
Faisal Anurag
राजनीतिक तौर पर जागरूक और देश में पहल करने वाला राज्य बिहार अपनी स्वास्थ्य सेवाओं, गरीबों और श्रमिकों को राहत देने के मामले में आलोचना का विषय बना हुआ है. केंद्रीय टीम के बिहार दौरे ने राज्य सरकार की उपलब्ध्यिों पर सवाल खड़े किये हैं. बिहार विकास दर में काफी आगे है. लेकिन उस विकास का समान वितरण लोगों तक नहीं हो रहा है. स्वास्थ्य सेवाओं में सरकारी तंत्र पर निर्भरता के मामले बिहार अव्वल है. लेकिन वह इस पर प्रति व्यक्ति मात्र 348 रुपये खर्च करता है. जबकि राष्ट्रीय औसत 724 रुपये है. कोरोना प्रकोप के दौर में भी इस खर्च को नहीं बढाया गया है.
जबकि इस समय बिहार में 27 हजार से ज्यादा संक्रमण के मामले हैं. इसी तरह बिहार में निजी अस्पतालों की तुलना में ज्यादा मरीज सरकारी सेवाओं पर ही निर्भर हैं. इस मामले में भी राष्ट्रीय औसत से बिहार बहुत पीछे है. पिछले 15 सालों से बिहार की सत्ता पर नीतीश कुमार भाजपा के साथ हैं. बीच के कुछ अपवादों के बाद. इस दौर में बिहार की विकास दर के बड़े-बड़े दावे किए गये. और वह राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान भी खींचता है. राज्य के इकोनामिक सर्वे के अनुसार बिहार 2019-2020 वित्त वर्ष में 10.5 प्रतिशत की दर से विकास कर रहा है. यह वही दौर है जब देश का ग्रोथ रेट गिरा. और उसने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए खराब संकेत दिया. ऐसे हालात में बिहार की विकास दर चौंकाने वाली है. जबकि बिहार की बुनियादी सुविधाओं में विषमता साफ दिखती है. और गिरावट भी.
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तेजस्वी यादव ने पहले भी मुख्यमंत्री पर “12.6 करोड़ बिहारियों के जीवन के साथ खिलवाड़” करने और लोगों की जिंदगी को दांव पर लगाकर अपनी छवि चमकाने का आरोप लगाया. आरजेडी नेता ने शनिवार को कहा, “बिहार कोविड-19 महामारी मामले में ग्लोबल हॉट स्पॉट बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है.” उन्होंने सरकार पर कम टेस्टिंग करने का आरोप लगाया.
लॉकडाउन से तंग-ओ-तबाह श्रमिक जब बिहार आये तो राज्य के मुख्यमंत्री ने वायदा किया कि उन्हें अब राज्य में ही रोजगार मिलेगा. लेकिन हकीकत यह है कि बिहार से श्रमिक बड़ी संख्या में राज्य सरकार का भरोसा खो कर वापस जाने के लिए बाध्य हुए हैं. बिहार श्रमिक पलायन के नजरिए से सबसे बड़े राज्यों में है. इससे जाहिर होता है कि आखिर विकास दर और आम लोगों के विकास के बीच इतना गहरा अंतर क्यों हैं?
पूरे देश की हकीकत यह है कि भारत के श्रमिक और किसान दोनो ही परेशान हैं. और उनकी आय में उछाल नहीं आया है. आमतौर पर होना यह चाहिए कि ग्रोथ रेट और आमजन की आय के बीच एक गहरा संबंध होता. और विकास के लाभ उन्हें भी हासिल होना चाहिए. कोविड19 ने तो मुसीबत को और बढ़ा दिया है. जब किसान और श्रमिक सबसे ज्यादा परेशानहाल हो रहे हैं. बिहार के भी बेरोजगार, किसानों और श्रमिकों दोनों का यही हाल है. लेकिन जाति-राजनीति के संयोजन का हुनर उसे कोई राजनीतिक स्वर नहीं दे पा रहा है.
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यदि कोरोना संक्रमण के दौर में बिहार के लोग आक्सीजन सिलेंडर और अस्पताल में बेड के लिए दर-दर भटक रहे हैं तो इस गहरे मर्ज को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. न तो राज्य अपनी आबादी के अनुसार टेस्ट कर पा रहा है और न ही ट्रेसिंग. जबकि बिहार सरकार के मंत्री ने दावा किया था कि घर-घर जा कर जांच करने में बिहार सबसे आगे है. बिहार ने न तो देश के दूसरे राज्यों से कोई सबक लिया है और न ही अपना कोई नया तरीका विकसित किया है.
बिहार की जन वितरण प्रणाली की नाकामयाबी भी इस दौर में विभिन्न रिपोर्टो में उजागर हो चुकी है. बिहार की पंचायतों और निकायों के प्रतिनिधियों का दावा है कि बिहार में छह किलो अनाज या तो देरी से लागों तक पहुंचा है या बिल्कुल नहीं गया है. इस दावे को नजरअंदाज करना आसान नहीं है. श्रमिकों की वापसी से भी इसे जोड़ कर देखे जाने की जरूरत है.
जुलाई में अलायंस फॉर दलित राइट्स ने राज्य के 14 जिलों के 1400 दलित और आदिवासी परिवारों का सर्वेक्षण किया था. ताकि पता लगाया जा सके कि लॉकडाउन का इन परिवारों की आर्थिक क्षमता पर क्या असर पड़ा है. रिपोर्ट से पता चलता है कि ग्रामीण बिहार में इन समुदायों को खाद्यान्न की कमी हो रही है. रिपोर्ट में लिखा गया है, “इन लोगों की बड़ी संख्या को उन कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिला है जिनसे जारी संकट से पार पाने में इन्हें मदद मिल सकती थी.”
उस रिपोर्ट में आगे लिखा है कि सर्वे किए गए परिवारों में से केवल दो फीसदी ऐसे परिवार थे जो लॉकडाउन की घोषणा के दिन खाद्य दृष्टि से सुरक्षित थे. और जिनके पास एक साल का अनाज उपलब्ध था. 49.4 फीसदी के पास केवल कुछ दिनों का अनाज और 14.5 फीसदी लोगों के पास बिल्कुल अनाज नहीं था.
बिहार के राजनीतिज्ञ इस समय नवंबर-दिसंबर में होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयार को ले कर ज्यादा सक्रिय हैं. आनलाइन प्रचार बता रहा है कि विकास या राहत की बजाय प्राथमिकता चुनावों पर केंद्रित है. बिहार के विपक्ष के कई नेताओं ने चुनाव आयोग को पत्र लिख कर मांग की है कि चुनाव को टाल दिया जाए. और कोविड संक्रमण से बिहार कैसे बचे, इसको फोकस किया जाए. केंद्रीय टीम के दौरे के समय जो तथ्य सामने आए हैं, उसमें सोशल मीडिया या विपक्ष के आरोपों की पुष्टि ही होती है.
ऐसे हालात में बिहार को विशेष राणनीति की जरूरत है. बिहार ने 16 जुलाई से 31 जुलाई तक लॉकडाउन लगाया है. लेकिन चैनलों में दिखाया गया है कि किस तरह यह प्रभावी नहीं है. और भीड़ जहां तहां जमा हो ही रही है. दरअसल बिहार की बड़ी चुनौती यह है कि वह देश की आबादी के मामले में दूसरा बड़ा राज्य है. और जिस गति से संक्रमण का विस्तार हो रहा है, उसमें लोगों तक स्वास्थ्य राहत पहुंचाने की क्षमता नहीं दिख रही है.
केंद्रीय टीम ने बंगाल का भी दौरा किया था. लेकिन बिहार और बंगाल के दौरे का अंतर यह है कि जहां टीम बंगाल में वहां की राज्य सरकार की विफलताओं को पेश कर रही थी, वहीं बिहार में उसका नजरिया भिन्न दिख रहा है. बिहार भाजपा शासित है. और बंगाल में ममता बनर्जी मुख्यमंत्री है. कोविड19 के संकट के समय इस तरह की राजनीति पर कई लोग लिख और बोल चुके हैं.
लेकिन इससे न तो केंद्र कुछ सीख रहा है और न ही वह कोविड 19 को ले कर अपनी जिम्मेदारी में राज्यों की समान भूमिका निर्धारित कर पा रहा है. इस पर अलग से चर्चा की जरूरत है कि आखिर विकास दर और विकास के समान वितरण के बीच फर्क क्यों है. और राज्यों के साथ भी समानता क्यों नहीं है.
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