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जमीन दलाल की फॉर्चूनर, पूर्व ट्रैफिक SP संजय रंजन, सिमडेगा SP और पूर्व DGP डीके पांडेय का क्या है कनेक्शन !

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– ट्रैफिक पुलिस ने छह माह पहले दूसरी गाड़ी का नंबर लगे फॉर्चूनर को जब्त किया था.
– अरगोड़ा थाना में गाड़ी जब्त कर दर्ज किया गया है केस.
– गाड़ी छुड़ाने के लिये पूर्व ट्रैफिक एसपी संजय रंजन सिंह, सिमडेगा के एसपी संजीव कुमार और डीजीपी डीके पांडेय ने की थी जबरदस्त पैरवी.

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Ranchi: रांची में जमीन दलाल और पुलिस के सीनियर अफसरों की सांठ-गांठ है. जमीन दलालों की पहुंच पूर्व डीजीपी डीके पांडेय तक थी. इसके कुछ प्रमाण न्यूज विंग के हाथ लगे हैं.

प्रशासन चाहे तो पुख्ता करने के लिए पुलिस अफसरों के मोबाइल का सीडीआर निकाल करके इसकी जांच कर सकता है. इस कांड में पूर्व डीजीपी डीके पांडेय के अलावा रांची के पूर्व ट्रैफिक एसपी संजय रंजन सिंह और सिमडेगा के एसपी संजीव कुमार के शामिल होने के प्रमाण हैं.

घटना 27 फरवरी की है. ट्रैफिक पुलिस को सूचना मिली कि रांची का रहने वाला कोई व्यक्ति फॉर्चूनर गाड़ी पर किसी दूसरी गाड़ी का नंबर का इस्तेमाल कर घूम रहा है. इस सूचना पर ट्रैफिक पुलिस ने कार्रवाई शुरू की.

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अरगोड़ा थाना क्षेत्र में ट्रैफिक पुलिस ने उस फॉर्चूनर गाड़ी को पकड़ लिया. शिकायत सच पायी गयी. जिस फॉर्चूनर को पुलिस ने पकड़ा था उसपर जेएच-01डीडी-0001 नंबर लगा था. उस गाड़ी पर कोई राज नाम का युवक बैठा हुआ था.

गाड़ी और राज को ट्रैफिक पुलिस ने अरगोड़ा थाने की पुलिस के हवाले कर दिया. मामले में ट्रैफिक पुलिस के इंस्पेक्टर अरुण सहित अन्य अरगोड़ा थाने पहुंचे. ट्रैफिक पुलिस ने मामले में अरगोड़ा पुलिस को लिखित शिकायत कर दी.

ट्रैफिक पुलिस ने मामले की जांच की, तो पता चला कि फॉर्च्यूनर पर लगी नंबर जेएच-01डीडी-0001 इसकी नहीं है. बल्कि यह नंबर जगुआर कंपनी की काले रंग की कार की है.

जबकि फॉर्च्यूनर गाड़ी कांके के पंकज कुमार के नाम से निबंधित है. इसको डीटीओ ऑफिस से जेएच-01डीडी-0011 नंबर दिया गया था.

इसके बाद शुरू हुआ पुलिस, पैरवी और पावर का खेल

मामला यहां कहां रुकने वाला था. ट्रैफिक पुलिस द्वारा जब्त गाड़ी को अरगोड़ा थाना पुलिस को सौंपते ही गाड़ी को छोड़ने के लिये सिमडेगा के एसपी संजीव कुमार और रांची के पूर्व ट्रैफिक एसपी संजय रंजन सिंह ने रांची पुलिस के कई अधिकारियों की फोन की घंटी बजानी शुरू कर दी.

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लगातार पैरवी के लिए फोन आने लगे. हद तो तब हो गयी, जब देर रात पूर्व डीजीपी डीके पांडेय भी गाड़ी को छोड़ने के लिये पैरवी करने लगे. लेकिन तब तक अरगोड़ा थाना की पुलिस ने मामले में प्राथमिकी दर्ज कर ली थी. इस कारण फॉर्च्यूनर गाड़ी को नहीं छोड़ा जा सका.

इतनी सारी पैरवी और किसी के लिए नहीं बल्कि उसी जमीन दलाल के लिए हो रही थी, जिसकी भूमिका कांके के चामा में डीजीपी की पत्नी को जमीन दिलाने में पुख्ता रूप से है.

अब चामा के जमीन दलाल को छोड़ने की पैरवी आखिर इतने सीनियर अफसर क्यों कर रहे थे, यह सहज ही समझा जा सकता है. अब गाड़ी पर दूसरी गाड़ी के नंबर का इस्तेमाल कोई भी व्यक्ति सही काम के लिये तो करेगा नहीं. ऐसा तभी कोई करता है, जब उसकी नीयत गलत काम करने की होती है.

आखिर क्या वजह थी डीके पांडेय की पूर्व ट्रैफिक एसपी पर मेहरबानी की

यहां यह भी जानना जरूरी है कि वर्ष 2017 में मुख्यमंत्री सचिवालय तक एक रिपोर्ट पहुंची थी. जिसमें कहा गया था कि रांची की ट्रैफिक पुलिस ऑटो चालकों से प्रति माह एक करोड़ रुपये से अधिक की वसूली करती है.

तब संजय रंजन सिंह ही रांची के ट्रैफिक एसपी थे. प्रभात खबर ने उस वक्त इस पर खबर प्रकाशित की थी. जिसके बाद पुलिस मुख्यालय के स्तर से खबर का खंडन किया गया था.

लेकिन मुख्यमंत्री सचिवालय से मिले निर्देश के आलोक में रांची के तत्कालीन एसएसपी कुलदीप द्विवेदी ने रांची ट्रैफिक पुलिस के सभी कर्मियों का ट्रांसफर कर दिया था.

लेकिन तब के ट्रैफिक एसपी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. उल्टे तब के डीजीपी डीके पांडेय के निर्देश पर पुलिस मुख्यालय के प्रवक्ता ने उस खबर को गलत ठहराने की कोशिश की थी.

इस घटना के वक्त भी यह सवाल उठा था कि आखिर क्यों रांची के ट्रैफिक पुलिस को लूट की छूट दी जा रही है. और एसपी की जिम्मेदारी क्यों नहीं तय हो रही.

उस वक्त भी यह बात चर्चा में आयी थी कि डीजीपी डीके पांडेय और ट्रैफिक एसपी संजय रंजन के बीच का रिश्ता सिर्फ प्रोफेशनल भर नहीं है.

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