Opinion

आधुनिक दौर का इंकलाबी शायर- कैफी आजमी

MZ KHAN 
आवारा सजदे का वो शायर जिसने ज़ेहन व दिमाग़ को मुतासिर किया, जिसने सोचने-समझने पर मजबूर किया, जिसने बन्दिशों में भी रौशनख्याली के चिराग़ जलाये. दूसरे बनवास की वो नज़्में, जिसने शायर की पीड़ा को अंधेरे में रौशनी की एक हल्की सी झलक दिखायी  और जो 6 दिसम्बर को दूसरा बनवास कहने पर मजबूर हुआ और जिसके तसव्वुर में समाजवाद अंगड़ाइयां लेता हो…वो और कोई नहीं कैफ़ी आज़मी हैं. जिनका जन्मशती वर्ष  साहित्यिक संगठनों के लिए आज के परिदृश्य में काफ़ी महत्वपूर्ण एवं प्रसांगिक है. आज के अंधेरे दौर में जब अभिव्यक्ति पर हमले तेज़ हो गये हों, स्वायत संवैधानिक संस्थानों को ध्वस्त किया जा रहा हो, लोकतंत्र की जड़ें कमज़ोर की जा रही हों, तो इन्हें महज़ याद कर लेने से या इनके कलाम का पाठ कर लेने से काम चलने को नहीं, बल्कि इनके क्रांतिकारी विचारों को, इनकी समाजवादी सोच आम लोगों, विशेष कर उस मेहनतकश अवाम तक ले जाने की ज़रूरत है, जो आज भी असमानता का शिकार हैं. जो आज भी इस भ्रष्ट एवं अत्याचारी व्यवस्था से मुक्ति की आस लिए जी रही है.
कैफ़ी इस ज़ालिम  निज़ाम के मुखालिफ थे
अपनी पूरी ज़िंदगी इस निज़ाम से रिहाई के लिए वक़्फ़ कर दी. वह बराबर कहा करते “मैं गुलाम हिंदुस्तान में पैदा हुआ, आज़ाद भारत मे जिया और समाजवादी मुल्क में मरूंगा.” लेकिन न उनका सपना साकार  हो पाया और न उनकी ख्वाहिशों ने उड़ान भरी.
उनका ये शेर हालात की तर्जुमानी कर रहा है-
बहार आये तो मेरा सलाम कह देना/मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने.
ज़ुल्म की इंतहा बग़ावत की अलामत बन जाती है. कैफ़ी आज़मी का ये  कलाम ज़ुल्म, अन्याय, शोषण के खिलाफ बगावत को स्वर दे रहा है-

हंगामे जाग उठते हैं अक्सर घुटन के बाद

इंसां की ख्वाहिशों की कोई हद नहीं

दो गज़ ज़मीन चाहिए, दो गज़ कफ़न के बाद।
जब कैफ़ी “औरत” को गुलामी की उन ज़ंजीरों से जो सदियों से धर्म,परम्परा और रस्म ओ रिवाज के नाम इनके गले का फंदा बन गयी थीं, आज़ाद  होने का आह्वान करते हैं, तो समाज के ठेकेदार बौखला-से जाते हैं. एक खलबली-सी मच जाती है. लेकिन ये बागी शायर बिना खौफ-ओ-खतर आगे बढ़ता है और आह्वान करता है-

तोड़ कर रस्म का बूत बंदे क़दामत से निकल

ज़ोफे इशरत से निकल, वहमे नज़ाक़त से निकल

नफ़्स के खींचे हुए हलका-ए-अज़मत से निकल

ये भी इक क़ैद ही है, क़ैद-ए-मुहब्बत से निकल

राह का खार ही क्या,गुल भी कुचलना है तुझे

उठ मेरी जान, मेरे साथ ही चलना है तुझे।
कैफ़ी आज़मी इप्टा के संस्थापक सदस्यों में थे. इनके अध्यक्षीय काल में पूरे देश मे इप्टा का विस्तार तेज़ी से हुआ. इप्टा के नाटकों के माध्यम से इन्होंने साम्प्रदायिकता पर जोरदार प्रहार किया.1992 में बाबरी मस्जिद ध्वंस को भी इनकी आंखों ने देखा. फ़ासीवादी शक्तियों ने इन्हें जो पीड़ा दी, वो “दूसरा वनबास” की शक्ल में  सामने आयी-
पांव सरजू में अभी राम ने धोये भी न थे/कि वहां नज़र आये खून के गहरे धब्बे/पांव धोये बिना सरजू के किनारे से उठे/राम ये कहते हुए अपने द्वारे से उठे.
कैफ़ी ने फिल्मों में भी काफी नाम कमाया. अपने नग्मों को शायरी का हुस्न दिया, गीतों को शेरी आहंग दिया. उर्दू  शायरी को पहचान दिलायी. हक़ीक़त का ये गीत “कर चले हम फ़िदा जान ओ तन साथियो….“जब भी कानों तक पहुंचता  है तो शिरसारी का क्या कहना. वज्द की कैफ़ियत तारी हो जाती है.
उर्दू शायरी में जितने इनाम (सम्मान) कैफ़ी आज़मी को मिले, शायद ही किसी दूसरे शायर को मिले हों. बागी तो ऐसे कि जब मज़हबी तालीम के लिए मदरसा भेजे गये, तो हड़ताल करवा दी. कैफी तरक़्क़ी पसंद तहरीक का अहम हिस्सा थे. जिये तो सच्चे कम्युनिस्ट बनकर और आदर्श  और सच्चाई  की एक लंबी लकीर खींच कर.

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