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भाजपा के राष्ट्रवाद और कांग्रेस के जातिवाद से अलग हैं गुजराती मुसलमान

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MZ KHAN 

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2014 के नवम्बर में ट्रेड यूनियन की कांफ्रेंस में 10 दिनों के लिए मेरा पहली बार गुजरात जाना हुआ था. कांफ्रेंस द्वारिका जैसे धार्मिक स्थल पर रखी गयी  थी जो चारों ओर समुंदर से घिरा हुआ है. अतिथियों को धर्मशालाओं में ठहराया गया था. यहां चार  दिन मेरा रहना हुआ था. भगवान कृष्ण की इस नगरी में श्रद्धालु  बड़ी श्रद्धा और आस्था से आते हैं. मुझे यहां कोई परेशानी नहीं हुई. लोग बड़े प्यार से मिले. लेकिन जो सबसे ज्यादा खटकने वाली बात थी, वो ये थी कि यहां मुझे इक्के-दुक्के ही मुसलमान मिले. फिर भी, 2002 के बाद से गुजरात का नाम ज़ेहन में  आते ही जिस्म में जो एक अजीब  सी सिहरन होने लगती है, वो यहां आने के बाद से जाता रहा.

गुजरात मे मेरे एक दोस्त हैं अपूर्व केडिया. यदाकदा इनसे फोन पर बात होती रहती है. इन्होंने ही अहमदाबाद के सरकारी गेस्ट हाउस में मेरे रहने की व्यवस्था की थी. ये गेस्ट हाउस मिर्ज़ापुर में स्थित है. उन दिनों आनन्दी बेन  गुजरात की मुख्यमंत्री हुआ करती थीं. गुजरात में मुझे वो विकास नहीं दिखा जिसकी देश में चर्चा थी. लेकिन शहर मुझे बहुत शांत लगा. न धार्मिक उन्माद और न धार्मिक कट्टरता, जो 2002 में था.

गुजरात के लोग मिलनसार थे. सद्भावना भी दिखी. गेस्ट हाउस में मेरा खाना एक हिन्दू गुजराती बनाता था. मुझसे बड़ी प्यारी-प्यारी बातें करता था. मुझे लगा ही नहीं कि गुजरात में हूं. बड़े प्रेम से मिलता और बढ़िया खाना परोसता. मुझे ऐसा महसूस ही नहीं हुआ कि ये वही गुजरात है जहां एक दशक पहले इतना भयानक खूनी खेल खेला गया था कि  इंसानियत भी शर्मिंदा हो गयी थी.  ये सिर्फ़ गंदी सियासत थी. इस सियासत का हिस्सा बनकर लोगों को भी पछतावा हो रहा होगा. अहमदाबाद में  चार दिन रहा. बाद में पता चला कि यहां मुसलमानों की अच्छी खासी तादाद है. मैं उनसे जाकर मिला. कई लोगों से 2002 के दंगे के बारे में जानना चाहा, उन्हें कुरेदने की कोशिश की. लेकिन किसी ने  ज़बान नहीं खोली. वजह कुछ भी रही हो. सियासत ने इन्हें बहुत नुकसान पहुंचाया है, इसलिए  खामोशी  की चादर इन लोगों ने ओढ़ रखी है, ये बात मेरी समझ में आ गयी थी.

इसमें शक नहीं कि 2002 के बाद हालात बहुत खराब थे. तीन-चार सालों तक यही स्थिति बनी रही थी.  मुस्लिम मज़दूरों को काम नहीं मिलता था. धर्म के नाम पर बहिष्कार किया जा रहा था. व्यापारियों ने इनसे व्यापार बंद कर रखा था. शिक्षा और रोज़गार के मामले में यहां का मुस्लिम समाज काफी पिछड़ा हुआ था. आर्थिक संपन्नता भी नहीं थी.

2002 के बाद मुस्लिमों ने खुद को संभाला. दंगे को भुला दिया. भय और दहशत के माहौल से खुद को निकाला और शिक्षा और रोज़गार पर अपना ध्यान केंद्रित किया. बिना किसी सहयोग के अपने शिक्षण संस्थान और व्यापार खड़े किये. आज हालात ये है कि इनकी साक्षरता दर गुजरात की साक्षरता दर से आगे निकल गयी है. एक  अध्ययन के अनुसार गुजरात की साक्षरता दर 69% और मुस्लिमों की साक्षरता दर 73.3% है.

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व्यापार में भी मुसलमान आगे आ गये हैं. भले ही सरकारी नौकरियों में इनका प्रतिशत (5.4%) कम हो लेकिन आर्थिक संपन्नता ने इनके जीवन मे खुशहाली वापस लायी है.  इन्हें सियासत में अब उतनी दिलचस्पी नहीं है.

गुजरात में भाजपा के राष्ट्रवाद और कांग्रेस के जातिवाद से इन्होंने खुद को अलग कर रखा है. इसमें शक नहीं कि गुजरात में सियासत ने मुस्लिमों को बहुत ही गहरे ज़ख्म दिये हैं. इसलिए वहां की सियासी हलचल में अब  इनकी भूमिका नज़र नहीं आती  है.

2011 की जनगणना रिपोर्ट की बात करें तो इसके अनुसार मुस्लिमों की साक्षरता दर में वृद्धि दर्ज की गई है. गुजरात से आगे अब सिर्फ तीन राज्य हैं जहां मुस्लिम अधिक साक्षर हैं. केरल में मुस्लिम साक्षरता दर 89.4%, तमिलनाडु में 82.9% और छत्तीसगढ़ में 83% है.

इन आंकड़ों से आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि गुजरात का मुस्लिम समाज आज अपनी मेहनत और लगन से आगे निकल चुका है. अतीत को भूलकर वर्तमान में जीने की आदत डाल ली है.

इसे भी पढ़ेंः इस तरह घटता गया विधानसभाओं में मुस्लिम प्रतिनिधित्व

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