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#Economicslowdown : सड़कों से गायब होने लगे ट्रक, सात करोड़ परिवारों की रोजी-रोटी संकट में

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Asansol : देश की आर्थिक मंदी का असर अब देश के ट्रांसपोर्ट व्यवसाय पर भी दिखने लगा है. जो ट्रक पहले 30 दिन ट्रांसपोर्टिंग करता था, अब वह औसतन 18 से 20 दिन ही चल पा रहा है.

यह मंदी का ही असर है कि ट्रांसपोर्टर्स को माल लाने और ले जाने का आर्डर नहीं मिल रहा है. ऐसे में माल ढोने वाले ट्रक धीरे-धीरे सड़क से दूर होते जा रहे हैं. ऐसे मे आने वाले दिन ट्रकों के धंधे में लगे लोगों के लिए शुभ नहीं हैं.

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अभी तो महीने में दो-तीन सप्ताह का काम मिल रहा है, लेकिन जो आर्थिक हालात बन रहे हैं, उन्हें देखकर कहा जा सकता है कि बहुत जल्द ट्रक व्यवसाय से जुड़े पांच करोड परिवारों की रोजी-रोटी पर संकट आ सकता है. इनमें ट्रक मालिक, चालक, क्लीनर और ऑफिस कर्मचारी आदि शामिल है.

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पड़ताल में सामने आये चौंकाने वाले तथ्य

गुरुवार को न्यूज़विंग की टीम मंदी के असर की पड़ताल के लिए कोलकता को दिल्ली से जोड़ने वाली राष्ट्रीय राज्य मार्ग दो पर निकली. उस दौरान जो कुछ भी हमारे टीम के सामने तथ्य आये वो बेहद चौकाने वाले थे.

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ट्रांसपोर्ट व्यवसाय पर पड़ रही मार के कई कारण हमारे सामने आये. अगर मैकेनिक, टायर शॉप, रोड साइड पर पंक्चर लगाने वाले और सर्विस सेंटर को मिला लें तो प्रभावित परिवारों की संख्या सात करोड़ के पार पहुंच जायेगी.

ट्रक व्यवसाय पर पड़ रही मार के कई कारणों में पहला मार्केट में नयी मांग नहीं है. लंबी दूरी के ट्रक और ट्राली ऑर्डर के इंतजार में खड़े हैं. ये वे ट्राली हैं जिनमें भारी मशीनरी जैसे वाहन या मशीनें आदि की ट्रांसपोर्टिंग होती है.

लदान में मिली छूट ने बढ़ायी मंदी की मार

पार्किंग या ट्रक यूनियन वाली जगहों पर खड़े ट्रालों की लाइन अब लंबी होती जा रही है. सरकार की जीएसटी नीति के तहत 25 प्रतिशत अधिक लदान की छूट ने भी मंदी की मार को बढ़ा दिया है. जीएसटी के बाद छोटी वाहनों को तो बिल्कुल काम नहीं मिल पा रहा है.

दूसरी ओर पिछले साल जीएसटी की 28 प्रतिशत छूट के चलते लोगों ने हैवी ट्रक खरीद लिये थे. ओवर कैपेसिटी की समस्या पैदा हुई. बैंकों ने दिल खोल कर लोन दिया तो वहीं टाटा जैसी कंपनियों ने भारी छूट भी दे दी. इससे बाजार में ओवर कैपेस्टी की समस्या पैदा हो गयी.

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वाहनों की उतनी जरूरत नहीं थी. लेकिन छूट और लोन की सुविधा के चलते मार्केट में नये वाहनों की संख्या बढ़ गयी. बड़े ट्रांसपोर्ट संगठनों ने अब ट्रकों की खरीद पर पूरी तरह रोक लगा दी है.

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विस्तार के बजाय धंधा समेटने पर ध्यान

एक तरफ डीजल पर दो रुपये प्रति लीटर का सेस लग गया तो दूसरी ओर इंश्योरेंस में बढ़ोतरी कर दी गयी. इसके चलते ट्रक कारोबारी अपने धंधे का विस्तार करने की बजाय उसे समेटने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं.

12 लाख करोड़ का कारोबार अब गिर रहा है. मंदी की वजह से अब ट्रांसपोर्ट का धंधा कमजोर होता जा रहा है. देशभर के सभी एसोसियशनो से एक ही खबर आ रही है कि नये ट्रकों की खरीद बिल्कुल बंद हो गयी है. बाजार में लदान के आर्डर आधे रह गये हैं.

ट्रक खरीद तो लिया, अब कैसे चुकेगी किस्त

मंदी का दौर तो अभी शुरू हुआ है. जिन लोगों ने पिछले साल ट्रक खरीदा था, अब उनके सामने लोन की किस्त देने का संकट खड़ा हो गया है. सौ से ज्यादा शहरों में ट्रक व्यवसाय से जुड़े लोग बैंक अधिकारियों से लोन के भुगतान की समय सीमा आगे बढ़ाने का आग्रह कर रहे हैं. ऐसे कुल 80 लाख ट्रक हैं. इनमें करीब 12 लाख गाड़ियां ऐसी हैं जिनके पास नेशनल परमिट है. इन्हें बीस दिन का भी काम नहीं मिल पा रहा है.

कुल मिलाकर यह कारोबार 12 लाख करोड़ रुपये सालाना के आसपास पहुंच जाता है. अगर यह मंदी छह सात महीने तक चलती है तो 80 लाख में से अधिकांश ट्रक खिलौना बनकर रह जायेंगे. ऐसी हालत में कारोबार से जुड़े लोगों की रोजी-रोटी का क्या होगा, यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है.

साथ काम करने वालों का क्या होगा

मंदी की वजह से ट्रांसपोर्ट में लगी वाहनों को जब माल ढुलाई का ऑर्डर नहीं मिल रहा है तो इस धंधे से जुड़े दूसरे लोगों का काम भी प्रभावित होने लगा है. इससे करीब दो करोड़ परिवारों के जीवनयापन पर संकट आ सकता है.

इनमें टायर शॉप पर काम करने वाले, सड़क किनारे पंक्चर लगा रहे, ग्रीस डालने, मैकेनिकल जॉब, ढाबे वाले सर्विस और ट्रक पर बतौर क्लीनर चलने वाले लोग शामिल हैं.

मंदी के चलते अब एक जगह से दूसरी जगह पर जाने वाले ट्रक ट्रालों की आवाजाही बहुत कम हो गयी है. बड़े ट्राले तो कई दिनों से एक ही जगह पर खड़े हैं. ट्राली के ड्राइवर और क्लीनर भी खाली बैठे हैं. बहुत से ड्राइवर और क्लीनर अपने गांवों को लौट गये हैं. यही सड़क किनारे बैठे ट्रक के मैकेनिक या सर्विस करने वालों का हाल है. वे भी अपने ठिकाने पर ताला जड़कर गांव चले गये हैं.

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SP Deoghar

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