
Amit Jha
Ranchi. पूर्व विधायक सुखदेव भगत इन दिनों राजनीतिक तौर पर शंटिंग में हैं. ना कांग्रेसी, ना भाजपाई. पर इन दिनों उनकी हालत मेरो मन अनत सुख कहां पावै, जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै…जैसी ही है. कांग्रेस में वापसी के लिये आलाकमान के पास आवेदन कर रखा है. 2019 में हुए असेंबली चुनाव के ठीक पहले पाला बदलते हुए पंजे को छोड़ कमल का फूल थाम लिया था. लोहरदगा की सीट पर ताल ठोकी, रामेश्वर उरांव के सामने पस्त हो गये. अक्टूबर (2020) में भाजपा ने अपने यहां से बाहर का रास्ता दिखला दिया. तब सुखदेव ने कहा था- कौन परवाह करता है.
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अब वे आलाकमान के आदेश के इंतजार में हैं. तब तक सोशल मीडिया में एंटी मोदी, एंटी भाजपा मुहिम में लगे हुए हैं. कोई दिन ऐसा नहीं गुजर रहा जब वे मोदी सरकार को कॉरपोरेट का दोस्त और किसानों का दुश्मन ना बता रहे हों. महंगाई, रोजगार, खेती-किसानी, शिक्षा जैसे मसलों पर भी केंद्र पर लगातार सवाल दाग रहे हैं.
हाथ में नहीं है कांग्रेसी लाइसेंस पर दिल कांग्रेसी
सुखदेव भगत के राजनीतिक जीवन का सफर कांग्रेस से शुरू हुआ था. साल 2005 में राज्य प्रशासनिक सेवा को छोड़कर वे कांग्रेस में शामिल हुए थे. बाद में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद तक भी पहुंचे. इसी साल लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर लोहरदगा सीट से चुनाव लड़ा पर कामयाब ना हो सके थे. बाद में लोहरदगा से विधायक बने. नए प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर उरांव को बनाए जाने के बाद से सुखदेव ने कांग्रेस से किनारा कर लिया. रामेश्वर के कामकाज के तरीके पर सवाल उठाते हुए उन्होंने आलाकमान से शिकायत भी की थी. इसके बाद भाजपा ज्वाइन किया. निकाले गये. इसके बाद से सोशल मीडिया के जरिये अपने खांटी कांग्रेसी होने का परिचय देने में लगे रहते हैं. अभी हाथ में फिर से कांग्रेसी होने का लाइसेंस नहीं है पर दिल से खुद को कांग्रेसी होने का एहसास सबों को दिलाते हैं.
पिछले पांच दिनों की देखें बानगी
ट्विटर पर सुखदेव भगत ने अपना परिचय पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष औऱ विधायक के तौर पर दिया है. वहां हर दिन केंद्र सरकार और उसकी नीतियों पर सवाल पूछते हैं, चुटकी लेते हैं. कटाक्ष भी करते हैं. उदाहरण के तौर पर पिछले 5 दिनों (15 से 20 जून) के कुछ पोस्ट को देखें.
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20 जून को पेट्रोल, डीजल की बढ़ती कीमतों पर कहा कि- विश्व गुरु, अपने मित्रों को इतना मत खिलाओ कि जनता का खाने का बजट गड़बड़ा जाए. 19 जून को भी लिखा-चूहे की तरह क्यों कुतर रहे हो, सांप की तरह डस के सीधा जान ले लो. इसी दिन कहा- आपके 2 मित्रों की शान ने ली असंख्य किसानों की जान. कृषि कानून केंद्र द्वारा रद्द नहीं किये जाने का संकल्प दोहराये जाने पर उन्होंने इसे लिखा. 18 जून को मध्य प्रदेश के आदिवासियों की स्थिति को लेकर लिखा. पूछा कि क्या हीरे की चमक आदिवासियों के जीवन से ज्यादा है? छतरपुर में हीरे के खनन के लिये 944.26 एकड़ वनभूमि ली गई. इससे 17 गांव और 7000 आदिवासी लोग विस्थापित होंगे. आदिवासी जीवन इन जंगल पर निर्भर है. 16 जून को केंद्र सरकार को मौत का सौदागर बताते हुए कहा कि वैक्सीन का डोज 6–8 सप्ताह की जगह 12 से 16 सप्ताह क्यों बढ़ाया गया. 15 जून को मोदी सरकार पर तंज कसते लिखा- शासन का मतलब राष्ट्र के प्रति समर्पण और विवश (विश्व) गुरु “दो” के प्रति समर्पण. इशारा दो बड़े कॉरपोरेट प्रमुखों को लेकर रहा.

राजनीतिक भूल रही कमल का फूल
न्यूज विंग से सुखदेव भगत ने कहा कि 2019 के दौरान कुछ विकट परिस्थितियों के कारण उन्होंने कांग्रेस छोड़ी, उससे दिली नाता नहीं. यही कारण रहा कि चुनाव प्रचार के दौरान भी अपने कार्यालय से सोनिया गांधी, राहुल गांधी की फोटो उन्होंने नहीं हटायी. वे और उनका परिवार, पारंपरिक तौर पर कांग्रेसी रहे हैं. पार्टी ने उन्हें बहुत कुछ दिया है. भाजपा ज्वाइन करने के बाद एक दिन भी उस पार्टी के कार्यालय में फिर पैर नहीं रखा. कमल का फूल थामना उनकी राजनीतिक भूल रही. वापस फिर से कांग्रेस आना है. आलाकमान को आवेदन दे रखा है. बाकी उनके विरूद्ध क्या सोच रहे, इससे वास्ता नहीं. जल्द ही उन्हें पार्टी फिर से सेवा का मौका देगी, इसका भरोसा है.




