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कहीं मसानजोर न बन जाये मंडल डैम!

मंडल डैम लील लेगा झारखंड के वीर शहीद नीलांबर-पीतांबर के गांव चेमोसरिया को

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Ranchi : झारखंड के दो बड़े बांध विवादों के साथ दूरगामी परिणाम भी छोड़ चुके हैं. दोनों बांधों पर राज्य के अंदर और राज्य के बाहर जमकर राजनीति हुई. राजनीतिक उथल-पुथल के गवाह भी दोनों बांध बने. नतीजतन राजनीति की भेंट बांध के आस-पास रहनेवाली आबादी को ही चढ़नी पड़ी. दीगर बात यह है कि कहने को तो दोनों बांध झारखंड की टेरेटरी में हैं, लेकिन दोनों बांधों से फायदा झारखंड से कहीं अधिक दूसरे राज्यों को होगा. यही है झारखंड में मसानजोर से मंडल डैम तक का सफर. यह सफर (राजनीतिक विवाद) अब तक थमा नहीं है. हालांकि, शानिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पलामू में मंडल डैम निर्माण की नींव रख दी है.

मसानजोर से शुरू हुआ सफर

मसानजोर का सफर आजादी के महज तीन साल बाद 1950 से शुरू हुआ. इस डैम को कनाडा सरकार के सहयोग से बनाने की योजना बनी. 1955 में बांध बनकर तैयार हो गया. देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने इसका उद्घाटन किया था. लेकिन, झारखंड की 12000 एकड़ कृषि भूमि जलमग्न हो गयी. दुमका के 144 मौजा भी इसमें समा गये. और इस डैम का फायदा झारखंड को नहीं, पश्चिम बंगाल को हो रहा है. झारखंड के दुमका जिले की 17000 एकड़ भूमि को यह बांध लील चुका है. बांध और यहां की पनबिजली परियोजना दोनों ही पश्चिम बंगाल सरकार के हवाले है. इस पर मालिकाना हक सिंचाई एवं नहर विभाग, पश्चिम बंगाल सरकार का है. विस्थापितों ने मुआवजे के लिए अपनी आवाज बुलंद की, तो भारत सरकार की मध्यस्थता से तत्कालीन बिहार सरकार और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच करार हुआ. आज भी संताल में धरती की कोख सूखी हुई है.

मंडल डैम का सफर जारी है

1970 से मंडल डैम का सफर शुरू हुआ, जो अब भी जारी है. 1970 में इस परियोजना की अनुमानित राशि 30 करोड़ रुपये थी. इसमें से 44000 एकड़ कमान क्षेत्र में सिंचाई, पेयजल, औद्योगिक संस्थानों के लिए जल आपूर्ति एवं 25 मेगावाट जल विद्युत का उत्पादन करने की योजना थी. निर्माण कार्य 1972-73 में ही शुरू किया गया था. वर्ष 1985 में पुनरीक्षित कर प्राक्कलित राशि को 439 करोड़ रुपये कर दिया गया. अब इस पर  सरकारी और स्थानीय लोगों के दावे भी अलग-अलग हैं. सरकार का कहना है कि डैम के निर्माण से 15 गांव ही प्रभावित होंगे, जबकि 1972 के सरकारी सर्वे में 17 गांवों को डूब क्षेत्र में बताया गया था. इसमें झारखंड के स्वतंत्रता सेनानी नीलांबर-पीतांबर का गांव चेमोसरिया भी डूब क्षेत्र में आ गया है.

मंडल डैम में भी 38508.21 एकड़ भूमि होगी जलमग्न

मंडल डैम में भी 38,508.21 एकड़ भूमि जलमग्न होगी, जिसमें 3,044.38 एकड़ रैयती जमीन 12,756.51 एकड़ गैर मजरुआ जमीन तथा 2,266.72 एकड़ वनभूमि शामिल है. मंडल डैम परियोजना से झारखंड की 19,604 हेक्टेयर भूमि और बिहार की 92,000 हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होगा. परियोजना में कुल 1,11,521 हेक्टेयर भूमि पर खेती का आकलन किया गया है, जिसे 2020 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है. कुल मिलाकर सबसे अधिक फायदा बिहार को ही होगा.

कहीं मसानजोर न बन जाये मंडल डैम!

अब मंडल डैम के विस्थापितों को सुनें

मंडल डैम के विस्थापित व कुटकू गांव सुलेमान लकड़ा कहते हैं, “1980-81 में जमीन का अधिग्रहण किया गया, लेकिन अधिग्रहण की शर्तों के अनुसार पुनर्वास का काम सरकार ने नहीं किया. मंडल डैम का निर्माण कार्य रुक गया और गांव के लोग अपने गांव में लौट आये. अब खेती ही हमलोगों की आजीविका का एकमात्र साधन है.”

डैम बनने से छिन जायेगी 15000 आदिवासी परिवारों की आजीविका : फिलिप कुजूर

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फिलिप कुजूर.

बरगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता फिलिप कुजूर कहते हैं, “मंडल डैम के विस्थापितों का सरकार अब तक पुनर्वास नहीं कर सकी. इलाके में लगभग 15000 आदिवासी परिवार की आजीविका खेती से जुड़ी है. जबरन हटाने से ऐसे परिवार के समक्ष भुखमरी की नौबत आ जायेगी. बांध का गेट लग जाने पर 30 गांव प्रभावित होंगे. ऐसे में आदिवासियों की आजीविका की अनदेखी करके विकास की नींव रखना कहां का न्याय है. डैम बनने के बाद झारखंड को लाभ नहीं मिलेगा, बल्कि बिहार को ही लाभ मिलेगा. सरकार ने 80 के दशक में मंडल डैम से विस्थापितों को मरआ और टिहरी में बसाने का काम शुरू किया, लेकिन डैम का कार्य बंद होने के बाद पुनर्वास भी नहीं किया जा सका. लोगों को मिलनेवाले मुआवजे का अधिकांश हिस्सा दलाल और बिचौलियों ने हड़प लिया. मजबूरन डूब क्षेत्र के लोग अपने-अपने गांव में ही रह रहे हैं. मंडल डैम बनने से आदिवासी परिवार के समक्ष आजीविका का संकट उत्पन्न हो जायेगा, इस ओर सरकार ध्यान नहीं दे रही है.”

मंडल डैम डूब क्षेत्र की कुछ तस्वीरें

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खुरा और कोयल नदी का संगम, जो डैम में पानी भरने के बाद नहीं दिखेगा.
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कुटकू गांव
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गढ़वा के गांव का एक विद्यालय, जो डूब जायेगा.

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