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अहमदाबाद ब्लास्ट मामले में निर्दोष साबित होने पर बोली मंजर की मां, होनहार बेटे का आधा जीवन हो गया खत्म

Ranchi: गुजरात के अहमदाबाद में साल 2008 में हुए बम धमाका मामले में झारखंड के रहने वाले मंजर इमाम और दानिश निर्दोष साबित हो चुके हैं. आतंकवाद के झूठे मामले में बाइज्जत बरी होने के पहले उन्हें नौ साल तक जेलों में बिताना पड़ा. कोर्ट ने इस मामले में 49 लोगों को दोषी करार दिया है जबकि 28 लोगों को बरी कर दिया है.
बीते मंगलवार को गुजरात की एक अदालत ने रांची के बरियातू निवासी मंजर इमाम और दानिश उर्फ सैय्यद आफाक इकबाल को कोर्ट ने सीरियल बम ब्लास्ट मामले में बरी कर दिया है. कोर्ट के इस फैसले के बाद बरियातू में खुशी की लहर है. मंजर और दानिश का पूरा परिवार कोर्ट के इस फैसले से बेहद खुश है, हालांकि मन में एक मलाल यह भी है कि कोर्ट का फैसला काफी देर से आया.

21 जून 2011 को दानिश को गुजरात के वडोदरा स्टेशन से गिरफ्तार किया गया था. वहीं हैदराबाद सीरियल बलास्ट के मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी ने 3 मार्च 2013 को मंजर इमाम को रांची के कांके इलाके से गिरफ्तार किया था. हालांकि, धमाके के 11 साल बाद दोनों यानी मंज़र और दानिश को साक्ष्य के अभाव में कोर्ट ने रिहा कर दिया.
कोर्ट के फैसले पर मंजर इमाम की मां जाहिदा खातून कहती हैं कि आधा जीवन तो खत्म हो गया, मंजर के छोटे भाईयों के बाल बच्चे हो गये. न्याय मिला लेकिन काफी देरी से. आठों बाल बच्चे में मंजर पढ़ने खेलने का शौकिन था. सबसे निराला बेटा मंजर. उनको अपने बेटे की गिरफ्तारी के साथ ही यह दृढ़ विश्वास था कि उनका बेटा बेकसूर साबित होगा. उन्होंने कहा कि उनके जेल जाने के बाद मंजर के पिताजी को ऐसा सदमा लगा कि हम सबको छोड़ चल बसे. मैं बीमार हो गई और बेटे की रिहाई की आस में किसी तरह जीवित रही. अब वो चलने फिरने से भी लाचार हैं.

बदनुमा दाग का है मलाल

मंजर इमाम के परिजनों ने बताया आतंकी कनेक्शन और बम ब्लास्ट में फंसाने की वजह तो पता नहीं है. लेकिन गिरफ्तारी के बाद परिवार के लिए जिल्लत भरी जिंदगी रही. सुरक्षा एजेंसियों की चूक की वजह से निर्दोष होते हुए भी लंबे समय तक जिंदगी का अनमोल समय जेल में काटना पड़ा. जब तब पुलिस घर में आ जाती थी. जैसे बदनुमा दाग लग गया हो. परिवार वालों को आतंकी का परिवार सहित कई जुमलों का इस्तेमाल किया जाता रहा. गिरफ्तारी के बाद से लेकर अबतक मलाल रहा. 36 साल का मंजर करीब 9 साल जेल में रहे. हबीब पर लगे आरोपों की बात सनुकर उनके पिता मो अली इमाम की भी मौत हो गई. मंजर के भाई ने बताया कि घटना को लेकर पिता कहा करते थे मेरा बेटा निर्दोष है. अगर दोषी होगा तो पुलिस गोली मार दे. हमे कोई ऐतराज नहीं.

27 की उम्र में गोल्ड मेडलिस्ट भाई की हुई थी गिरफ्तारी

मंजर के भाई सबदर इमाम ने बताया कि जब उसकी गिरफ्तारी हुई तब मंजर की उम्र 27 वर्ष थी. पांच भाई में मंजर चौथे स्थान पर हैं. मंजर रांची यूनिवर्सिटी से गोल्ड मेडलिस्ट हैं. उसे वर्ष 2007 में स्नातकोत्तर उर्दू विषय में गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया था. झारखंड के तत्कालीन राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी और केंद्रीय शिक्षा मंत्री अर्जुन सिंह ने सम्मानित किया था. परिजनों का कहना है कि मंजर इमाम शिक्षा के क्षेत्र में भी मेधावी छात्र था. लेकिन ऐन वक्त पर वह झूठे आरोपों में फंसता चला गया. अब 36 का हो चुका है. मामले में भी वह निर्दोष साबित होगा, इस बात का विश्वास था. लेकिन तबतक उसकी जिंदगी का स्वर्णिम समय निकल गया.

 

पहली बार रांची का नाम आतंकी कनेक्शन से जुड़ा था

मंजर इमाम को गुजरात में अहमदाबाद ब्लास्ट, दिल्ली ब्लास्ट और हैदराबाद ब्लास्ट में नामजद अभियुक्त बनाया गया था. एर्नाकुलम में दो मामले (कांड संख्या 4/12 एवं कांड संख्या 435/12) में मंजर को गिरफ्तार किया गया था. गिरफ्तार दानिश पर रांची के इमामुद्दीन नामक व्यक्ति के सहयोग से रांची के 24 युवाओं को इंडियन मुजाहिदीन से जोड़ने का आरोप था. साथ ही आतंकी संगठन सिमी से भी जुड़ा होने का आरोप था. अहमदाबाद ब्लास्ट केस में मंजर इमाम और दानिश की गिरफ्तारी के साथ ही रांची का नाम आतंकी कनेक्शन से जुड़ा था. मामले में सबसे पहले बरियातू निवासी दानिश उर्फ अफाक इकबाल को जून 2011 बड़ोदरा से पकड़ा गया था. वह हैदराबाद में एक आइटी कंपनी में कार्यरत था. इसके बाद आतंकी कनेक्शन के आरोपों में कई मामलों में वांछित मंजर इमाम को चार मार्च को एनआईए ने रांची के कांके से गिरफ्तार किया था.

परिजनों ने बताया कि मंजर को गुमला से पकड़ा गया था. लेकिन रांची से उसकी गिरफ्तारी दिखाई गई थी. परिजनों ने बताया कि वर्ष 2011 में पहली बार जब एऩआईए की टीम आयी थी तो मंजर से बात करवायी गयी. उस वक्त तो टीम ने माना मंजर बेकसूर है. लेकिन एक महीने बाद एनआईए की टीम वापस लौटी और मंजर को फरार बताकर खोजने लगी.

दानिश पर केरल और अहमदाबाद के कोर्ट में मामले लंबित थे. दोनों मामलों में फैसला आ चुका है, वर्ष 2017 में ही केरल के मामले में दानिश बरी हो चुका था. जबकि मंगलवार को अहमदाबाद ब्लास्ट के मामले में कोर्ट का फैसला आया है. इसके साथ ही वह बरी होकर रिहा भी हो गया. दानिश के परिवार वाले उसे लाने के लिए अहमदाबाद जाने की तैयारी कर रहे हैं.

साल 2008 में अहमदाबाद में हुए सीरियल बम धमाकों में 59 लोग मारे गए थे. मास्टरमाइंड आजमगढ़ जिले के रहने वाले अबुल बशर को बताया गया था. अबुल बशर का अहमदाबाद ही नहीं लखनऊ, जयपुर और दिल्ली में हुए बम धमाकों भी नाम सामने आया था.

इसके गैंग को इंडियन मुजाहिद्दीन आज़मगढ़ मॉड्यूल के नाम से चिन्हित किया गया था. मूलरूप से सरायीर थाना क्षेत्र के बीनापार निवासी अबुल बशर को गुजरात पुलिस ने गिरफ्तार किया था और दावा किया था कि अबुल बशर इंडियन मुजाहिद्दीन आतंकी संगठन से जुड़ा हुआ है.

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