
Chhaya
Ranchi: केंद्र कार्मिक मंत्रालय की ओर से जीजीआइ रैंकिंग जारी की गयी. जिसमें उद्योग में झारखंड को पहला स्थान दिया गया. लेकिन पिछले एक साल के राज्य के ओद्यौगिक विकास को देखें तो जानकारी होगी कि झारखंड में काफी अधिक संख्या में उद्योग बंद हुए.
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सिर्फ उद्योग बंद ही नहीं हुए. रघुवर दास की सरकार के योजनाओं को देखें तो उद्योगों के लिये बनायी गयी योजनाएं भी जमीनी स्तर पर कारगर नहीं रही. भले ही राज्य में सिंगल विंडो सिस्टम और स्टार्ट अप जैसी योजनाएं चलायी गयी. लेकिन ये योजनाएं राज्य में शिफर रही.
सिंगल विंडो के तहत देश भर से कई व्यवसायियों ने राज्य में उद्योग के लिये जमीन ली. जमीन इन व्यवसायियों को मिली भी, लेकिन इनमें इनका अधिकार नहीं हो पाया.
देवघर के देवीपुर को पिछली सरकार ने ओद्यौगिक क्षेत्र घोषित किया. सिंगल विंडो के तहत इस क्षेत्र में लगभग 82 प्लॉट 70 लोगों को आवंटित किया गया. पतरातु में भी छह लोगों को सिंगल विंडो के जरिये विवादित जमीन दी गयी.
दोनों ही जगह जमीन के पैसे देने के बाद भी इन व्यवसायियों के हाथ से जमीन अब तक दूर है. जबकि अधिकांश व्यवसायियों ने साल 2016 में ही जमीन के लिये पैसा दिया था. अब तो कुछ पैसे वापस करने की मांग भी कर रहे है.
सिंगल विंडो सिस्टम के तहत 14 विभाग ही कार्यरत
केंद्र की ही ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की तर्ज पर राज्य में भी ईज ऑफ डूइंग बिजनेस लागू किया गया. जिसके तहत सिंगल विंडो सिस्टम लागू किया गया. बीजेपी सरकार के वक्त राज्य में 31 विभाग थे. इसमें मात्र 14 विभाग ही सिंगल विंडो के तहत कार्यरत थे.
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इसमें वाणिज्य कर विभाग, श्रम और प्रशिक्षण विभाग, भूमि सुधार राजस्व विभाग, आइटी और ई गवर्नेंस, जल संसाधन विभाग, शहरी विकास और भवन निर्माण विभाग, खाद्य आपूर्ति और जन वितरण विभाग, सड़क निर्माण विभाग, ऊर्जा विभाग, स्वास्थ्य विभाग, उत्पाद विभाग और आपदा प्रबंधन विभाग शामिल रहें.
जबकि साल 2018 में स्कूली शिक्षा साक्षरता विभाग के तहत प्ले स्कूल खोलने और गृह विभाग के अंतर्गत पेट्रोल पंप खोलने के कई आवेदन आये. इसके बाद भी साल 2019 में इन विभागों को सिंगल विंडो से हटा दिया गया.
राज्य में सिंगल विंडो का काम ईएनवाई एजेंसी को दिया गया है. ऐसे में दोनों विभागों से संबधित जितने भी आवेदन एजेंसी को मिलें, वो धरे के धरे रह गये. वहीं विभागों से सही समन्वय नहीं होने के कारण भी सिंगल विंडो अपने कार्यों का निष्पादन नहीं कर पाता.
स्वास्थ्य विभाग की ओर से क्लिनिकल इस्टेबलिशमेंट एक्शन के तहत कई योजनाएं बनायी गयी, लेकिन इस पर काम नहीं किया गया. वहीं केंद्र कार्मिक मंत्रालय ने गुड गवर्नेंस में राज्य को 18वां स्थान दिया.
स्टार्ट अप के तहत मात्र चार को मिला गर्वमेंट ऑर्डर
साल 2016 में राज्य सरकार ने स्टार्ट अप पॉलिसी लागू की. लेकिन तीन साल बाद सिर्फ चार लोगों को ही गर्वमेंट ऑर्डर मिल पाया. इतना ही नहीं सिर्फ 95 उद्यमियों का ही चयन भी हो पाया. जिसमें से 22 को पिछले दिनों प्रोटोटाइप ग्रांट दिया गया.
जबकि पिछले दो साल में अटल इन्नोवेशन लैब के पोर्टल पर लगभग इसके 400 आवेदन आये. बिहार राज्य की बात करें तो सिर्फ साल 2018 तक पॉलिसी तहत 6489 आवेदन आये.
जिसमें से 931 उद्यमी चयनित किये गये. 53 को सरकार ने फंड भी दिया. ऐसे में बिहार, झारखंड से स्टार्ट अप योजना में काफी आगे है.
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बता दें साल 2018 में उद्योग विभाग की ओर से सबसे पहले 49 उद्यमियों का चयन किया गया. लेकिन ये भी योजना लागू होने के दो साल बाद. जबकि नियमतः तब तक इन उद्यमियों को स्टाइपेंड (जो कि आठ हजार से दस हजार तक होती है) मिलनी चाहिये.
पॉलिसी के प्रावधानों का पालन भी राज्य में नहीं किया गया. हर तीन माह में स्टेट इवाल्यूशन बोर्ड की बैठक होनी चाहिये. लेकिन उद्योग विभाग की ओर से साल 2018 से बोर्ड की बैठकें शुरू हुई. जिससे पॉलिसी में काफी असर पड़ा. राज्य में स्टार्ट अप पॉलिसी उद्योग विभाग अंर्तगत है. उद्योग विभाग के अंतर्गत अटल इन्नोवेशन लैब कार्यरत है.
उद्योग हुए बंद
कार्मिक विभाग ने उद्योग में भले ही राज्य को पहला स्थान दिया. लेकिन पिछले एक साल में राज्य के अलग-अलग हिस्सों में कई उद्योग बंद हुए. सिर्फ जमशेदपुर की बात करें तो 700 छोटे उद्योग बंद हुए. जिसमें अधिकांश ऑटोमोबाइल स्पेयर पार्ट के इंडस्ट्री रहे हैं.
जबकि क्षेत्र में लगभग तीन हजार से अधिक स्मॉल स्केल उद्योग हैं. जिसमें फूडिंग, प्लास्टिक और ऑटोमोबाइल की इंडस्ट्री शामिल हैं. रामगढ़ में लगभग 42 स्पंज आयरन के उद्योग बंद हुए. वहीं राजधानी से सटे तुपूदाना में 150 छोटे उद्योग है. जिसमें से लगभग 50 बंद हो गये.
100 बंदी के कागार पर हैं. राज्य सरकार से इन उद्योगों के कई स्तर पर सब्सिडी की मांग की. कई स्तर पर बात की गयी. लेकिन इन्हें पुनर्जीवित करने के लिये सरकार ने कोई पहल नहीं की. पिछले दिनों 20 से 25 कारखानों की बिजली काट दी गयी. क्योंकि कारखाना संचालक बिजली बिल नहीं दे पा रहे थे.
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