
Akshay Kumar Jha
Ranchi: खनन विभाग की तरफ से जेएसएमडीसी सरकारी तरीके से बालू का कारोबार करता है. जेएसएमडीसी खुद या फिर डीलर और ठेकेदार के जरिए आम लोगों तक बालू बेचने का काम करता है. विभाग के आंकड़ों की बात करें तो सरकारी स्टॉक में बालू की कमी नहीं है. तो ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर बालू की कालाबाजारी क्यों हो रही है. न्यूज विंग पड़ताल में यह पता चलता है कि सरकारी तंत्र की गठजोड़ और डीलर-ठेकेदार की वजह से बाजार में एनजीटी की बालू खनन पर पांबदी लगते ही बालू महंगी हो जाती है.
10 जून को जब एनजीटी की तरफ से बालू खनन पर पाबंदी लगी तो उस वक्त विभाग का सरकारी स्टॉक करीब 7.60 करोड़ सीएफटी बालू थी. लेकिन जानबूझ कर बालू की कमी बतायी जा रही है. ताकि जिन्हें कंस्ट्रक्शन का काम करना है वो महंगे दाम में बालू खरीदें. बड़े रियल स्टेट कारोबारी फिर भी महंगे बालू खरीद से बचने का रास्ता निकाल लेते हैं. लेकिन छोटी पहुंच वाले आम आदमी के सामने महंगी बालू खरीदने के अलावा कोई रास्ता नहीं होता है.
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20 रुपये/CFT का बालू 35 में और 17 वाला 30 में= मुनाफा 1 अरब से ज्यादा
बाजार में बालू दो तरह के होते हैं. एक प्लास्टर बालू तो दूसरा मोटा बालू कहलाता है. प्लास्टर बालू की कीमत बाजार में आम मौसम में 20 रुपये प्रति सीएफटी होती है. यह बालू अच्छी क्वालिटी की होती है. इसे बिना चाले ही सीधा प्लास्टर में उपयोग किया जा सकता है.
लेकिन 10 जून के बाद बालू की बिना बात किल्लत बताकर बिचौलिये इस बालू को बाजार में 33-35 रुपये में बेचते हैं. यानी प्रति सीएफटी करीब 15 रुपये का फायदा. अमूमन एक डंपर में 800 सीएफटी बालू आती है. इस हिसाब से प्रति डंपर करीब 12 हजार रुपये की कालाबाजारी हो रही है. वहीं मोटे बालू की बात करें तो आम दिनों में यह बालू 17 रुपये प्रति सीएफटी बाजार में आसानी से उपलब्ध हो जाती है. लेकिन अभी यह बालू करीब 30 रुपये में बाजार में उपलब्ध है. ऐसे में प्रति डंपर करीब साढ़े दस हजार की बालाबाजारी.
विभाग के आंकड़े बताते हैं कि 10 जून को सरकारी स्टॉक में करीब 7.60 करोड़ सीएफटी बालू स्टॉक था. अगर 15 अक्टूबर तक जबतक एनजीटी की बालू खनन पर पांबदी लगी हुई है, पूरे स्टॉक की बिक्री हो जाती है तो झारखंड में बालू माफिया 1.15 अरब का कालाबाजारी कर चुके होंगे. और ऐसा जिला स्तर पर खनन विभाग के सरकारी अधिकारियों और कर्मी की मिलीभगत से होगा. जिसे रोकने वाला कोई नहीं है.
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