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जानें क्यों गोल्डमैन सैक्स ने कहा- भारत की घटेगी विकास दर, इसका आम जनता पर क्या होगा असर

Ranchi: ग्लोबल रिसर्च और ब्रोकिंग हाउस गोल्डमैन सैक्स और नोमुरा ने वित्त वर्ष 2020-21 में भारत के आर्थिक विकास अनुमानों में तेजी से कटौती की है. दुनिया की जानी-मानी ब्रोकरेज फर्म गोल्डमैन सैक्स ने वित्तीय वर्ष 2021 के लिए भारत के आर्थिक विकास दर को पांच प्रतिशत कम कर दिया है.

गोल्डमैन सैक्स ने एक रिपोर्ट जारी की है. जिसके मुताबिक आर्थिक सुधार में मदद के लिए जो घोषणाएं की गयी हैं, उसका विकास पर कोई तत्काल प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है. क्या मतलब है इस नये अनुमान का. जानने के लिए न्यूज विंग ने कई अर्थशास्त्रियों से बात की. ब्रोकिंग हाउस गोल्डमैन सैक्स की बात अगर सच होती है, तो आखिर आम जनता पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा जानिए इस रिपोर्ट में.

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आखिर क्यों इतने बड़े राहत पैकेज के बाद भी विकास दर की रेटिंग घटी?

गोल्डमैन सैक्स एक अंतर्राष्ट्रीय निवेश फर्म है. पूरी दुनिया में निवेश का और विकास दर का आकलन करती है. आश्चर्य की बात है कि सरकार के 20 लाख करोड़ के पैकेज के बाद भी, जिसमें सरकार ने ये दावा किया है कि यह जीडीपी का 10 फ़ीसदी है, फिर भी दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित एजेंसी ने कहा कि भारत की आर्थिक विकास दर शून्य से 5 फ़ीसदी नीचे चली जाएगी यानी कि विकास दर माइनस पांच 5 फीसदी हो जाएगी.

पिछले कई सालों में ऐसा नहीं देखा गया है, कि भारत की अर्थव्यवस्था या तो शून्य पर पहुंची हो या फिर शून्य से नीचे. 1991 में एक बार देखा गया था कि विकास दर 1.50 फ़ीसदी के आसपास थी. जो कि काफी आश्चर्यजनक था.

दरअसल इसके पीछे कारण यह है कि जो पैकेज भारत सरकार की तरफ से जारी किये गये हैं, उसका फायदा सीधा भारत की अर्थव्यवस्था में तत्काल होते नहीं दिख रहा है. भारत सरकार की तरफ से दिये गये राहत पैकेज में से विकास के कार्यों को सिर्फ एक परसेंट हिस्सा मिलने जा रहा है. केंद्र सरकार का दावा है कि यह राहत पैकेज जीडीपी का 10 फीसदी है.

लेकिन इस 10 फीसदी में 8-9 फीसदी बैंकों में लोगों को कर्ज देने के लिए दिए गए हैं. और आने वाले साल में सिर्फ एक फीसदी के आधार पर अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा बदलाव देखा जा सकेगा कहना गलत साबित होगा. भारत सरकार को कुछ और बड़ा करने की जरूरत थी, जो कि देश में नहीं हो पाया. यही वजह है कि आज दुनिया की अंतरराष्ट्रीय एजेंसी भारत की विकास दर को घटता हुआ बता रही है.

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इस घोषणा के बाद बैंकों पर क्या असर पड़ेगा

केंद्र सरकार की तरफ से दी गई राहत की राशि का लगभग पूरा हिस्सा बैंकों पर निर्भर है. यह पहले से ही तय माना जा रहा था कि सरकार के पास चूंकि राजस्व की कमी है, तो वह कहीं ना कहीं बैंकों के माध्यम से ही पब्लिक तक पहुंचने की कोशिश करेगी. लेकिन यहां स्थिति दूसरी है. ना तो बैंक बहुत बड़ी राशि कर्ज देने की स्थिति में है. और ना ही लोग कर्ज लेने और उसे वापस करने की स्थिति में हैं.

फरवरी में यह रिपोर्ट सामने आयी थी कि बैंक के पैसे हर सेक्टर में फंसे हैं. चाहे वो एविएशन हो या रियल स्टेट से हो. या फिर कोई और क्षेत्र. बैंक इस संकट से निबटने की कोशिश कर रही थी कि कैसे वह अपने कर्ज की वसूली जल्द से जल्द करे. अब केंद्र सरकार की इस घोषणा के बाद बैंकों से कहा गया है कि वह लोगों के बीच नया कर्ज बांटे. साथ ही पुराने कर्ज की वसूली ना करे.

इसमें समझने वाली बात यह है कि अभी से कुछ दिनों पहले तक बैंक कर्ज देने की स्थिति में नहीं थी और ना ही कंपनियां कर्ज लेने की स्थिति में. अब इस राहत पैकेज की घोषणा के बाद कैसे बैंक कर्ज देगी और लोग लोन लेंगे. राहत पैकेज की घोषणा के बाद अगर सरकार बैंकों पर जबरन कर्ज देने का दबाव डालती है, तो जाहिर तौर पर बड़े आर्थिक घोटाले होने की खबर आनी शुरू हो जाएगी.

क्या होती है विकास दर

देश में पूरी अर्थव्यवस्था जितनी उत्पादन करती है उसी से विकास दर का पैमाना तैयार होता है. भारत में पिछले साल का पूरी अर्थव्यवस्था का उत्पादन करीब 1.85 लाख करोड़ का था. अब अगर दूसरे साल भी उत्पादन इतना ही रहा तो विकास दर को शून्य माना जाएगा.

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वहीं अगर उत्पादन इससे भी कम हुआ तो विकास दर निगेटिव में चली जाएगी. जिसके आधार पर अंतर्राष्ट्रीय कंपनी गोल्डमैन सैक्स यह आकलन कर रही है कि भारत की विकास दर गिरेगी. क्योंकि पिछले करीब 60 दिनों से देश में किसी भी तरह का उत्पादन बंद है. और उत्पादन शुरू होने के बाद भी ऐसा नहीं है कि उत्पादन की रफ्तार ऐसी होगी कि वो छह महीने का उत्पादन तीन महीने में कर ले. अभी सबसे बड़ी समस्या तो मजदूरों की आनी बाकी है. देश में मांग में भारी गिरावट आयी है, यह उत्पादन पर गहरा असर डालेगी.

आम जिंदगी पर इसका क्या असर पड़ेगा

देश की जनता के लिए सबसे बुरी बात यह होती है कि वहां की विकास दर नकारात्मक हो जाए. उत्पादन बढ़ने से खपत बढ़ेगी. खपत बढ़ने से मांग बढ़ेगी. बाजार में पैसा रहेगा तभी कंपनियां अपने कर्मियों को सैलेरी दे सकेगी. ऐसे भी विकास दर के घटते आंकड़ों ने पिछले सालों में बताया है कि कैसे बाजार में नौकरी कम हुई. कंपनियां बंद होनी शुरू हो गयी. बेरोजगारी बढ़ी. उत्पादन ठप होने का मतलब ही है बेरोजगारी. और जब बेरोजगारी बढ़ने लगेगी तो सीधी सी बात है जनता का इसपर सीधा असर पड़ेगा.

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