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गोड्डा में अडानी पावर प्लांट के लिए किसानों से जबरन ली जा रही जमीन : कुमार चंद्र मार्डी

प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठी बात- राज्य सरकार की शह पर अडानी के लोग कर रहे किसानों का दमन, पावर प्लांट के लिए कंपनी ने किया सर्वे, संताल आदिवासियों को बताया हिन्दू

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Ranchi : गोड्डा सरकार की शह पर अडानी के लोग किसानों पर अत्याचार कर रहे हैं और यह बदस्तूर जारी भी है. यह बात रांची में आयोजित झारखंड जनाधिकार महासभा द्वारा आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कुमार चंद्र मार्डी ने कही. उन्होंने कहा कि अडानी पावर प्लांट के लिए कानून को ताक पर रखकर जमीन अधिग्रहण किया जा रहा है. वहीं, कंपनी द्वारा शून्य विस्थापन की रिपोर्ट तैयार कर सर्वे रिपोर्ट तैयार की गयी है. उस रिपोर्ट में संताल आदिवासियों का धर्म बदलकर उन्हें हिन्दू बताया जा रहा है, जो गलत है. वहीं, भोजन का अधिकार से जुड़े विवेक कुमार ने कहा कि संतालपरगना टेनेंसी (एसपीटी) एक्ट का उल्लंघन कर किसानों की जमीन लूटी जा रही है. पुलिस द्वारा महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार कर उन्हें लाठियों से पीटा जाता है.

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40 परिवारों से जबरन 100 एकड़ जमीन ले ली

संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए चिंतामनी शाह ने कहा कि कंपनी की सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन (सोशल इम्पैक्ट एसेसमेंट) रिपोर्ट में कई तथ्यात्मक व वैधानिक त्रुटियां हैं, जैसे प्रभावित गांवों में कोई तकनीकी रूप से कुशल और शिक्षित व्यक्ति न होना, शून्य विस्थापन, प्रभावित गांवों के सभी ग्रामीणों का धर्म हिन्दू बताना आदि. बटाईदार खेतिहर पर होनेवाले प्रभाव का कोई जिक्र नहीं है. न ही इसमें वैकल्पिक जमीन की बात की गयी है. परियोजना से सृजित होनेवाली नौकरियों की संख्या रिपोर्ट में स्पष्ट नहीं है. साथ ही, भूमि अधिग्रहण के लिए सहमति का वीडियो और जमीन मालिकों द्वारा हस्ताक्षरित सहमति पत्र उपलब्ध नहीं हैं. यह गौर करने की बात है कि अधिनियम के अनुसार प्रभावित परिवारों का हिस्सा जमीन मालिक, मजदूर व बटाईदार खेतिहर होते हैं. सरकार ने चार गांवों में लगभग 500 एकड़ भूमि अधिग्रहित की है. इसमें से कम से कम 100 एकड़ जमीन का संबंधित 40 प्रभावित परिवारों की सहमति के बिना जबरन अधिग्रहण किया गया है. कंपनी ने स्थानीय पुलिस के सहयोग से माली गांव के मैनेजर हेम्ब्रम सहित अन्य पांच आदिवासी परिवारों की 15 एकड़ जमीन में लगी फसलों, कई पेड़-पौधों,  श्मशान घाटों और तालाब को बर्बाद कर दिया. मोतिया गांव के रामजीवन पासवान की भूमि को जबरन अधिग्रहण करने के दौरान अडानी कंपनी के अधिकारीयों ने उन्हें धमकी दी कि जमीन नहीं दी, तो जमीन में गाड़ देंगे. पुलिस ने अडानी के अधिकारियों के खिलाफ उनकी शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया. जब माली के लोगों ने उनकी सहमति के बिना जबर्दस्ती भूमि अधिग्रहण के खिलाफ गोड्डा के उपायुक्त से शिकायत की,  तो उन्होंने कार्रवाई करने से इनकार कर दिया और कहा कि उनकी भूमि अधिग्रहित कर ली गयी है. अगर सभी दस गांवों में जमीन अधिग्रहित की जाती है, तो 1000 से अधिक परिवार विस्थापित हो जायेंगे. इससे उनके आजीविका और रोजगार पर गहरा प्रभाव पड़ेगा. साथ ही, आदिवासी परिवारों के लिए जमीन उनकी संस्कृति, परंपरा और अस्तित्व से जुड़ी है, जिसे वे गंवाना नहीं चाहते हैं. उन्होंने कहा कि यह गौर करने की बात है कि संतालपरगना टेनेंसी अधिनियम की धारा 20 के अनुसार किसी भी सरकारी या निजी परियोजना (कुछ विशेष परियोजनाओं के अलावा) के लिए कृषि भूमि हस्तांतरित या अधिग्रहित नहीं की जा सकती है. प्रेस कॉन्फ्रेंस को भारत भूषण, एलीना, मेरी निशा हांसदा ने भी संबोधित किया.

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कंपनी और सरकार के दावे जमीनी हकीकत के एकदम विपरीत

झारखंड जनाधिकार महासभा द्वारा की गयी फैक्ट फाइंडिंग में जो तथ्य उभरकर सामने आये, उसके मुताबिक जांच में पता चला कि पिछले दो सालों में परियोजना की कई उपलब्धियां हैं, जैसे- जबरन भूमि अधिग्रहण,  भूमि अधिग्रहण कानून 2013 की प्रक्रियाओं का व्यापक उल्लंघन, किसानों की फसलों को बर्बाद करना,  संभावित लाभों के बारे में लोगों से झूठ बोलना,  प्रभावित परिवारों पर पुलिस बर्बरता, मुकदमे करना तथा अन्य हथकंडों से डराना. कंपनी की सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट के अनुसार, थर्मल पावर प्लांट के लिए गोड्डा जिले के दो प्रखंडों के 10 गांवों में फैली हुई 1364 एकड़ भूमि को अधिग्रहित किया जाना है. इस प्लांट से 1600 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा. झारखंड सरकार और कंपनी का दावा है कि यह एक लोक परियोजना है, इससे रोजगार का सृजन और आर्थिक विकास होगा तथा इस परियोजना में विस्थापन की संख्या ‘शून्य’ है. लेकिन, जमीनी वास्तविकता इन दावों के विपरीत है. भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के अनुसार, निजी परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण करने के लिए कम से कम 80 प्रतिशत प्रभावित परिवारों की सहमति एवं ग्राम सभा की अनुमति की आवश्यकता है. लेकिन, क्षेत्र के अधिकांश आदिवासी और कई गैर-आदिवासी परिवार शुरुआत से ही परियोजना का विरोध कर रहे हैं. 2016 और 2017 में सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन (SIA) और पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (EIA) के लिए जनसुनवाई आयोजित की गयी थी. कई जमीन मालिक, जो इस परियोजना के विरोध में थे, उन्हें अडानी के अधिकारियों और स्थानीय प्रशासन ने जनसुनवाई में भाग लेने नहीं दिया. प्रभावित ग्रामीण दावा करते हैं कि गैर प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को सुनवाई में बैठाया गया था. ऐसी ही एक बैठक के बाद जिसमें प्रभावित परिवारों को अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया था, ग्रामीणों और पुलिस के बीच झड़प हुई. प्लांट से उत्पादित बिजली की बांग्लादेश में आपूर्ति की जायेगी. हालांकि, अडानी कंपनी को कुल उत्पादन का कम से कम 25 प्रतिशत बिजली झारखंड को उपलब्ध कराना है, लेकिन इसके सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट में इस 25 प्रतिशत के स्रोत का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है. इस परियोजना के भूमि अधिग्रहण से संबंधित अधिकांश दस्तावेज जिला प्रशासन की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं हैं, जैसा कि अधिनियम अंतर्गत अनिवार्य है.

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झारखंड जनाधिकार महासाभा ने सरकार से की ये मांगें

  • अवैध तरीके से लगायी जा रही परियोजना को तुरंत रोका जाये, प्लांट के लिए भूमि अधिग्रहण को तुरंत बंद किया जाये और अवैध तरीके से अधिग्रहित की जा रही जमीन को वापस किया जाये.
  • चूंकि इस परियोजना में कई कानूनों का उल्लंघन हुआ है, इसलिए इस परियोजना की न्यायिक जांच करवायी जाये तथा लोगों के शोषण के लिए अडानी कंपनी और जिम्मेदार पदाधिकारियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जाये.
  • सभी प्रभावित परिवारों को अभी तक हुए फसलों और आजीविका के नुकसान के लिए मुआवजा दिया जाये.

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