
Faisal Anurag
जिस तरह के भ्रष्टाचार के मामले लगातार सामने आ रहे हैं, उससे जाहिर है कि रघुवर दास जुमलों की सरकार के मुखिया साबित हो रहे हैं. जीरो टॉलरेंस जैसे शब्दों का मतलब ही राज्य में बदल गया है. जीरो टॉलरेंस के नाम पर भ्रष्टाचार को राज्य में पाला-पोसा जा रहा है.
विधानसभा में दो दिनों से यह मामला जिस तरह उठा है, वह बताता है कि हालात बेहद गंभीर हैं और भ्रष्टाचार करने वाले अधिकारियों को सत्ता शीर्ष का समर्थन मिल रहा है.
जेबीवीएनएल के प्रबंध निदेशक पर जिस तरह के आरोप लगे हैं. और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई का नहीं होना जाहिर करता है कि मुख्यमंत्री खुद ही पुरवार के सरंक्षक बने हुए हैं.
इसी विभाग के एक सीएफओ को जिस तरह संरक्षण दिया गया है वह कोई सामान्य घटना नहीं है. उच्चपदस्थ अनेक लोगों पर भ्रष्टाचार के अनेक आरोप हैं, लेकिन उसकी जांच भी करना उचित नहीं समझा गया है.
यह धारणा पुष्ट हो रही है कि जुमलों से राज्य न तो भ्रष्टाचारमुक्त हो सकता है और ना ही पारदर्शी सरकार और साफ-सुथरे प्रशासन का मकसद हासिल किया जा सकता है.
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इस सवाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि आखिर मुख्यमंत्री के पास जो विभाग है, उसमें भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप क्यों हैं?
मुख्यमंत्री को सार्वजनिक तौर पर इस बाबत अपना नजरिया उजागर करना चाहिए. मुख्यमंत्री जो बोलते हैं, यदि वह हकीकत है तो तमाम आरोप की उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच करानी चाहिए.
मैनहर्ट का मामला हो या कंबल घोटाला रघुवर दास की भूमिका संदेहास्पद ही दिखती है. विपक्ष यदि इन आरोपों को बुलंदी से उठा रहा है तो उसे ताकत भी सरकार के नजरअंदाज करने और कालीन के नीचे गंदगी को छुपा लेने का ही नतीजा है. अगले कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होगा और इस सवाल का जबाव रघुवर दास को वोटरों के बीच देना ही होगा.
राज्य गठन के बाद से सरकारों के दौर में राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार चरम पर पहुंचा. बहुमत जुटा लेने के बाद भी हालात में कोई खास बदलाव नहीं दिखता है.
अनेक ऐसे अधिकारी जिन पर अतीत और वर्तमान में भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, इस सरकार में भी यदि संरक्षित हैं तो यह बीमारी की शीर्ष संरक्षण में हैं और इन अधिकारियों को अभयदान मिला हुआ है.
राजनीति जिस तरह धनबल की गिरफ्त में है, वह भी आम बात नहीं है. भ्रष्टाचार का राजनीतिक संरक्षण बेहद गंभीर मामला है. कड़ा रूख दिखाते हुए कई बार रघुवर दास ने भ्रष्टाचार पर प्रहार किया है, वह राज्य की असलियत का बयान नहीं है.
राज्य को यदि भ्रष्टाचाररहित करना है तो जरूरी है कि भ्रष्टाचार को संरक्षित करने वाले भी दंडित हों. राज्य सरकार का इस हालात में दायित्व है कि वह भ्रष्टाचार के सवाल पर एक व्हाइट पेपर प्रकाशित करें.
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सरकार के ही एक मंत्री तो सार्वजनिक तरीके से अपना असंतोष जाहिर करते रहे हैं. और राज्य में भ्रष्टाचार की वास्तविकता को उजागर भी करते रहे हैं.
उन्होंने तो एक बार अपने घुटन का भी इजहार किया था और हालात को असाह्य बताया था.राज्य का एक संवेदनशील तबका यह सोचने के लिए बाध्य है कि राज्य गंभीर आर्थिक भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है.
मैनहर्ट के मामले में सरकार की उदासीनता और नजरअंदाज करने की प्रवृति से जाहिर होता है कि इसमें शीर्ष के लोग शामिल हैं और इसके प्रमाण भी सामने हैं. यही नहीं, राज्य सरकार को इस मामले में पूरी जांच करवाकर सच को सामने लाना चाहिए.
मैनहर्ट तो एक ही मामला नहीं है, इस तरह के अनेक मामले उजागर हुए हैं और बिना जांच के ही उन्हें हाशिए पर धकेल दिया गया है.
झारखंड अपने स्थापना काल से ही गंभीर भ्रष्टाचार से घिरा रहा है और इस प्रक्रिया को केवल जुबानी दावों से ही बदला नहीं जा सकता है.
राजनीतिक समर्थन मात्र इस बात की गारंटी नहीं है कि सबकुछ ठीक-ठाक है. यह सिर्फ कहा ही नहीं जाना चाहिए बल्कि यह महसूस भी हो कि ऐसे वातावरण का निर्माण जागरूक तरीके से किया जाना चाहिए.
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