Opinion

गांधी जयंती के दिन पदयात्रा करती हुई कैसी दिखेंगीं प्रज्ञा ठाकुर!

Faisal Anurag

प्रज्ञा ठाकुर गांधी विचार और स्मृति के लिए पदयात्रा करती किस तरह दिखेंगीं. प्रधानमंत्री ने सभी भाजपा सांसदों से 2 अक्टूबर से 31 अक्तूबर तक पद यात्रा करने को कहा है. प्रज्ञा ठाकुर उनमें एक हैं, जो गांधी के हत्या को न्यायसंगत ठहराती हैं और उनके हत्यारे गोडसे का गुणगान करती हैं. इस विरोधाभास का प्रदर्शन वह दृश्य उकेरेगा, उसमें सत्ता की मजबूरी के अनेक रूप दिखेंगे.

प्रधानमंत्री ने लोकसभा चुनाव के समय प्रज्ञा ठाकुर के गोडसे समर्थन वाले बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए, इसे माफ न किए जाने जैसा कृत्य बताया था. चुनाव की जीत के बाद उस तस्वीर को भी देश ने देखा, जब प्रधानमंत्री प्रज्ञा ठाकुर के अभिवादन का जबाव दे रहे थे. भाजपा ने न तो प्रज्ञा ठाकुर पर उनके बयान के लिए कोई कार्रवाई किया और न ही इस दिशा में पार्टी की कोई गंभीरता दिखी. भाजपा एक ऐसी धारा बन चुकी है, जिसमें कुछ लोग गांधी का नाम लेते हैं और कुछ गोडसे के साथ खड़े रहने की भी बात करते हैं.

भाजपा के अनेक नेताओं के बयान नफरत भरे होते हैं. लेकिन उन्हें भी भाजपा सम्मान देने से नहीं हिचकती. प्रधानमंत्री कभी-कभार इसपर टिप्पणी जरूर कर देते हैं. लेकिन इसमें यह इरादा नहीं दिखता कि वह वास्तव में ऐसे नेताओं से मुक्ति पाना चाहते हैं. समाज में जिस तरह की सामाजिक नफरत बढ़ी है, वह बेहद चिंताजनक है. लेकिन सत्ता में बैठे लोगों के लिए यह सामान्य सी बात है.

इसे भी पढ़ें – RRDA-NIGAM: कौन है अजीत, जिसके पास होती है हर टेबल से नक्शा पास कराने की चाबी

सवाल उठता है कि क्या भाजपा गांधी को उनके विचारों के लिए स्वीकार कर रही है, या उन्हें प्रतीक बनाकर राजनीति करती है. कांग्रेस के खिलाफ नरेंद्र मोदी के अभियानों में इस बात पर खासा जोर है  कि उसने केवल गांधी नेहरू परिवार को ही महत्व दिया है और इस परिवार के बाहर के नेताओं को वह महत्व नहीं दिया, जिसके वह हकदार हैं. इसमें उन कांग्रेस के नेताओं के विचार से ज्यादा महत्व कांग्रेस के नेतृत्व को स्वार्थी और पदलालेलुप साबित करना है. हालांकि इतिहास के तथ्य कुछ और ही हैं. कांग्रेस में विचारों की असमति के बाद भी इन नेताओं के आपसी संबंधों की जीवंतता को आज की राजनीति से नहीं समझा जा सकता है.

भाजपा ने गांधी और सरदार पटेल दोनों को ही अपने पाले में करने और उनका वारिस साबित करने का आक्रामक प्रचार रणनीति अमल में लाने का प्रयास किया है. हालांकि गांधी या पटेल दोनों के ही विचार भाजपा के साथ बहुत मेल नहीं खाते हैं.

भाजपा हिंदू राष्ट्रवाद परोकार है, जबकि ये दोनों ही नेताओं का राष्ट्रवाद सभी समुदायों के राज्य के लिए आजीवन संघर्ष करता रहा है. गांधी जी हत्या भी धार्मिक उन्माद और हिंदू राष्ट्रवाद के समर्थकों के समूह ने ही किया, जिसमें गोडसे था. पटेल की भारत में पहले आम चुनाव के पहले ही मृत्यु हो गयी. लेकिन इसके पहले उन्होंने कई बार लिखा और कहा कि वे नेहरू को ही आजादी के बाद भारत का नेतृत्व करने का योग्य दावेदार मानते हैं. अनेक मामलों में असहमति के बाद भी लोकतांत्रिक मर्यादाओं के उस दौर को खारिज करने की राजनीतिक साजिश चरम पर है.

इसे भी पढ़ें – पलामू : जिन सरकारी भवनों में बन रहा प्लान, वहीं फेल है जल शक्ति अभियान

सवाल उठता है कि क्या प्रज्ञा ठाकुर का चुनाव में जीत के बाद हृदय परिवर्तन हो गया ? भाजपा समर्थकों और सदस्यों में प्रज्ञा ठाकुर अकेली नहीं हैं, जो गोडसे की केवल प्रशंसक ही नहीं बल्कि गांधी की नीतियों की विरोधी हैं. उनके विरोध का ही नतीजा उन जैसे का समुदायों के बीच नफरत को तीखा करते रहना है. ऐसे में प्रज्ञा ठाकुर दो अक्टूबर को भले ही पदयात्रा कर लें, इससे गांधी जी के विचारों का वह सम्मान करती हैं, प्रमाणित नहीं किया जा सकता है.

भारत में इतिहास के तथ्यों को विकृत करने और उसमें उन नेताओं के खिलाफ माहौल बनाने की सुनियोजित साजिश आम है. वाह्ट्सअप से सक्रिय कुछ समूह तो इसका एक बड़ा साधन बन गया है.  जो इतिहास के तथ्यों का मजाक उडाते हुए ऐसे जनमानस का निर्माण करता है, जो इतिहासबोध  की वैज्ञानिकता से अलग-थलग हो.

इसे भी पढ़ें – नहीं होने जा रहा रेलवे का निजीकरण, सुविधा बढ़ाने के लिए निवेश आमंत्रितः पीयूष गोयल

Advertisement

Related Articles

Back to top button
%d bloggers like this: