
Ranchi: जन आंदोलनों के संयुक्त मोर्चा का दो दिवसीय कन्वेंशन गोस्सनर थेलोजिक्ल हॉल में आयोजित किया गया. पांचवी अनुसूची के प्रावधान और अधिकार एवं सीएनटी-एसपीटी एक्ट में सरकार की ओर से की जा रही फेरबदल के विरोध में इस कार्यक्रम का आयोजन हुआ है.
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सम्मेलन में संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन के साथ ही सरकार परंपरागत गांव की सीमा के भीतर जो गैर मजरुआ आम, गैर मजरूआ खास, जंगल-झाड़ी, नदी-नाला-झरना, चारागाह, खेल मैदान, पूजास्थल जैसे सामुदायिक उपयोग की भूमि क्षेत्र को रघुवर सरकार के द्वारा भूमि बैंक में शामिल कर, जमीन को कॉर्पोरेट घरानों को हस्तांतरित करने की योजना बनाई हुई है. जो झारखंड को पूरी तरह से कंपनियों के हवाले करने की साजिश है. रघुवर सरकार की इस योजना से आनेवाले समय में आदिवासी-मूलवासी किसान सहित प्रकृति के साथ जुड़े रहने वाले समुदाय पूरी तरह खत्म हो जाएंगे.
दमनकारी है सरकार की नीति-बारला
सम्मेलन को संबोधित करते हुए दयामनी बरला ने कहा पांचवी अनुसूची के अंतर्गत जल-जंगल-जमीन पर अपने परंपरागत अधिकार संविधान प्रद्त राज्य के निवासियों को है. सरकार की जमीन अधिग्रहण की योजना है. वही गांव सभा की सहमति के बिना किसी जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जा सकता है. वही रघुवर सरकार ने पांचवी अनुसूची एवं सीएनटी-एसपीटी एक्ट के प्रावधानों को खारिज करते हुए हजारीबाग एवं गोडडा में किसानों की कृषि भूमि को जबरन एनटीपीसी और अडाणी को देने का काम किया है. जिसका किसान के द्वारा विरोध करने पर उनपर फर्जी मुकदमे कर फंसा कर जेल में डाल जा रहा है.
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आदिवासी-किसानों का हक छीन रही सरकार- माड़ी
सम्मेलन को संबोधित करते हुए पूर्वी सिंहभूम के कुमार चन्द्र माड़ी ने कहा झारखंड राज्य पांचवी अनुसूची के अंतर्गत आता है. संविधान में इस इलाके के आदिवासी, किसान समुदाय को विशेष अधिकार दिया गया है. झारखंड सरकार के द्वारा सीएनटी- एसपीटी एक्ट में संशोधन कर, इसे समाप्त करने की दिशा में सरकार काम कर रही है. राज्य के गरीब परिवारों को गैर मजरुआ आम जमीन का भूदान के तहत 40 साल पहले सरकार के द्वारा बंदोबस्त कर दिया था. इस भूखंड को भी सरकार खाली कराने के तहत बंदोबस्ती खारिज करने की योजना बना ली है ताकि खाली कराए जा रहे भूमि, भूमि बैंक के तहत को हस्तांतरित की जा सके.

इस दौरान जेरोम जराल्ड कुजूर ने कहा कि अलग राज्य पुनर्गठन की घोषणा के बाद से ही भाजपा नित सरकार के द्वारा राज्य की आदिवासी-मूलवासी किसानों को धोखा देने का काम किया जा रहा है. यह धोखा फरवरी 2016 में आदिवासी-मूलवासी के विरोध में स्थानीय नीति के रूप में यहां के आम लोगों के ऊपर थोपा गया, जो पूरी तरह से अपने संप्रदायवादी राजनीति को मजबूती देने के लिए आधार तैयार करने के लिए किया गया हैं.
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वही अडाणी पावर प्लांट के विरोध में संघर्ष कर रहे चिंतामणि ने अपने संबोधन में कहा कि अडाणी पावर प्लांट के लिए 2880 एकड़ जमीन अधिग्रहित करनी है. वही किसानों के विरोध के बाद कंपनी कहती है कि 970 एकड़ में ही प्लांट शुरू करेंगे, जमीन के अधिग्रहण के लिए किसानों से जबरन जमीन लूटी जा रही है, विरोध करने पर किसानों को फर्जी मुकदमे के साथ-साथ मारपीट भी की जाती है. रघुवर सरकार इन सारी उत्पीड़न को बढ़ावा देने का काम कर रही है.
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जन आंदोलनों के संयुक्त मोर्चा की ओर से आयोजित जनसम्मेलन में ‘झारखंड की स्थिति एवं जन आंदोलनों’ का नजरिया विषय पर संघर्ष की रणनीति दूसरे दिन के कार्यक्रम में तैयार की जायेगी. आयोजन में आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच, केंद्रीय जन संघर्ष समिति लातेहार-गुमला, आजादी बचाओ आंदोलन हजारीबाग, आजादी बचाओ आंदोलन गोडडा, तजना डैम संघर्ष समिति, जबड़ा डैम प्रभावित समिति, कोयल कारो जन संगठन बसिया क्षेत्र, भूमि रक्षा वाहिनी किसान मोर्चा, गांव गणराज परिषद, विस्थापन विरोधी एकता मंच एवं विस्थापन मुक्ति वाहिनी के 200 से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. सम्मेलन को सुनील मिंज, शिवा कच्छप, अजय तिर्की ने भी संबोधित किया.
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