Opinion

जयंती विशेष:  सहज और सरल अटल

नवीन शर्मा

भारत में अब तक जितने भी प्रधानमंत्री हुए हैं, उनमें सबसे अधिक मुझे अटल बिहारी वाजपेयी पसंद हैं. इसके पीछे कई कारण हैं. अटल ऐसे रेयर राजनेता रहे हैं जो ना तो शातिर थे और ना ही तिकड़मी. इसकी शायद एक वजह ये रही हो की वो नेता से अधिक कवि का ह्रदय रखते थे. उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी कि वे बहुत सहज और सरल थे. सभी लोगों से सद्भावना पूर्ण व्यवहार उनकी खास पहचान थी यही वजह थी कि जनसंघ व भाजपा के विरोधी विचार रखने वाले भी अटल को पसंद करते थे. यह अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व का ही करिश्मा था कि उन्होंने NDA के गठबंधन वाली केंद्र सरकार कुशलता से चलाई.

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छह लोकसभा क्षेत्रों से चुनाव जीतने वाले एकमात्र राजनेता

 

‘भारत रत्न’ अटल बिहारी वाजपेयी देश के एकमात्र ऐसे राजनेता थे, जो चार राज्यों के छह लोकसभा क्षेत्रों की नुमाइंदगी कर चुके हैं. उत्तर प्रदेश के लखनऊ और बलरामपुर, गुजरात के गांधीनगर, मध्यप्रदेश के ग्वालियर और विदिशा और नई दिल्ली संसदीय सीट से चुनाव जीतने वाले वाजपेयी इकलौते नेता हैं.

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जीवन का सफर

अटल बिहारी वाजपेयी का जन्‍म 25 दिसंबर 1924 को हुआ था. क्रिसमस के इस दिन को भारत में बड़ा दिन कहा जाता है. वाजपेयी 1942 में राजनीति में उस समय आए, जब भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उनके भाई 23 दिनों के लिए जेल गए. 1951 में आरएसएस के सहयोग से भारतीय जनसंघ पार्टी का गठन हुआ तो श्‍यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे नेताओं के साथ अटलबिहारी वाजपेयी की अहम भूमिका रही.

1957 में बलरामपुर से पहली बार एमपी बने

 

वर्ष 1952 में अटल बिहारी वाजपेयी ने पहली बार लखनऊ लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, पर सफलता नहीं मिली. वे उत्तरप्रदेश की एक लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में उतरे थे, जहां उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. वाजपेयी को पहली बार सफलता 1957 में मिली थी. 1957 में जनसंघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया. लखनऊ में वे चुनाव हार गए, मथुरा में उनकी ज़मानत जब्त हो गई, लेकिन बलरामपुर संसदीय सीट से चुनाव जीतकर वे लोकसभा पहुंचे.

 नेहरू बोले यह नौजवान देश का प्रधानमंत्री बनेगा

वाजपेयी के असाधारण व्‍यक्तित्‍व तथा भाषण देने की कुशलता को देखकर तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि आने वाले दिनों में यह व्यक्ति जरूर प्रधानमंत्री बनेगा. अटल कमाल का भाषण देते थे. संसद का सत्र हो या फ़िर कोई चुनावी रैली अटल जब बोलते तो लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे. मैंने भी कई बार उनके मनमोहक भाषण का आनंद लिया है. कुछ चुनावी सभाओं में भी उनको सुनने का मौका मिला है. नरेंद्र मोदी से तुलना करता हूं तो पाता हूं कि मोदी चिल्ला कर बोलने के बाद भी उतना अपील नहीं करते जितना अटल चुटकियां लेकर बोलते हुए कनेक्ट करते थे. जहां तक हाजिर जवाबी का सवाल है तो वो उनमें कूट कर भरी थी इससे वे सभी को मोह लेते थे. अपने विरोधियों का भी सम्मान करना और कभी भी अपशब्दों और ओछी भाषा का इस्तेमाल ना करना अटल के व्यक्तित्व का अहम पहलू था. आज के राजनेताओं के बिगड़े बोल सुनकर अटल जी जैसे शालीन राजनेता की कमी खलती है.

कई बार चुनाव हारे, पर हिम्मत नहीं

वाजपेयी तीसरे लोकसभा चुनाव 1962 में लखनऊ सीट से उतरे, लेकिन उन्हें जीत नहीं मिल सकी. इसके बाद वे राज्यसभा सदस्य चुने गए. बाद में 1967 में फिर लोकसभा चुनाव लड़े, लेकिन जीत नहीं सके. इसके बाद 1967 में ही उपचुनाव हुआ, जहां से वे जीतकर सांसद बने. इसके बाद 1968 में वाजपेयी जनसंघ के राष्ट्रीय अध्‍यक्ष बने. उस समय पार्टी के साथ नानाजी देशमुख, बलराज मधोक तथा लालकृष्‍ण आडवाणी जैसे नेता थे.

1971 में पांचवें लोकसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी मध्यप्रदेश के ग्वालियर संसदीय सीट से चुनाव में उतरे और जीतकर संसद पहुंचे. आपातकाल के बाद हुए चुनाव में 1977 और फिर 1980 के मध्यावधि चुनाव में उन्होंने नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया. 1984 में अटल ने मध्य प्रदेश के ग्वालियर से लोकसभा चुनाव का पर्चा दाखिल कर दिया और उनके खिलाफ अचानक कांग्रेस ने माधवराव सिंधिया को खड़ा कर दिया, जबकि माधवराव गुना संसदीय क्षेत्र से चुनकर आते थे. सिंधिया से वाजपेयी पौने दो लाख वोटों से हार गए.

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वाजपेयी ने एक बार जिक्र भी किया था कि उन्होंने स्वयं संसद के गलियारे में माधवराव से पूछा था कि वे ग्वालियर से तो चुनाव नहीं लड़ेंगे. माधवराव ने उस समय मना कर दिया था, लेकिन कांग्रेस की रणनीति के तहत अचानक उनका पर्चा दाखिल करा दिया गया. इस तरह वाजपेयी के पास मौका ही नहीं बचा कि दूसरी जगह से नामांकन दाखिल कर पाते. ऐसे में उन्हें सिंधिया से हार का सामना करना पड़ा.

इसके बाद वाजपेयी 1991 के आम चुनाव में लखनऊ और मध्य प्रदेश की विदिशा सीट से चुनाव लड़े और दोनों ही जगह से जीते. बाद में उन्होंने विदिशा सीट छोड़ दी.

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लखनऊ और गांधीनगर से चुनाव लड़कर जीत हासिल की

1996 में हवाला कांड में नाम आने के कारण लालकृष्ण आडवाणी गांधीनगर से चुनाव नहीं लड़े. इस स्थिति में अटल बिहारी वाजपेयी ने लखनऊ सीट के साथ-साथ गांधीनगर से चुनाव लड़ा और दोनों ही जगहों से जीत हासिल की. इसके बाद वाजपेयी ने लखनऊ को अपनी कर्मभूमि बना ली. व़े 1998 और 1999 का लोकसभा चुनाव लखनऊ सीट से जीतकर सांसद बने.

यूएन में हिंदी में भाषण देने वाले पहले नेता

आपातकाल के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी की जीत हुई थी और वे मोरारजी भाई देसाई के नेतृत्‍व वाली सरकार में विदेश मामलों के मंत्री बने. विदेश मंत्री बनने के बाद वाजपेयी पहले ऐसे नेता थे जिन्‍होंने संयुक्‍त राष्‍ट्र महासंघ को हिन्‍दी भाषा में संबोधित किया.

भाजपा के पहले अध्यक्ष

1979 के आस-पास जनता पार्टी अंतर्कलह के कारण बिखर गई और 1980 में वाजपेयी के साथ पुराने दोस्‍त भी जनता पार्टी छोड़ भारतीय जनता पार्टी से जुड़ गए. वाजपेयी भाजपा के पहले राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष बने और वे कांग्रेस सरकार के सबसे बड़े आलोचकों में शुमार किए जाने लगे.1994 में कर्नाटक 1995 में गुजरात और महाराष्‍ट्र में पार्टी जब चुनाव जीत गई उसके बाद पार्टी के तत्कालीन अध्‍यक्ष लालकृष्‍ण आडवाणी ने वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार घोषित कर दिया था.

तीन बार बने प्रधानमंत्री

वाजपेयी 1996 से लेकर 2004 तक तीन बार प्रधानमंत्री बने. 1996 के लोकसभा चुनाव में भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और वाजपेयी पहली बार प्रधानमंत्री बने. हालांकि उनकी सरकार 13 दिनों में संसद में पूर्ण बहुमत हासिल नहीं करने के चलते गिर गयी. 1998 के दोबारा लोकसभा चुनाव में पार्टी को ज्‍यादा सीटें मिलीं और कुछ अन्‍य पार्टियों के सहयोग से वाजपेयी ने एनडीए का गठन किया और वे फिर प्रधानमंत्री बने. यह सरकार 13 महीनों तक चली, लेकिन बीच में ही जयललिता की पार्टी ने सरकार का साथ छोड़ दिया, जिसके चलते सरकार गिर गई. 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा फिर से सत्‍ता में आई और इस बार वाजपेयीजी ने अपना पांच साल का कार्यकाल सफलता के साथ पूरा किया.

उनकी कविताओं में भी दिखता था जूझने का इरादा….

 

ठन गई!

मौत से ठन गई!

 

जूझने का मेरा इरादा न था,

मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

 

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,

यूं लगा जिंदगी से बड़ी हो गई.

 

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,

जिंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं.

 

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,

लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?

 

तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ,

सामने वार कर फिर मुझे आजमा.

 

मौत से बेखबर, जिंदगी का सफ़र,

शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर.

 

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,

दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं.

 

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,

न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला.

 

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किए,

आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए.

 

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,

नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है.

 

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,

देख तेवर तूफ़ां का, तेवरी तन गई.

 

मौत से ठन गई.

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बाधाएं आती हैं आएं

घिरें प्रलय की घोर घटाएं,

पावों के नीचे अंगारे,

सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,

निज हाथों में हंसते-हंसते,

आग लगाकर जलना होगा.

कदम मिलाकर चलना होगा.

 

हास्य-रूदन में, तूफानों में,

अगर असंख्यक बलिदानों में,

उद्यानों में, वीरानों में,

अपमानों में, सम्मानों में,

उन्नत मस्तक, उभरा सीना,

पीड़ाओं में पलना होगा.

कदम मिलाकर चलना होगा.

 

उजियारे में, अंधकार में,

कल कहार में, बीच धार में,

घोर घृणा में, पूत प्यार में,

क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,

जीवन के शत-शत आकर्षक,

अरमानों को ढलना होगा.

कदम मिलाकर चलना होगा.

 

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,

प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,

सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,

असफल, सफल समान मनोरथ,

सब कुछ देकर कुछ न मांगते,

पावस बनकर ढलना होगा.

कदम मिलाकर चलना होगा.

 

कुछ कांटों से सज्जित जीवन,

प्रखर प्यार से वंचित यौवन,

नीरवता से मुखरित मधुबन,

परहित अर्पित अपना तन-मन,

जीवन को शत-शत आहुति में,

जलना होगा, गलना होगा.

क़दम मिलाकर चलना होगा.

 

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