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सड़क सुरक्षा माह शुरू, लेकिन हादसों को रोकने की है चुनौती

लॉकडाउन में 20 प्रतिशत तक कम हुई सड़क दुर्घटनाएं

Ranchi: राज्य में सड़क सुरक्षा माह की शुरुआत हो चुकी है. 17 फरवरी तक विशेष जागरुकता अभियान चलाया जायेगा. लोगों को सड़क पर चलने से लेकर गाड़ी चलाने में किन-किन बातों की सावधानी बरतनी है और क्या करना है, इसे लेकर जागरूक किया जायेगा.

अभी तक विभागीय आंकड़ों के मुताबिक, झारखंड में सड़क दुर्घटना में रोजाना औसतन 10 लोगों की मौत हो जाती है, जिसे लेकर भी सरकार काफी गंभीर है और लोगों को लगातार इस मामले में जागरूक करने का काम करती रहती है. इस माह ब्लैक स्पॉटों को दुरुस्त करने से लेकर सड़क पर अधिक से अधिक सुविधा दिलाने का प्रयास होगा ताकि ड्राइविंग में कोई परेशानी नहीं हो.

लेकिन इन सब के बीच सरकारी तंत्र की सुस्ती का आलम दिखता है और हादसे होते रहते हैं. सूबे में स्पीड गवर्नर की बात की जाये तो इसके नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है. लगातार हिट एंड रन के केस दर्ज किये जा रहे हैं. चालू कंपनियों के स्पीड गवर्नर वाहनों में लगाये जा रहे हैं.

इन स्पीड गवर्नर के टेस्टिंग की भी कोई व्यवस्था नहीं है, जबकि सरकार ने वाहनों के लिए स्पीड गवर्नर को अनिवार्य कर दिया है, लेकिन इसे चेक करने के लिए किसी तरह की कोई व्यवस्था नहीं की गयी है. वाहनों में लगे स्पीड गवर्नर के क्वालिटी की न तो जांच हो रही है और न ही उसपर मुहर लग रही है.

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एक वर्ष में 20 प्रतिशत तक सड़क हादसों में हुई कमी, लॉकडाउन बनी मुख्य वजह

वर्ष 2019 की तुलना में 2020 में सड़क हादसों में करीब 20 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गयी है. सड़क हादसों में होने वाली मौतों में 25 प्रतिशत और घायलों के मामले में 17 प्रतिशत की कमी देखी गयी है.

वर्ष 2020 में जनवरी से नवंबर तक सड़क दुर्घटनाओं से जुड़े 3850 मामले सामने आए. इस दौरान 2622 लोगों की मौत हुई, जबकि 2912 लोग घायल हुए.

जबकि जनवरी 2019 से नवंबर तक 4790 मामले सड़क हादसों के दर्ज किए गए. इसमें 3475 लोगों की मौत हुई और 3525 लोग घायल हुए. इसके पीछे कोरोना काल की भी भूमिका बतायी जा रही है. इस दौरान गाड़ियों का परिचालन बंद रहा, जिससे भी हादसों में कमी देखी गई है.

ब्लैक स्पॉट की पहचान तो हुई पर ठोस कदम नहीं उठाए गये

ब्लैक स्पॉटों की पहचान और इसकी सुधार की कई बार योजनाएं बनी. लेकिन अबतक सुधार की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए. कुछ जगहों पर सुधार हुआ, लेकिन अधूरे काम की वजह से हादसों पर लगाम नहीं लगा है. रांची में जो ब्लैक स्पॉट हैं.

उनमें कई तीखे मोड़ हैं. कहीं घाटी, तो कहीं डायवर्सन हैं. एफआइआर के आधार पर ये सर्वे किए गए हैं. स्थानीय पुलिस और प्रशासन ने कई बार ऐसे जगहों को दुरुस्त करने के लिए पत्राचार किया है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गयी है.

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अनट्रेंड चालक की वजह से अधिक दुर्घटनाएं

अगर राजधानी रांची की बात की जाए तो ब्लैक स्पॉटों पर हर दिन छह सड़क हादसे हो रहे हैं. वर्ष 2019 में रांची में 1850 सड़क हादसे हुए हैं. इनमें 350 से अधिक की मौत हुई है, जबकि वर्ष 2018 में कुल 538 सड़क हादसे हुए. इसमें 363 लोगों की मौत हुई, जबकि 328 लोग घायल हुए हैं.

ये आंकड़े डराने वाले हैं और लगातार बढ़ रहे हैं. हैरानी की बात यह है कि ब्लैक स्पॉटों को दुरुस्त करने की दिशा में जिम्मेवार कदम नहीं उठा रहे. आंकड़े बताते हैं कि रांची व आसपास मोटरसाइकिल हादसों की तुलना में कार एक्सीडेंट तेजी से बढ़े हैं. यहां प्राइवेट कारों की वजह से जहां 12 प्रतिशत एक्सीडेंट होते हैं, वहीं कमर्शियल कारों से होने वाले रोड एक्सीडेंट का आंकड़ा 45 प्रतिशत है. इसकी वजह इन चालकों का अनट्रेंड व कम पढ़ा लिखा होना है.

क्या है ब्लैक स्पॉट्स

ब्लैक स्पॉट्स उन इलाकों को कहा जाता है जहां अधिक दुर्घटनाओं की संभावना हो. पिछले तीन साल के रिकॉर्ड में जिन इलाकों में पांच दुर्घटनाएं या दस लोगों की मौत हो चुकी हो, उसे ब्लैक स्पॉट कहते हैं. ऐसे स्पॉट कोई एक निश्चित जगह नहीं बल्कि 500 मीटर तक का रेंज होता है.

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