार हैं, कुछ फैसला लेने की जिम्मेदारी तक एक दूसरे की ओर सरका रहे हैं.

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पहले मोदी-जेटली और उनके चतुर सलाहकारों को लग रहा था कि कमजोर रुपया और नीची ब्याज दर बेहतर होगी, पर अब उन्हें समझ नहीं आ रहा कि रुपये की लगातार गिरावट को कैसे रोका जाए. उनकी नजर ऊर्जित पटेल पर थी, पर वो तो पल्ला झाड गया, बोला, ये मेरा काम ही नहीं ! उसे मालूम है ब्याज दर बढ़ाने के अपने जोखिम हैं, उद्योग पहले ही 70-72% क्षमता पर चल रहे हैं. फिर उससे भी नीचे चले जाएंगे. तो उसने गेंद अब जेटली के पाले में फेंक दी है.

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जनता को कंगाली में रखकर भयंकर तरीके से चूसा -लूटा

बात असल में ये है कि ये बीमारी पूंजीवादी व्यवस्था में ही फैल चुकी है, इधर-उधर कुछ ठोक-पीट, मरम्मत से कोई फ़ायदा नहीं.  भारतीय पूंजीवाद की जड़ ही रोगग्रस्त है – जन्म से ही रोगग्रस्त पैदा होने से यह शुरू से ही व्यापक औद्योगीकरण में असमर्थ रहा और इसने बहुसंख्यक जनता को कंगाली में रखकर भयंकर तरीके से चूसा-लूटा. इस तरह इसका आधार तो कमजोर रहा पर इसके सर्वोच्च इजारेदार हिस्से के पास पूंजी का विशाल भंडार इकट्ठा हो गया.

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विश्व संकट से निर्यात आशाओं के मुताबिक नहीं बढ़ा

खास तौर पर पिछले 15 साल से इसने साम्राज्यवादी देशों के गिरोह में शामिल होने की महत्वाकांक्षा भी पालनी शुरू की जिसके लिए सौदेबाजी की लेन-देन में इसे भारतीय बाजार में विदेशी पूंजी को भी बहुत सी छूट देनी जरूरी हो गई. 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान बड़े पैमाने पर मौद्रिक प्रसार के जरिये इसने संकट को कुछ वक्त के लिए टालने में भी तात्कालिक कामयाबी पाई और पहले मनमोहन सिंह, फिर मोदी दोनों विश्व राजनेता तक के ख्वाब देखने लगे. पर इसका कमजोर आधार अब इसे ज़ोरों का झटका दे रहा है. विश्व संकट से निर्यात आशाओं के मुताबिक नहीं बढ़ा और अधिकांश गरीब जनसंख्या के चलते घरेलू मांग के विस्तार की सीमा बहुत तंग है. इसलिए भारी मुद्रा एवं ऋण प्रसार की बहुत से पूंजीपतियों के लिए निवेश की गई पूंजी पर प्रति इकाई मुनाफा घट कर कर्ज का ब्याज/किश्त चुकाने लायक भी नहीं रहा. वे कर्ज में डूबकर अब पूरी वित्तीय व्यवस्था को ही संकट के भंवर में फंसा चुके हैं. उधर अमेरिका में अगले संकट के पूर्व के तात्कालिक सुधार से पूंजी लगाना तुलनात्मक रूप से ज्यादा लाभप्रद लग रहा है और मुनाफे के पीछे भागती पूंजी उधर दौड़ रही है, क्रूड के बढ़ते दाम तो हैं ही. पहले अच्छी लगती रुपये की गिरावट अब बड़ा संकट बन चुकी है.

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पूंजीपति वर्ग की सख्त जरूरत है

इस स्थिति में आकर पूंजीवादी संकट का एक ही समाधान है – विनाश ! उद्योगों, कारोबार, जीविका-रोPगार का विनाश ! दिवालिया होते उद्योग-व्यापार, नष्ट होते रोजगार, कृषि से दस्तकारी तक में संकट, अधिकांश मेहनतकश जनता के जीवन में बढ़ती बदहाली – सब इसी का नतीजा हैं. इस संकट से निकलने के लिए सरकार से रिजर्व बैंक तक किसी ओर के पास एक ही उपाय है – मेहनतकश जनता के खून की आखिरी बूंद तक को निचोड़ने की कोशिश ! उसी के लिए फासिस्ट राजनीति को आगे बढ़ाना भी पूंजीपति वर्ग की सख्त जरूरत है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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