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झारखंड में ब्रीडिंग पॉलिसी का हो रहा उल्लंघन, बेहतर नस्ल के पशुधन दूध के कारोबार पर छा रहा संकट

Ranchi :  झारखंड में वर्ष 2018 से ब्रीडिंग पॉलिसी के प्रावधानों का उल्लंघन किया जा रहा है. इस कारण कृत्रिम गर्भाधान के जरिये उन्नत नस्ल के गायों को तैयार करने और इससे मिल्क प्रोडक्शन में आत्मनिर्भर बनने की कोशिशों को खतरा पैदा हो गया है.

Sanjeevani

पिछले दो वर्षों से अलग-अलग जिलों और पंचायतों में स्वतंत्र तौर लोग ब्रीडिंग पॉलिसी को ताक पर रखकर किसानों, पशुपालकों के लिए चुनौती खड़ी कर रहे हैं.

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गव्य विकास पदाधिकारियों ने जतायी है चिंता

झारखंड में पशु प्रजनन नीति 2011 के अनुसार ही कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम चलाये जाने हैं. इसके सभी पहलुओं का अनुपालन सुनिश्चित हो, इसके लिए पशुपालन, गव्य विकास पदाधिकारियों और संबंधित विभागों के अलावा एनजीओ और पशु विकास कार्यक्रमों में लगी संस्थाओं को निर्देश दिए गये थे. धनबाद में कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रमों में लगे प्राइवेट लोगों द्वारा ब्रीडिंग पॉलिसी के उल्लंघन की शिकायत वहां के जिला गव्य विकास पदाधिकारी ने पूर्व में की है.

गव्य विकास निदेशक, झारखंड को पत्र लिखकर उन्होंने चिंता जतायी थी. इसमें लिखा था कि कृत्रिम गर्भाधान प्रोग्राम में लगे कुछ केंद्र प्रभारियों द्वारा बाजार से सीमेन खरीदकर किसानों के पशुओं का कृत्रिम गर्भाधान किया जा रहा है. यह ब्रीडिंग पॉलिसी के विरुद्ध है.

इसका बुरा प्रभाव दुग्ध उत्पादन और पशुओं के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है. इससे उन्नत नस्ल तैयार होने की बजाये नस्लें ख़राब होंगी.  जानकारी के अनुसार कई अन्य जिलों से भी इसी तरह की शिकायतें आ चुकी हैं.

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ब्रीडिंग पॉलिसी का झारखंड को मिला है लाभ

झारखंड गठन के समय से कृषि एवं पशुपालन विभाग द्वारा कृत्रिम गर्भाधान प्रोग्राम कार्यक्रम चलाया जा रहा है. राज्य की अपनी ब्रीडिंग पॉलिसी आने के बाद उन्नत नस्ल के मवेशियों की संख्या में बढ़ोत्तरी तो हुई ही है, दूध उत्पादन में भी वृद्धि हुई है.

2004-05 से राज्य सरकार ने इस काम में एनजीओ की भी मदद लेनी शुरू की. इसका नतीजा रहा कि 2017-18 तक राज्य में करीब 64,475 बछिया दुग्ध उत्पादन में आ गयी. इसके जरिये 19 करोड़ लीटर से भी अधिक दूध हर साल झारखंड को मिलने लगा. प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता 159 ग्राम से बढ़कर 171 ग्राम हो गयी.

ब्रीडिंग सेंटरों पर नहीं हो रहा है मानकों का पालन  

वर्ष 2011 तक राज्य में कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रमों के बेहतर संचालन के लिए 1010 सेंटर सभी जिलों में खोले गये. इन केन्द्रों के संचालन हेतु योग्य लोगों को चयनित कर गव्य विकास विभाग के सहयोग से कृत्रिम गर्भाधान कार्यों में ट्रेंड किया गया. ब्रीडिंग पॉलिसी के अनुसार काम करने का तरीका भी बताया गया. जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में देहाती गायों की अधिकता को देखते हुए वहां स्वदेशी नस्लों के हिसाब से कृत्रिम गर्भाधान करने पर ध्यान रखने को कहा गया.

लिक्विड नाइट्रोजन (एलएन 2), सीमेन स्ट्रॉ (SS) के समुचित संयोजन, उचित रख रखाव और अन्य जरुरी जानकारियां भी दी गयीं. लेकिन इन मानकों का पालन नहीं हो रहा है. ट्रेनिंग के बाद अलग अलग जिलों में संचालित सेंटरों के संचालन का जिम्मा इन प्रशिक्षित लोगों को मिला.

इस कार्य में सहयोग को एनजीओ को भी जिम्मा मिला. वर्तमान में 430 केंद्र झारखंड स्टेट इम्प्लीमेंटेशन एजेंसी के पास थे जिसे उसने बिना वैधानिक प्रावधानों के एक एनजीओ जेके ट्रस्ट को सौंप दिया था.

जांच रिपोर्ट के आधार पर एमओयू रद्द करने का आदेश

फ़िलहाल पिछले माह कृषि, पशुपालन विभाग ने जांच रिपोर्ट के आधार पर इन केंद्रों को गलत पाया. और जेएसआईए तथा ट्रस्ट के बीच हुए एमओयू को रद्द करने का आदेश जारी किया है. इसके अलावा 530 सेंटर ऐसे हैं जिन पर विभाग का नियंत्रण ख़त्म हो चुका है. ऐसे केन्द्रों के संचालक किसानों और पशुपालकों के लिए आफत बनते नजर आ रहे हैं.

वे ब्रीडिंग पॉलिसी का अनुपालन सही तरीके से नहीं कर रहे हैं. इसका खामियाजा कृषकों, पशुपालकों और विभाग को भी भुगतने का खतरा शुरू हो चुका है. जिला गव्य विकास पदाधिकारियों के पत्राचार के बावजूद कृषि एवं पशुपालन विभाग इस दिशा में कोई पहल अब तक शुरू नहीं कर सका है.

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