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रघुवर दास जिस पथ निर्माण विभाग के मंत्री थे वहां होता रहा भ्रष्टाचार, चुप रही सरकार, अब हो रही कार्रवाई

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Ranchi :  झारखंड में पांच साल तक भाजपा का शाषण रहा. मुख्यमंत्री रघुवर दास थे. वह 19 महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री भी थे. इसमें से एक विभाग पथ निर्माण विभाग भी है. पथ निर्माण विभाग में भ्रष्टाचार होता रहा.

दो दिन पहले पथ निर्माण विभाग में हुए भ्रष्टाचार के कई मामले प्रारंभिक जांच में सही पाये गये. जिसके बाद पथ निर्माण विभाग के अभियंता प्रमुख रास बिहारी सिंह को सरकार ने सस्पेंड कर दिया है.

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पथ निर्माण विभाग में यह टेंडर घोटाला अभी तो करोड़ों में ही है. लेकिन, आशंका जतायी जा रही है कि इस विभाग में अरबों रुपये का टेंडर घोटाला हुआ है. मंत्री और मुख्यमंत्री की हैसियत से रघुवर दास की जिम्मेवारी भ्रष्टाचार पर रोक लगाने की थी. लेकिन, उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की.

इसी विभाग के सचिव राजबाला वर्मा भी थीं, आरोप है कि उनके कार्यकाल में भी घोटाले हुए. बाद में रघुवर दास ने राजबाला वर्मा पर कार्रवाई के बदले उन्हें मुख्य सचिव बना दिया. हम यहां पथ निर्माण विभाग से जुड़े उन घोटालों कि विस्तृत जानकारी दे रहे हैं.

जिसक आधार पर वर्तमान सरकार ने कार्रवाई की है. सरकार को सूचना है कि पथ निर्माण विभाग के अलावा भवन निर्माण विकास, ग्रामीण कार्य विभाग, जुडको और जल संसाधन विभाग में भी बड़े पैमाने पर भी घोटाले हुए हैं.

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सरयू राय ने सीएम को पहले ही बताया था,रास बिहारी सिंह की भूमिका संदिग्ध

सरयू राय ने तत्कालिन सीएम रघुवर दास का पत्र लिखकर रास बिहारी सिंह की भूमिका को लेकर बताया भी था.  पत्र में उन्होंने कहा था कि विधानसभा समिति ने पाया है कि भवन निर्माण विभाग में टेंडर मैनेज किया जा रहा है.

और इस काम में अभियंता प्रमुख रास बिहारी सिंह की भूमिका संदेहास्पद है. उन्होंने टेंडर मैनेज किया है. ऐसे में उनकी संपत्ति की जांच निगरानी विभाग से तीन महीने के अंदर करानी चाहिए. साथ ही इसकी जांच भी की जाये कि प्रधान सचिव ने इन्हें संरक्षण क्यों दिया.

इसके बाद भी रघुवर दास ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया. जिसके बाद अब पथ निर्माण के टेंडर की गड़बड़ियों में इनका सबसे अहम रोल पाया गया. जिसके बाद वर्तमान की हेमंत सोरेन की सरकार ने इनपर कार्रवाई करते हुए सस्पेंड कर दिया है.

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विभिन्न विभाग की योजनाओं की विस्तृत जानकारी छुपायी जाती रही

मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव ने पथ विभाग सहित भवन विभाग, जल संसाधन, पेयजल एवं स्वच्छता विभाग, कृषि विभाग, कृषि एवं पशुपालन विभाग और ऊर्जा विभाग को पत्र लिखकर योजनाओं की विस्तृत जानकारी वेबसाइट पर अपलोड करने को कहा था. लेकिन ये सूचनाएं उपलब्ध नहीं करायी गयीं.

लंबे समय तक इन निर्देशों को नहीं पालन करने वालों पर कार्रवाई नहीं होने पर सरयू राय ने आपत्ति भी जतायी थी. और इसे समझ से परे और रहस्यमय बताया था. सरयू राय ने मुख्यमंत्री को पत्र के माध्यम से जानकारी देते हुए बताया था कि पिछले चार-पांच सालों में बने और निर्माणाधीन पथों का ट्रैफिक सर्वे, एक्सल लोड सर्वे, लोड कैरिंग कैपिसिटी की गणना और मिट्टी जांच की रिपोर्ट देख लेने पर सड़कों के रोड क्रस्ट डिजाइन और निर्माण की गुणवत्ता का पता चल जाएगा.

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गड़बड़ी होने की बात सामने आ जाएगी. इस वजह से आदेशों का पालन नहीं किया गया.  भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के बजाय तत्कालिन मुख्यमंत्री ने अपने सहयोगी मंत्री की बात को नजरअंदाज कर दिया.

पथ निर्माण विभाग ने बिना टेंडर डाले 51.62 करोड़ का ठेका दिया

पथ निर्माण विभाग ने सड़क निर्माण के लिए सुरत की यूनिक कंस्ट्रक्शन कंपनी को बिना टेंडर डाले 51.62 करोड़ का ठेका दे दिया गया था. कंपनी को मोबिलाईजेशन अमाउंट के रुप में पहले ही 4 करोड़ रुपये दे दिये गये थे.

सितंबर 2019 तक कंपनी को कुल 7.65 करोड़ रुपये का भुगतान हो गया. योजना एंव वित्त विभाग के समीक्षा के दौरान अपर मुख्य सचिव ने इस बात का खुलासा किया. जांच के दौरान जल संसाधन विभाग, ग्रामीण कार्य विभाग और भवन निर्माण विभाग में भी घोटाले की बात सामने आयी है.

पिछले चार वर्षों में हुए टेंडरों की जांच के लिए विकास आयुक्त की अध्यक्षता में जांच कमिटी बना दी है. दो महीने के अंदर रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है.

जिस कंपनी को बिना टेंडर डाले ठेका मिला, वो कंपनी झारखंड में कोई काम कर ही नहीं रही

जब ऑडिट में आपत्ति की गयी तब पथ निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता ने उक्त ठेकेदार को डिबार कर दिया. इस मामले को लेकर यूनिक कंस्ट्रक्शन कंपनी को नोटिस किया गया. नोटिस का जवाब देते हुए कंपनी ने बताया कि कंपनी झारखंड में कोई काम कर ही नहीं रही है.

न ही पथ निर्माण विभाग से कोई एडवांस लिया है. साथ ही उक्त कंपनी ने मामले के जांच के लिए आग्रह भी किया. लेकिन, अभियंता प्रमुख ने कोई कार्रवाई नहीं की. जांच कमिटी ने इसे सीधे सरकारी राशि का गबन माना.

30 फीसदी कम राशि कोट करने पर भी दिया गया टेंडर

योजना एवं वित्त विभाग ने जांच में पाया कि पथ निर्माण विभाग के विभिन्न टेंडरों में एमओआर बढ़ाकर करोड़ो रुपये का घोटाला किया गया. जांच में पाया गया कि दर्जनों ठेका निविदा की दर से 30 प्रतिशत कम रेट पर दे दिया गया.

नियमों के तहत निविदा दर से 10 फीसदी नीचे कोट किये गये निविदा ही वैलिड होते हैं.  दस फीसदी अधिक दर पर रेट कोट होने से कैबिनेट की स्वीकृति जरुरी होती है. लेकिन कई मामलों में 30 फीसदी रेट कम कोट करने पर भी टेंडर दे दिया गया.

30 दिसंबर 2019 को योजना एंव वित्त विभाग के समीक्षा के दौरान इस घोटाले का खुलासा किया गया. इसके अलावा जुडको में भी एमओआर शिड्यूल ऑफ रेट बढ़ाकर मनमाने तरीके से टेंडर करने और कई मामले में मनमाना मोबिलाईजेशन अमाउंट देने की शिकायत सरकार को मिली है.

आदेश के अनुसार 01 अप्रैल 2016 के बाद हुए सभी टेंडरों के जांच के आदेश हैं.

ऐसे हुआ खुलासा

पथ निर्माण विभाग के इंजीनियरों ने फर्जी कागजात पर कई कंपनी को ठेका दिया. योजना वित्त विभाग की समीक्षा के दौरान पता चला कि एक समान काम के लिए पथ निर्माण विभाग और ग्रामीण कार्य विभाग की अलग-अलग दर हैं.

इस वजह से ही बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितता सामने आयी. इससे राज्यकोष की कितनी हानि हुई यह जांच के बाद पता चलेगा. शिड्यूड ऑप रेट समिति के अध्यक्ष अभियंता प्रमुख को इस मामले में दोषी पाया गया है. उन्हें सस्पेंड भी कर दिया गया है.

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