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झारखंड के 86 लाख आदिवासियों में 43 लाख गरीबी रेखा के नीचे

pravin kumar

Ranchi: हाल ही में जारी 2018 के ग्लोबल मल्टीडायमेंशन पावर्टी इंडेक्स रिपोर्ट के अकड़े के अनुसार राज्य के अनसूचित जाति और जनजाति एवं मुस्लिम समुदाय में गरीबी की तादाद 50 प्रतिशत, जबकि अगड़ी जाति में यह सख्या 15 प्रतिशत है. झारखंड में विकास की बयार बहाने का दावा सरकारें करते रही हैं. लेकिन सरकार के प्रयास से हुए सुधार के बाद भी राज्य की आदिवासी आबादी 50 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं. ग्रामीण क्षेत्र में या स्थिति और भी भयावह है. अनसूचित जाति और जनजाति एवं मुस्लिम समुदाय के बसाहट इलाके में पोषण, बाल-मृत्यु, स्कूली शिक्षा, स्कूल में उपस्थिति, साफ-सफाई, खाना पकाने के ईंधन, पेयजल, बिजली, आवास की स्थिती दैयनीय है.

आदिवासी आबादी देश में सबसे वंचित आबादी में सुमार है. देश की गरीबी घटने का रिपोर्ट समाने आया है. लेकिन भारत में गरीबों की तादाद विश्व स्तर के अनुपात में अब भी सबसे अधिक है. रिपोर्ट के अनुसार झारखंड में सबसे ज्यादा लोग बहुआयामी गरीबी के चंगुल से पिछल्ले 10 सालों में बाहर निकलने में कामयाब हुए हैं. वर्ष  2015/16 में बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश तथा मध्यप्रदेश में 19 करोड़ 60 लाख लोग बहुआयामी गरीबी के शिकार थे.

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10 सालों में देश में गरीबों की संख्या घटकर आधी हुई है

रिपोर्ट के अनुसार देश में बहुआयामी गरीबी के सबसे ज्यादा शिकार लोगों में ग्रामीण, अनसूचित जाति और जनजाति एवं मुस्लिम समुदाय के लोग है. अनुपात के अनुसार अगर अकलन करें तो अनुसूचित जनजाति के किसी भी समुदाय में बहुआयामी गरीबी के शिकार लोगों की तादाद लगभग 50 प्रतिशत है. जबकि अगड़ी जाति में ऐसे लोगों की संख्या लगभग 15 प्रतिशत है. रिपोर्ट के अनुसार पिछल्ले 10 सालों में देश में गरीबों की संख्या घटकर आधी हो गई है. देश में बहुआयामी गरीबी से ग्रस्त लोगों में 36 करोड़ 40 लाख लोगों में से एक तिहाई से ज्यादा (34.5 प्रतिशत) संख्या बच्चों की है.

यूएनडीपी तथा ऑक्सफोर्ड पावर्टी एंड ह्यूमन डेवलेपमेंट इनिशिएटिव के द्वारा जारी रिपोर्ट के में कहा गया है कि  भारत में साल 2005/6 से 2015/16 के बीच देश में गरीबी की दर 55 प्रतिशत से घटकर 28 प्रतिशत रह गई है. 10 सालों के भीतर लगभग 27 करोड़ 10 लाख लोग गरीबी की दशा से बाहर निकले हैं. वहीं बहुआयामी गरीबी (मल्टीडायमेंशनल पावर्टी) की दशा में पड़े लोगों की संख्या भारत में अब भी 36 करोड़ 40 लाख है.

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क्या है बहुआयामी गरीबी सूचकांक मापने का तरीका

गरीबी मापने के परंपरागत तरीके में मुख्य रुप से आमदनी को आधार माना जाता है. जो लोग प्रतिदिन 1.90 डॉलर से कम रकम कमाते हैं उन्हें गरीब मान लिया जाता है. इस परंपरागत तरीके से यह तो पता चलता है कि किसी देश या इलाके में प्रतिव्यक्ति आमदनी कितनी कम है. बहुआयामी गरीबी सूचकांक से  पता चलता है कि स्वास्थ्य, शिक्षा तथा जीवन-स्तर के लिए कितने लोग संर्घष कर रहे हैं, उन्हें  कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है. इस अकलन में 10  संकेतकों- पोषण, बाल-मृत्यु, स्कूली वर्ष, स्कूल में उपस्थिति, साफ-सफाई, खाना पकाने के ईंधन, पेयजल, बिजली, आवास और संपदा की उपलब्धता का आकलन किया जाता है. अगर कोई व्यक्ति इन 10  संकेतकों में से कम से कम तिहाई संकेतकों से वंचित पाया जाता है वैसे लोगों को उसे बहुआयामी गरीबी से ग्रस्त व्यक्ति माना जाता.

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