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मॉब लिंचिंग : प्रायोजित भीड़ की हिंसा व पुलिस के रवैये पर उठते सवाल

Faisal Anurag

भारत आज एक गंभीर संकट के दौर में है, यह संकट उस प्रायोजित भीड़ ने पैदा किया है, जो लगातार एक धर्म विशेष के लोगों की हत्यायें कर रहा है. भारत में यह एक नया फेनोमिना इस अर्थ में है कि इसमें भीड़ एक खास तरह की विचारधारा से प्रभावित है तथा उसे कुछ खास समूहों का संरक्षण भी प्राप्त है. अलवर की घटना में एक नया आयाम यह जुड़ा है कि पुलिस की भूमिका भी इसमें शामिल है. इसके प्रमाण लगातार प्रकाश में आ रहे हैं. बावजूद इसपर जिस तत्परता से राजस्थान सरकार को कार्रवाई करनी चाहिए, आरोप है कि वह इसमें विफल साबित हो रही है.

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सवाल है कि आखिर इन हत्याओं में शामिल लोगों को किसका संरक्षण प्रप्त है. अब यह किसी से छुपा हुआ नहीं है. निरंतर विभिन्न नेताओं के बयानों और मंत्री जयंत सिन्हा द्वारा सजायाफ्ताओं  को माला पहनाने से कई तरह के संदेह समाज में व्याप्त हो रहे हैं. इस तरह के बयानों से हत्याओं के गिरोह का मनोबल ही बढता है. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट को सख्त रवैया अपनाते हुए यह कहना पड़ा कि केंद्र को मॉब लिंचिंग के खिलाफ अलग से कड़ा कानून बनाना चाहिए. लेकिन इसके बाद एक केंद्रीय मंत्री ने बयान दिया कि केंद्र ऐसा कोई कानून बनाने नहीं जा रही है. अब कहा जा रहा है कि वर्तमान कानून में ही इस बात का प्रावधान करने की योजना है. किस इस तरह की घटनाओं की तत्वरित जांच हो और दोषियों को सजा मिल सके.

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इस तथ्य को समझना होगा कि आखिर सुप्रीम कोर्ट इस तरह की हत्याओं के प्रति क्यों सख्त है और क्यों उसे गंभीर खतरा जाहिर किया है. भारतीय संविधान और लोकतंत्र के लिए इस तरह की घटनाएं चिंता की बात है. वर्तमान लिंचिंग को पुरानी घटनाओं से तुलना कर कम नहीं किया जा सकता. सरकारों को चाहिए कि वह इन घटनाओं को गंभीरता से ले और भीड़ को कानून हाथ में लेने की इजाजत किसी भी हालत में नहीं दे.

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लोकतंत्र इस बात की इजाजत नहीं देता कि किसी भी नागरिक की इस तरह हत्या की जाए. पिछले कुछ समय से जिस तरह का माहौल तैयार हुआ है, उससे साबित होता है कि भीड़ की भावनाओं को लगातार उकसाया जा रहा है. आज यह प्रायोजित भीड़ अपने को राजनीतिक तौर पर संरक्षित पा रही है. इसके बिना लगातार इस तरह की वारदात को अंजाम नहीं दिया जा सकता है. राजस्थान में पिछले दिनों जिस तरह की हत्याएं हुयी हैं उसके गंभीर परिणाम सामने आ रहे हैं. चुनावों के नजदीक आने के साथ समाज में जिस तरह की स्थितियां पैदा की जा रही हैं, उसमें युवाओं का एक तबका लगातार गुमराह हो रहा है. इसे गुमराह करना तो आसान है, लेकिन फिर उसे इस तरह की भावनाओं से विमुख करना आसान नहीं होगा. केंद्र सरकार राज्य सरकारों पर दायित्व डालकर अपने कर्तव्य से पल्ला नहीं झाड सकती. केंद्र का दायित्व है कि वह अपने अल्पसंख्यक लोगों में फैलती निराशा को दूर करे और विश्वास दिलाए कि लोकतंत्र में इस तरह के वारादात को भविष्य में अंजाम देने की छूट किसी भी कीमत पर नहीं दी जा सकती.

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राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि इस तरह की घटनाओं के खिलाफ व्यापक अभियान चलाए और लोगों को संवेदशील बनाकर सभी नागरिकों की चेतना को पुख्ता बनाए. भारतीय समाज की संरचना में इस तरह की घटनाओं के लिए कोई जगह नहीं है, ना ही इसे कोर्ट सराह सकता है. भारतीय समाज के तानेबाने को बनाए रखने का दायित्व सभी का है और सरकार को इसके लिए विशेष अभियान लाने की जरूरत है.

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